. . . Pauranik kathayein | हिन्दी में पौराणिक कथाएँ 2020

Pauranik kathayein | हिन्दी में पौराणिक कथाएँ 2020

                        Pauranik katha



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* अर्जुन-कृष्ण युद्ध - Pauranik katha


एक बार महर्षि गालव जब प्रात: सूर्यार्घ्य प्रदान कर रहे थे, उनकी अंजलि में आकाश मार्ग में जाते हुए चित्रसेन गंधर्व की थूकी हुई पीक गिर गई| मुनि को इससे बड़ा क्रोध आया| वे उए शाप देना ही चाहते थे कि उन्हें अपने तपोनाश का ध्यान आ गया और वे रुक गए| उन्होंने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से फरियाद की| श्याम सुंदर तो ब्रह्मण्यदेव ठहरे ही, झट प्रतिज्ञा कर ली - चौबीस घण्टे के भीतर चित्रसेन का वध कर देने की| ऋषि को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए उन्होंने माता देवकी तथा महर्षि के चरणों की शपथ ले ली|

गालव जी अभी लौटे ही थे कि देवर्षि नारद वीणा झंकारते पहुंच गए| भगवान ने उनका स्वागत-आतिथ्य किया| शांत होने पर नारद जी ने कहा, "प्रभो ! आप तो परमानंद कंद कहे जाते हैं, आपके दर्शन से लोग विषादमुक्त हो जाते हैं, पर पता नहीं क्यों आज आपके मुख कमल पर विषाद की रेखा दिख रही है|" इस पर श्याम सुंदर ने गालव जी के सारे प्रसंग को सुनाकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाई| अब नारद जी को कैसा चैन? आनंद आ गया| झटपट चले और पहुंचे चित्रसेन के पास| चित्रसेन भी उनके चरणों में गिर अपनी कुण्डली आदि लाकर ग्रह दशा पूछने लगे| नारद जी ने कहा, "अरे तुम अब यह सब क्या पूछ रहे हो? तुम्हारा अंतकाल निकट आ पहुंचा है| अपना कल्याण चाहते हो तो बस, कुछ दान-पुण्य कर लो| चौबीस घण्टों में श्रीकृष्ण ने तुम्हें मार डालने की प्रतिज्ञा कर ली है|"

अब तो बेचारा गंधर्व घबराया| वह इधर-उधर दौड़ने लगा| वह ब्रह्मधाम, शिवपुरी, इंद्र-यम-वरुण सभी के लोकों में दौड़ता फिरा, पर किसी ने उसे अपने यहां ठहरने तक नहीं दिया| श्रीकृष्ण से शत्रुता कौन उधार ले| अब बेचारा गंधर्वराज अपनी रोती-पीटती स्त्रियों के साथ नारद जी की ही शरण में आया| नारद जी दयालु तो ठहरे ही, बोले, "अच्छा यमुना तट पर चलो|" वहां जाकर एक स्थान को दिखाकर कहा, "आज, आधी रात को यहां एक स्त्री आएगी| उस समय तुम ऊंचे स्वर में विलाप करते रहना| वह स्त्री तुम्हें बचा लेगी| पर ध्यान रखना, जब तक वह तुम्हारे कष्ट दूर कर देने की प्रतिज्ञा न कर ले, तब तक तुम अपने कष्ट का कारण भूलकर भी मत बताना|

नारद जी भी विचित्र ठहरे| एक ओर तो चित्रसेन को यह समझाया, दूसरी ओर पहुंच गए अर्जुन के महल में सुभद्रा के पास| उससे बोले, "सुभद्रे ! आज का पर्व बड़ा ही महत्वपूर्ण है| आज आधी रात को यमुना स्नान करने तथा दीन की रक्षा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्त होगी|"

आधी रात को सुभद्रा अपनी एक-दो सहेलियों के साथ यमुना-स्नान को पहुंची| वहां उन्हें रोने की आवाज सुनाई पड़ी| नारद जी ने दीनोद्धार का माहात्म्य बतला ही रखा था| सुभद्रा ने सोचा, "चलो, अक्षय पुण्य लूट ही लूं| वे तुरंत उधर गईं तो चित्रसेन रोता मिला|" उन्होंने लाख पूछा, पर वह बिना प्रतिज्ञा के बतलाए ही नहीं| अंत में इनके प्रतिज्ञाबद्ध होने पर उसने स्थिति स्पष्ट की| अब तो यह सुनकर सुभद्रा बड़े धर्म-संकट और असमंजस में पड़ गईं| एक ओर श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा - वह भी ब्राह्मण के ही के लिए, दूसरी ओर अपनी प्रतिज्ञा| अंत में शरणागत त्राण का निश्चय करके वे उसे अपने साथ ले गईं| घर जाकर उन्होंने सारी परिस्थिति अर्जुन के सामने रखी (अर्जुन का चित्रसेन मित्र भी था) अर्जुन ने सुभद्रा को सांत्वना दी और कहा कि तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी होगी|

