Sone Ka Anda Dene Wali Murgi | सोने के अंडे की कहानी

Sone Ka Anda Dene Wali Murgi

Today I am sharing this blog of  Sone Ka Anda Dene Wali Murgi  with all of you, which is very famous story for kids . These stories is very entertaining and funny with moral . So kids are like these stories . If you like this poem, then do share it with other people.

आज हम इस पोस्ट में Sone Ka Anda Dene Wali Murgi को प्रस्तुत किया है जो की बच्चों में  काफी मशहूर कहानी  है  , आशा है की आपको यह कहानी   काफी पसंद आएगी , इसके अलावा और भी नैतिक कहानिया नीचे प्रस्तुत की  गई है । वह कहानिया भी आपको जरूर पसंद आएगी । 

*. Sone Ka Anda Dene Wali Murgi - 


एक समय की बात है है एक किसान था जो की बहुत गरीब था । वह लगन से  काम करता और जो भी वह कमाता उसकी जरूरतों को पूरी करने के लिए काफी था । एक शाम काम से लॉटने आने  पर उसे बड़े जूर की भूक लगी थी । वह रसोई की ओर गया और देखा की उसका राशन खतम हो गया है । 

उसी समय वह अपनी छोपड़ी के सामने एक मुर्गी की चिल्लाने की आवाज सुनी और वह सोचा की वह मुर्गी  उसके लिए बहुत बढ़िया होगी। किसान मुर्गी को पकड़ने के लिए उसके पास गया पर मुर्गी वहा से दूसरे तरफ भाग गई । थोड़ी देर की कोशिश के बाद उसने मुर्गी को पकड़ लिया। 

जैसे ही किसान उस मुर्गी को मारने ही वाला था , उसी समय मुर्गी बोली - किसान मुझे मत मार मैं तुम्हारी मदद करूगी । किसान बोला  - अरे यह क्या है , एक मुर्गी बोल सकती है , वह चौक गया और बोल ठीक है ठीक है मैं तुम्हें नहीं मारुगा । 

फिर किसान बोला - लेकिन तुम मेरी मदद कैसे करोगी । मुर्गी बोली - यदि तुम मुझे जिंदा  छोड़ दोगे तो मैं रोज तुम्हें सोने का एक अंडा दूँगी । किसान बोला - क्या तुम मुझे रोज एक सोने का अंडा दोगी , पर मैं तुमपर भरोसा कैसे करू , सायद तुम झुट बोल रही हो । मुर्गी बोली - मुझ पर भरोसा करो , यदि कल मैं तुम्हें एक सोने का अंडा नहीं दूँगी तो तुम मुझे कल  मार सकते हो । 

किसान बोला - ठीक है , मैं कल की राह देखूगा और फिर यह कहकर किसान घर गया और मुर्गी को पिंजरे में रख दिया । 

अगले दिन वह उठकर  मुर्गी के पिंजरे के पास देखने गया की क्या सच में मुर्गी ने सोने का अंडा दिया है । किसान बोला - अरे यह तो सच है मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा है । 

किसान खुशी - खुशी अंडे को उठाया और बाजार जाकर चिल्लाने लगा "भाई सोने का अंडा लेलों सोने का अंडा लेलों " तभी एक आमिर महिला ने किसान से पूछा क्या यह असली का सोने का अंडा है । किसान जोर से बोला - हा भाई हा यह सच में सोने का अंडा है । 

तभी उसकी बात आस - पास के  लोगों ने सुनी और सारे  बोलने लगे की  मैं ये सोने का अंडा लूँगा । किसान ने एक व्यक्ति को अंडा बेच दिया , जिसकी उसे बहुत अच्छी कीमत मिली । किसान बोला - चिंता मत करो कल मैं फिर सोने का अंडा लाउगा । 

अगले दिन किसान उढ़ा और देखने गया की क्या सच मैं एक और सोने का अंडा है या नहीं । फिर किसान बोला - खूब बहुत खूब एक और सोने का अंडा , मैं इसे भी बेचूँगा । 

वह बाजार जाकर फिर अंडे को बेच आया । दिन पर दिन मुर्गी उसे सोने का खूबसूरत अंडा देती रही और किसान उन्हे बेच कर धीरे - धीरे आमिर होता गया । आमिर के साथ - साथ वह थोड़ा लालची भी हो गया था । किसान बोला - मुझे और ज़्यादा पैसा चाहिए , हर रोज सोने की एक अंडे की रह देखकर मैं थक चुका हु । 

