. . . Samved In Hindi | सामवेद जानिए हिन्दी में

Samved In Hindi | सामवेद जानिए हिन्दी में

Samved In Hindi

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इस ब्लॉग में आप Samved In Hindi  के बारे में पढ़ेंगे , जिससे आपको Brahma Purana  के विभिन्न  रूपों के बारे में पता चलेगा ,आशा है की आपको यह ब्लॉग पढ़ने में अच्छी लगेगी । 

* सामवेद - Samved In Hindi


साम‘ शब्द का अर्थ है ‘गान‘। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था। सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 75 से अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं। इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता‘ करते थे। सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं-

1.कौथुमीय,

2.जैमिनीय एवं

3.राणायनीय।

देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता‘ या ‘सूर्य‘ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है।

सामवेद से तात्पर्य है कि वह ग्रन्थ जिसके मन्त्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों।

यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय ये मन्त्र गाये जाते हैं।

सामवेद में मूल रूप से 99 मन्त्र हैं और शेष ऋग्वेद से लिये गये हैं।

इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है।

इसका नाम सामवेद इसलिये पड़ा है कि इसमें गायन-पद्धति के निश्चित मन्त्र ही हैं।

इसके अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद में उपलब्ध होते हैं, कुछ मन्त्र स्वतन्त्र भी हैं।

सामवेद में ऋग्वेद की कुछ ॠचाएं आकलित है।

वेद के उद्गाता, गायन करने वाले जो कि सामग (साम गान करने वाले) कहलाते थे। उन्होंने वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख किया है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।

सामगान व्यावहारिक संगीत था। उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं।

वैदिक काल में बहुविध वाद्य यंत्रों का उल्लेख मिलता है जिनमें से

1.तंतु वाद्यों में कन्नड़ वीणा, कर्करी और वीणा,

2.घन वाद्य यंत्र के अंतर्गत दुंदुभि, आडंबर,

3.वनस्पति तथा सुषिर यंत्र के अंतर्गतः तुरभ, नादी तथा

4.बंकुरा आदि यंत्र विशेष उल्लेखनीय हैं।




* सामवेद से संदेश-उषाकाल में जागना स्वास्थ्यवर्द्धक - Samved In Hindi


सामवेद में कहा गया है कि

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उस्त्रा देव वसूनां कर्तस्य दिव्यवसः।

‘‘उषा वह देवता है जिससे रक्षा के तरीके सीखे जा सकते हैं।’’

ते चित्यन्तः पर्वणापर्वणा वयम्।

‘‘हम प्रत्येक पर्व में तेरा चिंत्न करें’’

प्रातः उठने से न केवल विकार दूर होते हैं वरन् जीवन में कर्म करने के प्रति उत्साह भी पैदा होता है। अगर हम आत्ममंथन करें तो पायेंगे कि हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक विकारों का सबसे बड़ा कारण ही सूर्योदय के बाद नींद से उठना है। हमारी समस्या यह नही है कि हमें कहीं सही इलाज नहीं मिलता बल्कि सच बात यह है कि अपने अंदर विकारों के आगमन का द्वार हम सुबह देरसे उठकर स्वयं ही खोलते हैं। बेहतर है कि हम सुबह सैर करें या योगसाधना करें। व्यायाम करना भी बहुत अच्छा है।



* संदेश-अच्छा काम करने के लिये सत्य ही शस्त्र - Samved In Hindi


अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है। इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।

सामवेद में कहा गया है कि

ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।

‘‘सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।’’

‘‘वार्च वर्थय।

‘‘सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।’’

वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।

‘‘विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है।’’

कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।

सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।



* अथर्ववेद -Samved In Hindi 


अथर्ववेद की भाषा और स्वरूप के आधार पर ऐसा माना जाता है कि इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई थी। अथर्ववेद के दो पाठों, शौनक और पैप्पलद, में संचरित हुए लगभग सभी स्तोत्र ऋग्वेद के स्तोत्रों के छदों में रचित हैं। दोनो वेदों में इसके अतिरिक्त अन्य कोई समानता नहीं है। अथर्ववेद दैनिक जीवन से जुड़े तांत्रिक धार्मिक सरोकारों को व्यक्त करता है, इसका स्वर ऋग्वेद के उस अधिक पुरोहिती स्वर से भिन्न है, जो महान देवों को महिमामंडित करता है और सोम के प्रभाव में कवियों की उत्प्रेरित दृष्टि का वर्णन करता है।