नारद जी ने इधर जब यह सब ठीक कर लिया, तब द्वारका पहुंचे और श्रीकृष्ण से कह दिया कि, 'महाराज ! अर्जुन ने चित्रसेन को आश्रय दे रखा है, इसलिए आप सोच-विचारकर ही युद्ध के लिए चलें|' भगवान ने कहा, 'नारद जी ! एक बार आप मेरी ओर से अर्जुन को समझाकर लौटाने की चेष्टा करके तो देखिए|' अब देवर्षि पुन: दौड़े हुए द्वारका से इंद्रप्रस्थ पहुंचे| अर्जुन ने सब सुनकर साफ कह दिया - 'यद्यपि मैं सब प्रकार से श्रीकृष्ण की ही शरण हूं और मेरे पास केवल उन्हीं का बल है, तथापि अब तो उनके दिए हुए उपदेश - क्षात्र - धर्म से कभी विमुख न होने की बात पर ही दृढ़ हूं| मैं उनके बल पर ही अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूंगा| प्रतिज्ञा छोड़ने में तो वे ही समर्थ हैं| दौड़कर देवर्षि अब द्वारका आए और ज्यों का त्यों अर्जुन का वृत्तांत कह सुनाया, अब क्या हो? युद्ध की तैयारी हुई| सभी यादव और पाण्डव रणक्षेत्र में पूरी सेना के साथ उपस्थित हुए| तुमुल युद्ध छिड़ गया| बड़ी घमासान लड़ाई हुई| पर कोई जीत नहीं सका| अंत में श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र छोड़ा| अर्जुन ने पाशुपतास्त्र छोड़ दिया| प्रलय के लक्षण देखकर अर्जुन ने भगवान शंकर को स्मरण किया| उन्होंने दोनों शस्त्रों को मनाया| फिर वे भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और कहने लगे, " प्रभो ! राम सदा सेवक रुचि राखी| वेद, पुरान, लोक सब राखी|" भक्तों की बात के आगे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है| इसकी तो असंख्य आवृत्तियां हुई होंगी| अब तो इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए|

बाण समाप्त हो गए| प्रभु युद्ध से विरत हो गए| अर्जुन को गले लगाकर उन्होंने युद्धश्रम से मुक्त किया, चित्रसेन को अभय किया| सब लोग धन्य-धन्य कह उठे| पर गालव को यह बात अच्छी नहीं लगी| उन्होंने कहा, "यह तो अच्छा मजाक रहा|" स्वच्छ हृदय के ऋषि बोल उठे, "लो मैं अपनी शक्ति प्रकट करता हूं| मैं कृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा समेत चित्रसेन को जला डालता हूं|" पर बेचारे साधु ने ज्यों ही जल हाथ में लिया, सुभद्रा बोल उठी, "मैं यदि कृष्ण की भक्त होऊं और अर्जुन के प्रति मेरा प्रतिव्रत्य पूर्ण हो तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे|" ऐसा ही हुआ| गालव बड़े लज्जित हुए| उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और वे अपने स्थान पर लौट गए| तदनंतर सभो अपने-अपने स्थान को पधारे|



* भगवान विष्णु जी और नारद मुनि जी - Pauranik katha


एक बार नारद मुनि जी ने भगवान विष्णु जी से पुछा, हे भगवन आप का इस समय सब से प्रिया भगत कोन है?, अब विष्णु तो भगवान है, सो झट से समझ गये अपने भगत नराद मुनि की बात, ओर मुस्कुरा कर वोले ! मेरा सब से प्रिया भगत उस गांव का एक मामुली किसान है, यह सुन कर नारद मुनि जी थोडा निराश हुये, ओर फ़िर से एक प्रशन किया, हे भगवान आप का बडा भगत तो मै हुं, तो फ़िर सब से प्रिया क्यो नही?
भगवान विष्णु जी ने नारद मुनि जी से कहा, इस का जबाब तो तुम खुद ही दो गे, जाओ एक दिन उस के घर रहो ओर फ़िर सारी बात मुझे बताना,नारद मुनि जी सुबह सवेरे मुंह अंधेर उस किसान के घर पहुच गये, देखा अभी अभी किसान जागा है, ओर उस ने अब से पहले अपने जानवरो को चारा बगेरा दिया, फ़िर मुंह हाथ थोऎ, देनिक कार्यो से निवर्त हुया, जल्दी जल्दी भगवान का नाम लिया, रुखी सूखी रोटी खा कर जल्दी जल्दी अपने खेतो पर चला गया, सारा दिन खेतो मे काम किया|

ओर शाम को वापिस घर आया जानवरो को अपनी अपनी जगह बांधा, उन्हे चारा पानी डाला, हाथ पांओ धोये, कुल्ला किया, फ़िर थोडी देर भगवान का नाम लिया, फ़िर परिवर के संग बेठ कर खाना खाया, ओर कुछ बाते की ओर फ़िर सो गया|

अब सारा दिन यह सब देख कर नारद मुनि जी, भगवान विष्णु के पास वापिस आये, ओर बोले भगवन मै आज सारा दिन उस किसान के संग रहा, लेकिन वो तो ढंग से आप का नाम भी नही ले सकता, उस ने थोडी देर सुबह थोडी देर शाम को ओर वो भी जल्दी जल्दी आप का ध्यान किया, ओर मे तो चोबीस घंटे सिर्फ़ आप का ही नाम जपता हुं, क्या अब भी आप का सब से प्रिय भगत वो गरीब किसान ही है, भगवान विष्णु जी ने नारद की बात सुन कर कहा, अब इस का जबाब भी तुम मुझे खुद ही देना|