उसने सोचा - मैं उस मुर्गी को मार दूंगा और उसमे छिपी सोने की खदान ले लूँगा । मुझे एकदम उसका सारा खजाना मिल जाएगा । फिर किसान ने मुर्गी को मार डाला , पर अफसोस की बात थी की उसे कुछ नहीं मिला । 

किसान बोला - अरे यह नहीं हो सकता है , सोने की खदान कहाँ है , उसका खजाना कहा है यह कहकर किसान रोने लगा । किसान बोला अब मेरे पास न मुर्गी है और न सोने के अंडे , अब मैं क्या करू । 

Moral - इस कहानी से यह सीख मिलती है की ज़्यादा लालची होना बुरी बात है । 


*. एक रूपये की कीमत -Sone Ka Anda Dene Wali Murgi

बहुत समय पहले की बात है, सुब्रोतो लगभग 20 साल का एक लड़का था और कलकत्ता की एक कॉलोनी में रहता था।

उसके पिताजी एक भट्टी चलाते थे जिसमे वे दूध को पका-पका कर खोया बनाने का काम करते थे।

सुब्रोतो वैसे तो एक अच्छा लड़का था लेकिन उसमे फिजूलखर्ची की एक बुरी आदत थी। वो अक्सर पिताजी से पैसा माँगा करता और उसे खाने-पीने या सिनेमा देखने में खर्च कर देता।

एक दिन पिताजी ने सुब्रोतो को बुलाया और बोले, “देखो बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो और तुम्हे अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहियें। जो आये दिन तुम मुझसे पैसे मांगते रहते हो और उसे इधर-उधर उड़ाते हो ये अच्छी बात नहीं है।”

“क्या पिताजी! कौन सा मैं आपसे हज़ार रुपये ले लेता हूँ… चंद पैसों के लिए आप मुझे इतना बड़ा लेक्चर दे रहे हैं..इतने से पैसे तो मैं जब चाहूँ आपको लौटा सकता हूँ।”, सुब्रोतो नाराज होते हुए बोला।

सुब्रोतो की बात सुनकर पिताजी क्रोधित हो गए, पर वो समझ चुके थे की डांटने-फटकारने से कोई बात नहीं बनेगी। इसलिए उन्होंने कहा, “ ये तो बहुत अच्छी बात है…ऐसा करो कि तुम मुझे ज्यादा नहीं बस एक रूपये रोज लाकर दे दिया करो।”

सुब्रोतो मुस्कुराया और खुद को जीता हुआ महसूस कर वहां से चला गया।

अगले दिन सुब्रोतो जब शाम को पिताजी के पास पहुंचा तो वे उसे देखते ही बोले, “ बेटा, लाओ मेरे 1 रुपये।”

उनकी बात सुनकर सुब्रोतो जरा घबराया और जल्दी से अपनी दादी माँ से एक रुपये लेकर लौटा।

“लीजिये पिताजी ले आया मैं आपके एक रुपये!”, और ऐसा कहते हुए उसने सिक्का पिताजी के हाथ में थमा दिया।

उसे लेते ही पिताजी ने सिक्का भट्टी में फेंक दिया।

“ये क्या, आपने ऐसा क्यों किया?”, सुब्रोतो ने हैरानी से पूछा।

पिताजी बोले-

तुम्हे इससे क्या, तुम्हे तो बस 1 रुपये देने से मतलब होना चाहिए, फिर मैं चाहे उसका जो करूँ।

सुब्रोतो ने भी ज्यादा बहस नहीं की और वहां से चुपचाप चला गया।

अगले दिन जब पिताजी ने उससे 1 रुपया माँगा तो उसने अपनी माँ से पैसा मांग कर दे दिया…कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा वो रोज किसी दोस्त-यार या सम्बन्धी से पैसे लेकर पिताजी को देता और वो उसे भट्टी में फेंक देते।

फिर एक दिन ऐसा आया, जब हर कोई उसे पैसे देने से मना करने लगा। सुब्रोतो को चिंता होने लगी कि अब वो पिताजी को एक रुपये कहाँ से लाकर देगा।