अथर्ववेद’ में ‘आपो देवता’ से सम्बन्धित तीन सूक्त हैं। ये तीनों सूक्त ‘अपां भेषज’ अर्थात् जल चिकित्सा से सम्बन्ध रखते हैं। पाठकों के लाभार्थ उक्त तीनों सूक्त प्रस्तुत हैं- अथर्ववेद प्रथम काण्ड/चतुर्थ सूक्त मंत्रदृष्टाः सिंधुद्वीप ऋषि। देवताः अपांनपात्-सोम-और ‘आपः’। छन्दः 1-2-3 गायत्री, 4 पुरस्तातबृहती। मन्त्र अम्बयो यन्त्यध्वमिर्जामयो अध्वरीयताम्।

पृञ्चतीर्मधुना पयः।।1।।

माताओं बहिनों की भाँति यज्ञ से उत्पन्न पोषक धारणाएँ यज्ञकर्ताओं के लिए ‘पय’ (दूध या पानी) के साथ मधुर रस मिलाती है।

अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह।

तानो हिन्वन्त्वध्वरम्।।2।।

सूर्य के सम्पर्क में आकर पवित्र हुआ वाष्पीकृत जल, उसकी शक्ति के साथ पर्जन्य वर्षा के रूप में हमारे सत्कर्मों को बढ़ाए, यज्ञ को सफल बनाए।

अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः।

सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः।।3।।

हम उस ‘दिव्य आपः’ प्रवाह की अभ्यर्थना करते हैं, जो सिन्धु (अन्तरिक्ष) के लिए ‘हवि’ प्रदान करते हैं। तथा जहाँ हमारी गौएँ (इन्द्रियाँ/वाणियाँ) तृप्त होती हैं।

जीवनी शक्ति, रोगनाशक एवं पुष्टीकारक आदि दैवी गुणों से युक्त ‘आपः’ तत्व हमारे अश्वों व गौओं को वेग एवं बल प्रदान करे। हम बल-वैभव से सम्पन्न हों।




* गायत्री मन्त्र अथर्ववेद के अनुसार - Samved In Hindi


वेदमाता के पावन अनुग्रह से हमें वैदिक तत्वज्ञान का अमृत – प्राशन करने का सुअवसर प्राप्त हो, यही हम सबके हृदय की एक मात्र कामना है – क्योंकि अथर्ववेद के अनुसार इसी से हमारी अन्य सभी इच्छाओं की परिपूर्ति हो जायेगी –

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्‍।

आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्तवा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥

मैंने वरदायिनी वेदमाता की स्तुती की है। यह हम सबको पवित्र करने वाली है। हमारी प्रार्थना है कि यह उन सबको पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करे, जो मानवीय संस्कारों से संपन्न हैं। यह हमें लम्बी आयु, प्राणशक्ति, श्रेष्ठ संतानें, पशु समृद्धि तथा ब्रह्मतेज प्रदान करे और अन्त में ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराये ।

अथर्ववेद के अनुसार वास्तव में गायत्री ही वेदमाता है। इस गायत्री मंत्र से हम सभी सुपरिचित हैं, जो इस प्रकार है –

ओऽम् भूर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो न: प्रचोदयात्‍॥

मन्त्र का सामान्य अर्थ इस प्रकार है –

हम सभी (सवितु: देवस्य) सबको प्रेरित करने वाले देदीप्यमान सविता (सूर्य)  देवता के (तत्‍) उस सर्वव्यापक (वरेण्यम्‍) वरण करने योग्य अर्थात्‍ अत्यन्त श्रेष्ठ (भर्ग:) भजनीय तेज का (धीमहि) ध्यान करते हैं, (य:) जो (न:) हमारी (धिय:) बुद्धियों को (प्रचोदयात्‍) सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता रहता है।