ओर भगवान विष्णु जी ने एक कलश अमृत से भरा नारद मुनि को थमाया, ओर बोले इस कलश को ले कर तुम तीनो लोको की परिकिरमा कर के आओ, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बुंद भी अमृत नीचे गिरा तो तुम्हारी सारी भगती ओर पुन्य नष्ट हो जाये गे, नारद मुनि तीनो लोको की परिक्र्मा कर के जब भगवान विष्णु के पास वापिस आये तो , खुश हो कर बोले भगवान मेने एक बुंद भी अमृत नीचे नही गिरने दिया, विष्णु भगवान ने पुछा ओर इस दोराना तुम ने मेरा नाम कितनी बार लिया?मेरा स्मरण कितनी बार किया ? तो नारद बोले अरे भगवान जी मेरा तो सारा ध्यान इस अमृत पर था, फ़िर आप का ध्यान केसे करता|

भगवान विष्णु ने कहा, हे नारद देखो उस किसान को वो अपना कर्म करते हुये भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है, क्यो कि जो अपना कर्म करते हुये भी मेरा जाप करे वो ही मेरा सब से प्रिया भगत हुआ, तुम तो सार दिन खाली बेठे ही जप करते हो, ओर जब तुम्हे कर्म दिया तो मेरे लिये तुम्हारे पास समय ही नही था, तो नारद मुनि सब समझ गये ओर भगवान के चरण पकड कर बोले हे भगवन आप ने मेरा अंहकार तोड दिया, आप धन्य है|



* दुरात्मा कीचक - Pauranik katha


द्रौपदी के साथ पाण्डव वनवास के अंतिम वर्ष अज्ञातवास के समय में वेश तथा नाम बदलकर राजा विराट के यहां रहते थे| उस समय द्रौपदी ने अपना नाम सैरंध्री रख लिया था और विराट नरेश की रानी सुदेष्णा की दासी बनकर वे किसी प्रकार समय व्यतीत कर रही थीं|परस्त्री में आसक्ति मृत्यु का कारण होती है 
राजा विराट का प्रधान सेनापति कीचक सुदेष्णा का भाई था| एक तो वह राजा का साला था, दूसरे सेना उसके अधिकार में थी, तीसरे वह स्वयं प्रख्यात बलवान था और उसके समान ही बलवान उसके एक सौ पांच भाई उसका अनुगमन करते थे| इन सब कारणों के कीचक निरंकुश तथा मदांध हो गया था| वह सदा मनमानी करता था| राजा विराट का भी उसे कोई भय या संकोच नहीं था| उल्टे राजा ही उससे दबे रहते थे और उसके अनुचित व्यवहारों पर भी कुछ कहने का साहस नहीं करते थे|

दुरात्मा कीचक अपनी बहन रानी सुदेष्णा के भवन में एक बार किसी कार्यवश गया| वहां अपूर्व लावण्यवती दासी सैरंध्री को देखकर उस पर आसक्त हो गया| कीचक ने नाना प्रकार के प्रलोभन सैरंध्री को दिए| सैरंध्री ने उसे समझाया, "मैं पतिव्रता हूं| अपने पति के अतिरिक्त किसी पुरुष की कभी कामना नहीं करती| तुम अपना पाप-पूर्ण विचार त्याग दो|"

लेकिन कामांध कीचक ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया| उसने अपनी बहन सुदेष्णा को भी तैयार कर लिया कि वे सैरंध्री को उसके भवन में भेजेंगी| रानी सुदेष्णा ने सैरंध्री के अस्वीकार करने पर भी अधिकार प्रकट करते हुए डांटकर उसे कीचक के भवन में जाकर वहां से अपने लिए कुछ सामग्री लाने को भेजा| सैरंध्री जब कीचक के भवन में पहुंची, तब वह दुष्ट उसके साथ बल प्रयोग करने पर उतारू हो गया| उसे धक्का देकर वह भागी और राजसभा में पहुंची| परंतु कीचक ने वहां पहुंचकर राजा विराट के सामने ही उसके केश पकड़कर भूमि पर पटक दिया और पैर की एक ठोकर लगा दी| राजा विराट कुछ भी बोलने का साहस न कर सके|

सैरंध्री बनी द्रौपदी ने देख लिया कि इस दुरात्मा से विराट उसकी रक्षा नहीं कर सकते| कीचक और भी धृष्ट हो गया| अंत में व्याकुल होकर रात्रि में द्रौपदी भीमसेन के पास गई और रोकर उसने भीमसेन से अपनी व्यथा कही| भीमसेन ने उसे आश्वासन दिया| दूसरे दिन सैरंध्री ने भीमसेन की सलाह के अनुसार कीचक से प्रसन्नतापूर्वक बातें कीं और रात्रि में उसे नाट्यशाला में आने को कह दिया|