शाम भी होने वाली थी, उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो करे क्या! एक रुपया भी ना दे पाने की शर्मिंदगी वो उठाना नहीं चाहता था। तभी उसे एक अधेड़ उम्र का मजदूर दिखा जो किसी मुसाफिर को हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे से लेकर कहीं जा रहा था।

“सुनो भैया, क्या तुम थोड़ी देर मुझे ये रिक्शा खींचने दोगे? उसके बदले में मैं तुमसे बस एक रुपये लूँगा”, सुब्रोतो ने रिक्शे वाले से कहा।

रिक्शा वाला बहुत थक चुका था, वह फ़ौरन तैयार हो गया।

सुब्रोतो रिक्शा खींचने लगा! ये काम उसने जितना सोचा था उससे कहीं कठिन था… थोड़ी दूर जाने में ही उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए, पैर भी दुखने लगे! खैर किसी तरह से उसने अपना काम पूरा किया और बदले में ज़िन्दगी में पहली बार खुद से 1 रुपया कमाया।

आज बड़े गर्व के साथ वो पिताजी के पास पहुंचा और उनकी हथेली में 1 रुपये थमा दिए।

रोज की तरह पिताजी ने रूपये लेते ही उसे भट्टी में फेंकने के लिए हाथ बढाया।

“रुकिए पिताजी!”, सुब्रोतो पिताजी का हाथ थामते हुए बोला, “आप इसे नहीं फेंक सकते! ये मेरे मेहनत की कमाई है।”

और सुब्रोतो ने पूरा वाकया कह सुनाया।

पिताजी आगे बढे और अपने बेटे को गले से लगा लिया।

“देखो बेटा! इतने दिनों से मैं सिक्के आग की भट्टी में फेंक रहा था लकिन तुमने मुझे एक बार भी नहीं रोका पर आज जब तुमने अपनी मेहनत की कमाई को आग में जाते देखा तो एकदम से घबरा गए। 

ठीक इसी तरह जब तुम मेरी मेहनत की कमाई को बेकार की चीजों में उड़ाते हो तो मुझे भी इतना ही दर्द होता है, मैं भी घबरा जाता हूँ…इसलिए पैसे की कीमत को समझो चाहे वो तुम्हारे हों या किसी और के…कभी भी उसे फिजूलखर्ची में बर्वाद मत करो!”

सुब्रोतो पिताजी की बात समझ चुका था, उसने फौरन उनके चरण स्पर्श किये और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। आज वो एक रुपये की कीमत समझ चुका था और उसने मन ही मन संकल्प लिया कि अब वो कभी भी पैसों की बर्बादी नहीं करेगा।

*. चिड़िया की परेशानी -Sone Ka Anda Dene Wali Murgi

कैसोवैरी चिड़िया को बचपन से ही बाकी चिड़ियों के बच्चे चिढाते थे।

कोई कहता, ” जब तू उड़ नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की।”, तो कोई उसे ऊपर पेड़ की डाल पर बैठ कर चिढाता कि,” अरे कभी सकारात्मक सोच पर कहानी sakaratmak soch ki kahaniहमारे पास भी आ जाया करो…जब देखो जानवरों की तरह नीचे चरती रहती हो…”

और ऐसा बोलकर सब के सब खूब हँसते!

कैसोवैरी चिड़िया शुरू-शुरू में इन बातों का बुरा नहीं मानती थी लेकिन किसी भी चीज की एक सीमा होती है।

बार-बार चिढाये जाने से उसका दिल टूट गया! वह उदास बैठ गयी और आसमान की तरफ देखते हुए बोली,

“हे ईश्वर, तुमने मुझे चिड़िया क्यों बनाया…और बनया तो मुझे उड़ने की काबिलियत क्यों नहीं दी… देखो सब मुझे कितना चिढ़ाते हैं… अब मैं यहाँ एक पल भी नहीं रह सकती, मैं इस जंगल को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूँ!”

और ऐसा कहते हुए कैसोवैरी चिड़िया आगे बढ़ गयी।

अभी वो कुछ ही दूर गयी थी कि पीछे से एक भारी-भरकम आवाज़ आई-

रुको कैसोवैरी! तुम कहाँ जा रही हो!

कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़ कर देखा, वहां खड़ा जामुन का पेड़ उससे कुछ कह रहा था।

“कृपया तुम यहाँ से मत जाओ! हमें तुम्हारी ज़रुरत है। पूरे जंगल में हम सबसे अधिक तुम्हारी वजह से ही फल-फूल पाते हैं…. वो तुम ही हो जो अपनी मजबूत चोंच से फलों को अन्दर तक खाती हो और हमारे बीजों को पूरे जंगल में बिखेरती हो…हो सकता है. 

 बाकी चिड़ियों के लिए तुम मायने ना रखती हो लेकिन हम पेड़ों के लिए तुमसे बढ़कर कोई दूसरी चिड़िया नहीं है…मत जाओ…तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता!”

पेड़ की बात सुन कर कैसोवैरी चिड़िया को जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि वो इस धरती पर बेकार में मौजूद नहीं है, भगवान् ने उसे एक बेहद ज़रूरी काम के लिए भेजा है और सिर्फ बाकी चिड़ियों की तरह न उड़ पाना कहीं से उसे छोटा नहीं बनाता!

आज एक बार फिर कैसोवैरी चिड़िया बहुत खुश थी, वह ख़ुशी-ख़ुशी जंगल में वापस लौट गयी।

Friends, कैसोवैरी चिड़िया की तरह ही कई बार हम इंसान भी औरों को देखकर low feel करने लगते हैं। हम सोचते हैं कि उसके पास ये है…उसके पास वो है….सब कितनी lucky हैं…and all that!

हमें कभी भी बेकार के comparisons में नहीं पड़ना चाहिए! हर एक इंसान अपने आप में unique है…अलग है। हर किसी के अन्दर कोई न कोई बात है जो उसे ख़ास बनाती है..हाँ हो सकता है कि वो पूरी दुनिया के लिए बस एक इंसान हो लेकिन किसी एक के लिए वो पूरी दुनिया हो सकता है!

इसलिए life की importance को समझिये और अपने इस अमूल्य जीवन को positive thoughts का तोहफा दीजिये….यकीन जानिये सकारात्मक सोच का ये एक तोहफा आपकी पूरी लाइफ को शानदार बना देगा!


*. पेड़ का रहस्य -Sone Ka Anda Dene Wali Murgi


शहर के बाहरी हिस्से में मल्टी नेशनल कम्पनी में काम करने वाले एक सेल्स मैनेजर अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते थे। वह रोज सुबह काम पर निकल जाते और देर शाम को घर लौटते।

एक बार कुछ चोरों ने मैनेजर के घर में चोरी करने का मन बनाया। चोरी करने के दो-चार दिन पहले से ही वे उनके घर के आस-पास चक्कर लगाने लगे और उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने लगे।

एक दिन चोरों ने एक अजीब सी चीज देखी। मैनेजर साहब जब शाम को लौटे तो वह घर में घुसने से पहले बागीचे में लगे आम के पेड़ के पास जाकर खड़े हो गए। उसके बाद उन्होंने अपने बैग में से एक-एक करके कुछ निकाला और पेड़ में कहीं डाल दिया। चूँकि उनकी पीठ चोरों की तरफ थी इसलिए वे ठीक से देख नहीं पाए कि आखिर मैनेजर ने क्या निकाला और कहाँ डाला।

खैर! इतना देख लेना ही चोरों के लिए काफी था। उनकी आँखें चमक गयीं; उन्होंने सोचा कि ज़रूर मैनेजर ने वहां कोई कीमती चीज या पैसे छुपाये होंगे।

मैनेजर के अन्दर जाते ही चोर थोड़ा और अँधेरा होने का इंतज़ार करने लगे और जब उन्हें तसल्ली हो गयी कि मैनेजर साहब खा-पीकर सो गए हैं तो वे धीरे से बाउंड्री कूद कर उनके घर में दाखिल हुए।

बिना समय गँवाए वे आम के पेड़ के पास गए और मैनेजर साहब की छिपाई चीज ढूँढने लगे। चोर हैरान थे, बहुत खोजने पर भी उन्हें वहां कुछ नज़र नहीं आ रहा था..वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मैनेजर ने किस चतुराई से चीजें छिपाई हैं कि इतने शातिर चोरों के खोजने पर भी वे नहीं मिल रही हैं!