इस मन्त्र को गायत्री मन्त्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह गायत्री छन्द में निबद्ध है। ‘गायत्री’ का शाब्दिक अर्थ है गायक की रक्षा करने वाली – ‘गायन्तं त्रायते’ यह वेद का प्रथम छन्द है जिसमें २४ अक्षर और तीन पाद होते हैं। इसके प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इस मन्त्र को देवता के आधार पर सावित्री मन्त्र भी कहा जाता है, क्योंकि इसके देवता सविता हैं। सामान्य रूप से सविता सूर्य का ही नामान्तर है, जो मानव जीवन को सार्वाधिक प्रभावित करने वाले देवता हैं। अधिक गहराई में जाने पर सविता को सूर्य-मण्डल के विभिन्न देवों में से एक माना जा सकता है।

गायत्री मन्त्र हमारी परम्परा में सर्वाधिक पवित्र और उत्प्रेरक मन्त्र है। इसका जप करते समय भगवान्‍ सूर्य के अरूण अथवा बालरूप का ध्यान करना चाहिये। जप करते समय मन्त्र के अर्थ का भलीभाँति मनन करना चाहिये, जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में कहा है – ‘तज्जपस्तदर्थभावनम्‍।’ किसी भी मन्त्र के जप का अभिप्राय है बार – बार उसके अर्थ की भावना करना, उसे मन और मस्तिष्क में बैठाना । किसी न किसी सन्दर्भ में, यह मन्त्र चारों वेदों में प्राप्त हो जाता है। परम्परा के अनुसार इस मन्त्र का साक्षात्कार सर्वप्रथम महर्षि विश्वामित्र ने किया था। वही इस मन्त्र के द्र्ष्टा अथवा ऋषि हैं। वैदिक पारम्परिक मान्यता के अनुसार वेद-मन्त्रों का कोई रचियता नहीं है। सृष्टि के प्रारम्भ, समाधि अथवा गम्भीर ध्यान की अवस्था में ये ऋषियों के अन्त:करण में स्वयं प्रकट हुए थे। जिस ऋषि ने जिस मन्त्र का दर्शन किया, वही उसका द्रष्टा हो गया। इस मन्त्र का जप विश्व भर में व्याप्त किसी भी उपासना-सम्प्रदाय का कोई भी अनुयायी कर सकता है, क्योंकि बुद्धि की प्रेरणा की आवश्यकता तो सभी समान रूप से अनुभव करते हैं। हाँ, ध्यानजप करने से पूर्व शारीरिक शुद्धि कर लेना आवश्यक है।

किसी भी वेदमन्त्र का उच्चारण करने से पूर्व ‘ओऽम्‍’ का उच्चारण करना आवश्यक है। ‘ओऽम्‍’ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम है – इसमें तीन वर्ण हैं – अकार, उकार और मकार। ‘ओऽम्‍’ के मध्य में लगी तीन (३) की संख्या इसके त्रिमात्रिक अथवा प्लुत उच्चारण की द्योतक है। स्वरों के हृस्व और दीर्घ उच्चारण से हम सभी परिचित हैं – लेकिन वेद में इसके आगे प्लुत उच्चारण की व्यवस्था भी है। हृस्वास्वर के उच्चारण में यदि एक मात्रा का काल लगता है, तो प्लुत में तीन मात्राओं का काल लगता है। ‘ओऽम्‍’ अथवा ओड्‍कार भी विश्व के प्राय: सभी धार्मिक मतों में किसी – न – किसी प्रकार से विद्यमान है ।

‘भू:’, ‘भुव:’ और ‘स्व:’ – ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं। ये तीनों शब्द क्रमश: पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग अथवा द्युलोक के वाचक हैं।