राजा विराट की नाट्यशाला अंत:पुर की कन्याओं के नृत्य एवं संगीत सीखने में काम आती थी| वहां दिन में कन्याएं गान-विद्या का अभ्यास करती थीं, किंतु रात्रि में वह सूनी रहती थी| कन्याओं के विश्राम के लिए उसमें एक पलंग पड़ा था, रात्रि का अंधकार हो जाने पर भीमसेन चुपचाप आकर नाट्यशाला के उस पलंग पर सो गए| कामांध कीचक सज-धजकर वहां आया और अंधेरे में पलंग पर बैठकर, भीमसेन को सैरंध्री समझकर उसके ऊपर उसने हाथ रखा| उछलकर भीमसेन ने उसे नीचे पटक दिया और वे उस दुरात्मा की छाती पर चढ़ बैठे|

कीचक बहुत बलवान था| भीमसेन से वह भिड़ गया| दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा, किंतु भीमसेन ने उसे शीघ्र ही पछाड़ दिया और उसका गला घोंटकर उसे मार डाला| फिर उसका मस्तक तथा हाथ-पैर इतने जोर से दबा दिए कि सब धड़ के भीतर घुस गए| कीचक का शरीर एक डरावना लोथड़ा बन गया|

प्रात:काल सैरंध्री ने ही लोगों को दिखाया कि उसका अपमान करने वाला कीचक किस दुर्दशा को प्राप्त हुआ| परंतु कीचक के एक सौ पांच भाइयों ने सैरंध्री को पकड़कर बांध लिया| वे उसे कीचक के शव के साथ चिता में जला देने के उद्देश्य से श्मशान ले गए| सैरंध्री क्रंदन करती जा रही थी| उसका विलाप सुनकर भीमसेन नगर का परकोटा कूदकर श्मशान पहुंचे| उन्होंने एक वृक्ष उखाड़कर कंधे पर रख लिया और उसी से कीचक के सभी भाइयों को यमलोक भेज दिया| सैरंध्री के बंधन उन्होंने काट दिए|

अपनी कामासक्ति के कारण दुरात्मा कीचक मारा गया और पापी भाई का पक्ष लेने के कारण उसके एक सौ पांच भाई भी बुरी मौत मारे गए|



* शनी की महत्त - Pauranik katha


एक समय स्वर्गलोक में सबसे बड़ा कौन के प्रश्न को लेकर सभी देवताओं में वाद-विवाद प्रारम्भ हुआ और फिर परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुंचे और बोले, हे देवराज! आपको निर्णय करना होगा कि नौ ग्रहों में सबसे बड़ा कौन है? देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए। और कुछ देर सोच कर बोले, हे देवगणों! मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूं। पृथ्वीलोक में उज्ज्यिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य का राज्य है। हम राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं क्योंकि वह न्याय करने में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनके सिंहासन में अवश्य ही कोई जादू है कि उस पर बैठकर राजा विक्रमादित्य दूध का दूध और पानी का पानी अलग करने का न्याय करते हैं।
देवराज इंद्र के आदेश पर सभी देवता पृथ्वी लोक में उज्ज्यिनी नगरी में पहुंचे। देवताओं के आगमन का समाचार सुनकर स्वयं राजा विक्रमादित्य ने उनका स्वागत किया। महल में पहुंचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे। क्योकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान शक्तिशाली थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुंच सकती थी। तभी राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत, कांसा, तांबा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक, व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवा कर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा। सब देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा, आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वही सबसे बड़ा है। राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा, राजन! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो। मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा। सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष रहता हूं। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है। राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा। उसके वंश का सर्वनाश हो गया। राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा। राजा विक्रमादित्य शनि देवता के प्रकोप से थोड़ा भयभीत तो हुए, लेकिन उन्होंने मन में विचार किया, मेरे भाग्य में जो लिखा होगा, ज्यादा से ज्यादा वही तो होगा। फिर शनि के प्रकोप से भयभीत होने की आवश्यकता क्या है?

उसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ वहां से चले गए, लेकिन शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से विदा हुए।
राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। उधर शनिदेवता अपने अपमान को भूले नहीं थे। विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्ज्यिनी नगरी में पहुंचे।

राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा। अश्वपाल ने वहां जाकर घोड़ों को देखा तो बहुत खुश हुआ। लेकिन घोड़ों का मूल्य सुन कर उसे बहुत हैरानी हुई। घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया। घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुआ तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा। तेजी से दौड़ता हुआ घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहां गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। लेकिन उसे लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख-प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला। राजा ने उससे पानी मांगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अंगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से बाहर निकलकर पास के नगर में पहुंचा।

राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्ज्यिनी से आया हूं। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई। सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूंटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में अकेला छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूंटी निगल गई। सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का सन्देह राजा पर ही किया, क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था। सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बांधकर नगर के राजा के पास ले चलो। राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूंटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटने का आदेश दे दिया। राजा विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया। कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हांकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ॠतु प्रारम्भ हुई। राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गानेवाले को बुला लाने को कहा। दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार पर बहुत मोहित हुई थी। अत:उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया। राज कुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गये। राजा को लगा कि उसकी बेटी पागल हो गई है। रानी ने मोहिनी को समझाया, च्बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है। फिर तू उस अपंग से विवाह करके अपने पांव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?ज् राजा ने किसी सुंदर राजकुमार से उसका विवाह करने की बात कही। लेकिन राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया। आखिर राजा, रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा,च्राजा! तुमने मेरा प्रकोप देख लिया। मैंने तुम्हें अपने अपमान का दण्ड दिया है।ज् राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की,च्हे शनिदेव! आपने जितना दु:ख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना l शनिदेव ने कुछ सोचते हुए कहा,राजा ! मैं तेरी प्रार्थना स्वीकार करता हूं। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत कर के मेरी कथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी। उसे कोई दुख नहीं होगा। शनिवार को व्रत करने और चींटियों को आटा डालने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।ज् प्रात:काल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पांव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन-ही-मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पांव सही सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई। तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी कह सुनाई। सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुंचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया, क्याेंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था। सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहां एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूंटी ने वह हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।

राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्ज्यिनी पहुंचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। उस रात उज्ज्यिनी नगरी में दीप जलाकर लोगों ने दीवाली मनाई। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई, शनी देव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएं शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनन्दपूर्वक रहने लगे।



* संक्षिप्त हनुमान कथ - Pauranik katha


हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना(एक नारी वानर) के पुत्र के रूप मे हुआ था। अंजना असल मे पुन्जिकस्थला नाम की एक अप्सरा थीं, मगर एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। अंजना केसरी की पत्नी थीं। केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, "केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।संक्षिप्त हनुमान कथा 

केसरी के संग मे अंजना ने भगवान शिव कि बहुत कठोर तपस्या की जिसके फ़लस्वरूप अंजना ने हनुमान(शिव के अन्श) को जन्म दिया।

जिस समय अंजना शिव की आराधना कर रहीं थीं उसी समय अयोध्या-नरेश दशरथ, पुत्र प्राप्ति के लिये पुत्र कामना यज्ञ करवा रहे थे। फ़लस्वरूप उन्हे एक दिव्य फल प्राप्त हुआ जिसे उनकी रानियों ने बराबर हिस्सों मे बाँटकर ग्रहण किया। इसी के फ़लस्वरूप उन्हे राम, लषन, भरत और शत्रुघन पुत्र रूप मे प्राप्त हुए।

विधि का विधान ही कहेंगे कि उस दिव्य फ़ल का छोटा सा टुकडा एक चील काट के ले गई और उसी वन के ऊपर से उडते हुए(जहाँ अंजना और केसरी तपस्या कर रहे थे) चील के मुँह से वो टुकडा नीचे गिर गया। उस टुकडे को पवन देव ने अपने प्रभाव से याचक बनी हुई अंजना के हाथों मे गिरा दिया। ईश्वर का वरदान समझकर अंजना ने उसे ग्रहण कर लिया जिसके फ़लस्वरूप उन्होंने पुत्र के रूप मे हनुमान को जन्म दिया।

अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'।



* हनुमान जी और भीम - Pauranik katha


भीम को यह अभिमान हो गया था कि संसार में मुझसे अधिक बलवान कोई और नहीं है| सौ हाथियों का बल है उसमें, उसे कोई परास्त नहीं कर सकता... और भगवान अपने सेवक में किसी भी प्रकार का अभिमान रहने नहीं देते| इसलिए श्रीकृष्ण ने भीम के कल्याण के लिए एक लीला रच दी|
द्रौपदी ने भीम से कहा, "आप श्रेष्ठ गदाधारी हैं, बलवान हैं, आप गंधमादन पर्वत से दिव्य वृक्ष के दिव्य पुष्प लाकर दें... मैंने अपनी वेणी में सजाने हैं, आप समर्थ हैं, ला सकते हैं| लाकर देंगे न दिव्य कमल पुष्प|"

भीम द्रौपदी के आग्रह को टाल नहीं सके| गदा उठाई और गंधमादन पर्वत की ओर चल पड़े मदमस्त हाथी की तरह| किसी तनाव से मुक्त, निडर... भीम कभी गदा को एक कंधे पर रखते, कभी दूसरे पर रखते| बेफिक्री से गंधमादन पर्वत की ओर जा रहे थे... सोच रहे थे, अब पहुंचा कि तब पहुंचा, दिव्य पुष्प लाकर द्रौपदी को दूंगा, वह प्रसन्न हो जाएगी|

लेकिन अचानक उनके बढ़ते कदम रुक गए... देखा, एक वृद्ध लाचार और कमजोर वानर मार्ग के एक बड़े पत्थर पर बैठा है| उसने अपनी पूंछ आगे के उस पत्थर तक बिछा रखी है जिससे रास्ता रुक गया है| पूंछ हटाए बिना, आगे नहीं बढ़ा जा सकता... अर्थात उस वानर से अपनी पूंछ से मार्ग रोक रखा था और कोई भी बलवान व्यक्ति किसी को उलांघकर मार्ग नहीं बनाता, बल्कि मार्ग की बाधा को हटाकर आगे बढ़ता है| बलवान व्यक्ति बाधा सहन नहीं कर सकता... या तो व बाधा स्वयं हटाता है, या उस बाधा को ही मिटा देता है| इसलिए भीम भी रुक गए|