अंत में हार मान कर चोर वहां से चले गए। अगले दिन वे फिर छिपकर मैनेजर के ऑफिस से लौटने का इंतज़ार करने लगे।

रोज की तरह मैनेजर साहब देरी से घर लौटे। आज भी वे घर में घुसने से पहले उसी आम के पेड़ के पास गए और अपने बैग से कुछ चीजें निकाल कर उसमे डाल दी।

एक बार फिर चोर सबके सो जाने पर पेड़ के पास गए और जी-जान से खोजबीन करने लगे। पर आज भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

अब चोरों को कीमती सामान से अधिक ये जानने की जिज्ञासा होने लगी कि आखिर वो मैनेजर किस तरह से चीजों को छिपता है कि लाख ढूँढने पर भी वो नहीं मिलतीं।

अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे सन्डे की सुबह शरीफों की तरह तैयार हो कर मैनेजर साहब से मिलने पहुंचे।

उनका लीडर बोला, “ सर, देखिये बुरा मत मानियेगा…दरअसल हम लोग चोर हैं! हम लोग कई दिन से आपके मकान में चोरी करने का प्लान बना रहे थे..लेकिन जब एक दिन हमने देखा कि आप ऑफिस से लौट कर आम के पेड़ में कुछ छुपा रहे हैं तो हमे लगा कि बस काम हो गया…हम आराम से आपकी छुपायी चीज लेकर गायब हो जायेंगे और चोरी का माल आपस में बाँट लंगे…पर पिछली दो रात हम सोये नहीं और सारी कोशिशें करके देख लीं कि वो चीजें हमें मिल जाएं; पर अब हम हार मान चुके हैं…कृपया आप ही हमें इस पेड़ का रहस्य बता दें!”

उनकी बात सुनकर मैनेजर साहब जोर से हँसे और बोले, “अरे भाई! मैं वहां कुछ नहीं छिपाता!”

“फिर आप रोज शाम को बैग से निकाल कर वहां क्या डालते हैं?”, लीडर ने आश्चर्य से पूछा।

“देखो!”, मैनेजर साहब गंभीर होते हुए बोले, “ मैं एक प्राइवेट जॉब में हूँ…वो भी सेल्स की…मेरे काम में इतना प्रेशर होता है, इतनी स्ट्रेस होती है कि तुम लोग उसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते!

 रोज किसी नाराज़ कस्टमर के ताने सहने पड़ते हैं…रोज सेल्स टारगेट को लेकर बॉस क्लास लगाता है…रोज ऑफिस पॉलिटिक्स के कारण दिमाग खराब होता है…मैं नहीं चाहता कि इन सब निगेटिव बातों का असर मेरे प्यारे बच्चों और परिवार पर पड़े!

 इसलिए जब मैं शाम को इन तमाम चीजों को लेकर लौटता हूँ तो घर में घुसने से पहले मैं इन्हें एक-एक करके इस आम के पेड़ पर टांग देता हूँ…और कमाल की बात ये है कि जब मैं अगली सुबह इन चीजों को पेड़ से उठाने आता हूँ तो आधी तो पहले ही गायब हो चुकी होती हैं, यानी मैं उन्हें भूल चुका होता हूँ…और जो बचती हैं मैं उन्हें अपने साथ लेता जाता हूँ…”

चोर अब पेड़ का रहस्य समझ चुके थे; वे चोरी में तो कामयाब नहीं हुए लेकिन आज एक बड़ी सीख लेकर घर लौट रहे थे!

दोस्तों, ना जाने क्यों इंसान अपनी life को खुद ही tough बनाता चला जा रहा है। पहले के लोग जहाँ सुख-सुविधाओं के कम होने पर भी खुश रहते थे…tension free रहते थे, आज सब कुछ होने पर भी हम एक stressful life जी रहे हैं। 

इस condition को रातों-रात बदला तो नहीं जा सकता पर एक काम जो हम तुरंत कर सकते हैं वो है अपनी स्ट्रेस का असर अपने परिवार पे ना पड़ने देना।

आपने कई बार सुना भी होगा…office को office में रहने दो घर मत लाओ! शायद पेड़ का ये रहस्य आपको इस बात को अमल करने में मदद करे! तो चलिए, अपने आप से एक वादा करिए कि आज से आप भी बाहर की tension को घर में enter नहीं करने देंगे और ना ही उसका असर अपने beheviour पर आने देंगे…आज से आप भी अपनी negativity को घर के बाहर कहीं टांग आयेंगे!

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