* संदेश-श्रद्धाहीन मनुष्य लालची होते हैं - Samved In Hindi


श्रीमद्भागवतगीता को लेकर हमारे देश में अनेक भ्रम प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह एक पवित्र किताब है और इसका सम्मान करना चाहिए पर उसमें जो तत्वज्ञान है उसका महत्व जीवन में कितना है इसका आभास केवल ज्ञानी लोगों को श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने पर ही हो पाता है। श्रीगीता को पवित्र मानकर उसकी पूजा करना और श्रद्धापूर्वक उसका अध्ययन करना तो दो प्रथक प्रथक क्रियायें हैं। श्रीगीता में ऐसा ज्ञान है जिससे हम न केवल उसके आधार पर अपना आत्ममंथन कर सकते हैं बल्कि दूसरे व्यक्ति के व्यवहार, खान पान तथा रहन सहन के आधार पर उसमें संभावित गुणों का अनुमान भी कर सकते हैं। गीता का ज्ञान एक तरह से दर्पण होने के साथ दूरबीन का काम भी करता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग परमात्मा की निष्काम आराधना करते हुए अपने अंदर ऐसी पवित्र बुद्धि स्थापित होने की इच्छा पालते हैं जिससे वह ज्ञान प्राप्त कर सकें। जब एक बार ज्ञान धारण कर लिया जाता है तो फिर इस संसार के पदार्थों से केवल दैहिक संबंध ही रह जाता है। ज्ञानी लोग उनमें मन फंसाकर अपना जीवन कभी कष्टमय नहीं बनाते।

अथर्ववेद में कहा गया है कि

ये श्रद्धा धनकाम्या क्रव्वादा समासते।

ते वा अन्येषा कुम्भी पर्यादधति सर्वदा।।

‘‘जो श्रद्धाहीन और धन के लालची हैं तथा मांस खाने के लिये तत्पर रहते हैं वह हमेशा दूसरों के धन पर नजरें गढ़ाये रहते हैं।’’

भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठतम्।

सविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।।

‘‘हे मातृभूमि! सभी का कल्याण करने वाली बुद्धि हमें प्रदान कर। प्रतिदिन हमें सभी बातों का ज्ञान कराओ ताकि हमें संपत्ति प्राप्त हो।’’

इस तत्वज्ञान के माध्यम से हम दूसरे के आचरण का भी अनुमान प्राप्त कर सकते हैं। जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है वह कभी भी किसी के सहृदय नहीं हो सकते। भले ही वह स्वार्थवश मधुर वचन बोलें अथवा सुंदर रूप धारण करें पर उनके अंदर बैठी तामसी प्रवृत्तियां उनकी सच्ची साथी हो्रती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्वज्ञान में ज्ञान तथा विज्ञान के ऐसे सूत्र अंतर्निहित हैं जिनकी अगर जानकारी हो जाये तो फिर संसार आनंदमय हो जाता है।



* संदेश-सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर - Samved In Hindi


अथर्ववेद में कहा गया है कि

शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।

कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।

हिन्दी में भावार्थ-हेमनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।

समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।



* संदेश-हिंसक भाव से परे रहें - Samved In Hindi


हिंसा को रोकने के लिये अथर्ववेद में प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि

मा नो हिंसनिधि नो ब्रू हि परिणो वृडग्धि मा मां त्वया समरामहिं।

‘‘मै हिंसा न करूं ऐसा उपदेश दो, मेरी रक्षा करो, मुझे किसी पर क्रोध न आये तथा मैं किसी का विरोध न करूं।’’

हमें परमात्मा से प्रार्थना करना चाहिए कि हमारे अंदर कभी हिंसक भाव या क्रोध न आये तथा हम किसी से झगड़ा न करें। यह बात भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है। आज जब खानपान, रहन सहन तथा पर्यावरण प्रदूषण के कारण् मानव समाज में सहिष्णुता के भाव का ह्रास  हुआ है वहीं भारतीय अध्यात्म से उसकी दूरी ने पूरे विश्व समाज को संकटमय मना दिया है। हिंसा किसी परिणाम पर नहीं पहुंचती। कम से कम सात्विक लोगों की दृष्टि से हिंसा निषिद्ध है। राजस प्रवृत्ति के लोगों को भी हिंसा से बचना चाहिए यदि वह राजकर्म से जुड़े न हों। भगवान राम ने रावण के साथ युद्ध किया था पर उनका लक्ष्य सीता को पाना था। भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी माता तथा पिता के उद्धार के लिये कंस को मारा पर धर्म की स्थापना करने के लिये जिस महाभारत युद्ध में श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दिया उसमें हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की। इससे यह बात तो समझ लेना चाहिए कि हथियार उठाने या प्रत्यक्ष हिंसा में लिप्त रहने वाला मनुष्य कभी धर्म की स्थापना नहीं कर सकता चाहे दावा कितना भी करता हो।


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