जब मद, अहंकार और शक्ति बढ़ जाती है तो आदमी अपने आपको आकाश को छूता हुआ समझता है| वह किसी को खातिर में नहीं लाता... और अत्यधिक निरंकुश शक्ति ही व्यक्ति के विनाश का कारण बनती है... लेकिन श्रीकृष्ण तो भीम का कल्याण करना चाहते थे... भीम का विनाश नहीं सुधार चाहते थे|

भीम ने कहा, "ऐ वानर ! अपने पूंछ को हटाओ, मैंने आगे बढ़ना है|"

वानर ने देखा एक बलिष्ठ व्यक्ति गदा उठाए, राजसी वस्त्र पहने, मुकुट धारण किए बड़े रोब के साथ उसे पूंछ हटाने को कह रहा है| हैरान हुआ, पहचान भी गया.. लेकिन चूंकि वह श्रीकृष्ण की लीला थी, इसलिए चुप हो गया| भीम के सवाल का जवाब नहीं दिया|

भीम ने फिर कहा, "वानर, मैंने कहा न कि पूंछ हटाओ, मैंने आगे जाना है, तुम वृद्ध हो, इसलिए कुछ नहीं कह रहा|"

वानर गंभीर हो गया| मन ही मन हंस दिया| कहा, "तुम देख रहे हो, मैं वृद्ध हूं, कमजोर हूं... उठ नहीं सकता| मुझमें इतनी ताकत नहीं कि मैं स्वयं ही अपनी पूंछ हटा लूं... तुम ही कष्ट करो, मेरी पूंछ थोड़ी इधर सरका दो, और आगे निकल जाओ|"

भीम के तेवर कसे... गदा कंधे से हटाई... नीचे रखी| इस वानर ने मेरे बल को ललकारा है, आखिर है तो एक पूंछ ही, वह भी वृद्ध वानर की| कहा, "यह मामूली सी पूंछ हटाना भी कोई मुश्किल है, यह तुमने क्या कह दिया? मैंने बहुत बलवानों को परास्त किया है, धूल चटाई है, सौ हाथियों का बल है मुझमें...|"

इतना कह कर भीम ने अपने बाएं हाथ से पूंछ को यों पकड़ा, जैसे एक तिनके को पकड़ रहा है कि उठाया, हवा में उड़ा दिया... लेकिन भीम से वह पूंछ हिल भी नहीं सकी| हैरान हुआ... फिर उसने दाएं हाथ से पूंछ को हटाना चाहा... लेकिन दाएं हाथ से भी पूंछ तिलमात्र नहीं हिली... भीम ने वानर की तरफ देखा... वानर मुस्करा रहा था|

भीम को गुस्सा आ गया| भीम ने दोनों हाथों से भरपूर जोर लगाया... एक पांव को पत्थर पर रखकर, आसरा लेकर फिर जोर लगाया... दो-तीन बार... लेकिन हर बार भीम हताश हुआ... जिस पूंछ को भीम ने मामूली और कमजोर वानर की पूंछ समझा था... उसने उसके पसीने छुड़वा दिए थे...

और भीम थककर, निढाल होकर एक तरफ खड़ा हो गया| सोचने लगा... यह कोई मामूली वृद्ध वानर नहीं है... यह दिव्य व्यक्ति है और इसकी असीम शक्ति का मैं सामना नहीं कर पाऊंगा... विनम्र और झुका हुआ व्यक्ति ही कुछ पाता है, अकड़ उसे ले डूबती है, ताकत काफूर हो जाती है और भीम वाकई वृद्ध वानर के सामने कमजोर लगने लगा... मद और अहंकार काफूर हो गया... और जब मद और अहंकार मिटता है... तभी भगवान की कृपा होती है|

भीम ने कहा, "मैं आपको पहचान नहीं सका... जिसकी पूंछ को मैं उठा नहीं सका वह कोई मामूली वानर नहीं हो सकता... मुझे क्षमा करें, कृपया अपना परिचय दें|"

वानर उठ खड़ा हुआ... आगे बढ़ा और भीम को गले लगा लिया, कहा, "भीम, मैं तुम्हें पहचान गया था| तुम वायु पुत्र हो... मैं पवन पुत्र हनुमान हूं, श्रीराम का सेवक... श्रीराम का सेवक होने के सिवा मेरी कोई पहचान नहीं और उन्हीं के आदेश पर मैं इस मार्ग पर लेटा हूं... ताकि तुम्हें, तुम्हारी असलियत बता दूं... रिश्ते से मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं और इसीलिए बड़े भाई का कर्तव्य निभाते हुए प्रभु के आशीर्वाद से तुम्हें याद दिला रहा हूं... शक्ति का, ताकत का अभिमान न करो... क्योंकि यह ताकत और बल तुम्हारा नहीं| भगवान ने ही इसे दिया है... यह शरीर भी तो परमात्मा ने दिया है... और जो चीज परमात्मा की है, वह किसी और की कैसे हो सकती है| इसलिए जो जिसने दिया है, उसके लिए उसी का धन्यवाद करना चाहिए| परमात्मा की शक्ति के अलावा किसी की क्या शक्ति हो सकती ई|"

भीम की आंखें खुलीं... त्रेता युग की श्रीराम और हनुमान जी की वीर गाथाएं याद आ गईं... प्रेम से, श्रद्धा से भीम की आंखें भी खुल गईं और भावों के इसी प्रवाह में, भीम ने हनुमान जी को समुद्र लांघने के समय पर धारण किए गए विशाल रूप का दर्शन कराने का अनुरोध कर दिया|

और हुनमान जी ने श्रीराम की कृपा से अपना आकार, वैसा ही बढ़ाया जैसा उन्होंने सौ योजन समुद्र लांघने के समय धारण किया था| यह देख भीम हैरान रह गया| वह कभी हनुमान जी के चरणों में देखता और कभी उनके आकाश छूते मस्तक को... जिसे वह देख ही नहीं पा रहा था|

हनुमान जी ने कहा, "भीम, मेरे इस रूप को तुम देख नहीं पा रहे... लेकिन मैं श्रीराम की कृपा से, इससे भी बड़ा रूप धारण कर सकता हूं|"

भीम ने हाथ जोड़कर सिर झटक दिया और हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ा|

भौतिक पद, प्रतिष्ठा और धन का अभिमान कैसा? ये तो कभी भी नष्ट हो सकते हैं| भौतिक पदार्थ, भौतिक सुख ही देते हैं... लेकिन परमात्मा की कृपा तो शाश्वत होती है... जिसे कोई छीन नहीं सकता| चोर चुरा नहीं सकता| आदमी को उसी दायरे में रहना चाहिए, जिसमें परमात्मा रखे... परमात्मा की इच्छा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिल सकता| इंसान की जिंदगी का क्या भरोसा... किसी भी मोड़ पर, चार कदम की दूरी पर, खत्म हो सकती है|



* राधा-कृष्ण - Pauranik katha


सतयुग और त्रेता युग बीतने के बाद जब द्वापर युग आया तो पृथ्वी पर झूठ, अन्याय, असत्य, अनाचार और अत्याचार होने लगे और फिर प्रतिदिन उनकी अधिकता में वृद्धि होती चली गई| अधर्म के भार से पृथ्वी दुखित हो उठी| उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पास पहुंचकर प्रार्थना की कि वे उसे इस असहनीय भार से मुक्त करें|
लेकिन वे तीनों ही पृथ्वी को इस भार से मुक्त करने में असमर्थ थे| कोई उपाय न देखकर विष्णु ने कहा "चलिए, हम लोग भगवान के पास चलें| वही हमें कोई उपाय बता सकेंगे|"

विष्णु लक्ष्मी, ब्रह्मा और शिव के साथ गोलोक में पहुंचे तो उन्होंने परब्रह्म परमेश्वर को कृष्ण के रूप में और उनकी माया को राधा के रूप में देखा| गोलोक के वृंदावन नामक सुंदर और सुरम्य वन में एक सुंदर आश्रम था| उसी के निकट एक नदी बह रही थी|

विष्णु ने परब्रह्म परमेश्वर को पृथ्वी के दुख की गाथा सुनाई तो उन्होंने कहा, "मैं पृथ्वी के दुख से परिचित हूं| पृथ्वी को भारमुक्त करने के लिए शीघ्र ही मैं ब्रज में कृष्ण के रूप में अवतार लेने वाला हूं| मैं वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा| और क्योंकि मैं अपनी माया से और मेरी माया मुझसे पृथक नहीं रह सकती इसलिए मेरी माया राधा के रूप में बरसाने में वृषभानु गोप के घर में जन्म लेगी| और उसके बाद मैं पृथ्वी को इस भार से मुक्ति दिलाने का प्रयास करूंगा| क्योंकि एक-एक पापी का वध करना कठिन है| इसलिए मैं ऐसा उपाय करूंगा कि संसार के समस्त पापी स्वयं ही लड़-भिड़ कर पृथ्वी को भार हीन बना दें| आप लोग निश्चिंत होकर अपने-अपने को पधारिए और मेरे आदेशों को प्रतीक्षा कीजिए|

विष्णु आदि देवताओं ने परमेश्वर को प्रणाम किया और अपने-अपने लोक में आकर परमपिता के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे|

कुछ समय बाद ही अत्याचारी और अनाचारी मथुरा नरेश कंस के कारागार में बंदी वासुदेव की पत्नी देवकी ने एक बालक को जन्म दिया| बालक के रूप में जन्म लेने से पूर्व ही भगवान ने उन्हें अपनी योजना बताते हुए आदेश दिया था कि वासुदेव जी उन्हें गोकुल में नंदगोप की पत्नी यशोदा के पास छोड़ आएं और उसी समय उनके गर्भ से जन्म लेने वाली कन्या को लाकर कंस के हवाले कर दें| वह कन्या मेरी योगमाया है|

वासुदेवने ऐसा ही किया और कृष्ण गोकुल में नंद गोप की पत्नी यशोदा की गोद में पलने लगे| उसी समय उनकी माया ने भी राधा के रूप में बरसाने के वृषभानु गोप की पत्नी के गर्भ से जन्म लिया जिसका नाम माता-पिता ने बड़े चाव से राधा रख दिया|

दो अलग-अलग गांवों में रहते हुए भी राधा और कृष्ण बचपन से ही एक दूसरे को चाहने लगे थे| वन में गाएं चराते हुए अक्सर राधा से कृष्ण की भेंट हो जाया करती थी| फिर जब वे दोनों बड़े हो गए तो जब भी रात की बेला में कृष्ण अपनी बांसुरी के स्वरों द्वारा अपनी प्रियतमा राधा को पुकारते राधा अपनी सहेली गोपबालाओं के साथ कृष्ण के पास पहुंच जाती| राधा और कृष्ण का यह प्रेम दो किशोर लड़के-लड़की का प्रेम था जो थोड़े से दिनों में ही पुरे ब्रज में चर्चित हो गया|

नंद बाबा और यशोदा ने चाहा कि कृष्ण का विवाह राधा के साथ कर दिया जाए| उधर बरसाने में वृषभानु और उनकी पत्नी कलावती की भी यही इच्छा थी|

एक शुभ दिन देखकर राधा और कृष्ण की सगाई कर दी गई| पूरा ब्रज प्रदेश आनंदोल्लास भरे उत्सवों से भर गया| लेकिन उन दोनों का विवाह नहीं हो पाया था कि कंस के आदेश पर अक्रूर कृष्ण को बुलाने के लिए मथुरा से वृंदावन पहुंच गए और अत्याचारी कंस तथा राक्षसी स्वभाव वाले उसके अनुचरों का वध करने के लिए कृष्ण को बलराम के साथ वृंदावन छोड़कर मथुरा जाना पड़ा और मथुरा में कंस आदि का वध करने के बाद मथुरा राज्य की सुरक्षा के उत्तरदायित्व ने कृष्ण को इतना उलझा दिया कि वह चाह कर भी वृंदावन नहीं जा सके| अपने जामाता कंस के वध का बदला लेने के लिए उसके ससुर जरासंध ने अपनी विशाल सेना के साथ मथुरा को घेर लिया, लेकिन कृष्ण और बलराम ने अपने पराक्रम से जरासंध और उसकी विशाल सेना को पीठ दिखाकर भागने पर विवश कर दिया|

लेकिन जरासंध पराजित होकर भी शान्त नहीं बैठा| उसके कई बार मथुरा पर आक्रमण किए| मथुरा एक छोटा-सा राज्य था और मथुरा नगर को सुरक्षित स्थान पर नहीं बसाया गया था| अत:कृष्ण ने मथुरा छोड़कर अन्य कहीं जाने का निश्चय कर लिया और जरासंध की विशाल सेना के बीच से मथुरावासियों को सुरक्षित निकालकर हजारों योजन दूर भारतवर्ष के पश्चिमी सागर तट पर ले गए और द्वारका नगर की स्थापना करके एक शक्तिशाली यादव राज्य स्थापित कर दिया|

अक्रर के साथ मथुरा छोड़कर आने के बाद कृष्ण और राधा का मिलन फिर कभी नहीं हुआ| लेकिन वे आजीवन एक दूसरे को भूल नहीं पाए| वैभव संपन्न द्वारका में अनेक सुदंर पत्नियों का प्यार पाकर भी वह राधा के प्यार को नहीं भूल पाए|

और संसार आज भी राधा-कृष्ण के प्रेम को एक आदर्श प्रेम के महान तथा अमर प्रतीक के रूप में याद करता है| उनकी मूर्तियां भारत के मंदिरों में ही नहीं विदेशों में भी अनेक मंदिरों में प्रतिष्ठित हैं, और लोग बड़े भक्ति भाव से उनकी पूजा-आराधना करते हैं|



* शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाते हैं - Pauranik katha


आनंद रामायण की एक कथा के अनुसार लंका पर चढ़ाई के लिए समुद्र पर बांधे गए पुल की सुरक्षा का भार हनुमानजी को सौंपा गया था। हनुमानजी रात में भगवान राम का ध्यान करते हुए पुल की रक्षा कर रहे थे कि वहां शनिदेव आ पहुंचे और उन्हें व्यंग्यबाणों से परेशान करने लगे।

हनुमानजी ने शनिदेव के सारे आक्षेपों को स्वीकार करते हुए कहा कि कृपया वह उन्हें पुल की रक्षा करने दें, लेकिन शनिदेव बाज नहीं आए। अंतत: क्रोधित होकर हनुमानजी ने शनिदेव को अपनी पूंछ में जकड़ कर इधर-उधर पटकना शुरू कर दिया। काफी देर बाद हनुमानजी ने उन्हें मुक्त किया और दर्द से निजात पाने के लिए एक तेल लगाने को दिया। इसके बाद से ही शनिदेव को तेल चढ़ाते हैं।




* मायावी घटोत्कच -Pauranik katha 


भीमसेन का विवाह हिडिंबा नाम की एक राक्षसी के साथ भी हुआ था| वह भीमसेन पर आसक्त हो गई थी और उसने स्वयं आकर माता कुंती से प्रार्थना की थी कि वे उसका विवाह भीमसेन के साथ करा दें| कुंती ने उस विवाह की अनुमति दे दी, लेकिन भीमसेन ने विवाह करते समय यह कवच उससे ले लिया कि एक संतान पैदा होने के पश्चात वह संबंध तोड़ लेगा| भीमसेन ने कुछ दिन तक हिडिंबा के साथ सहवास किया, इससे वह गर्भवती हो गई और उसके गर्भ से एक बड़ा विचित्र बालक पैदा हुआ, जिसका मस्तक हाथी के मस्तक जैसा और सिर केश-शून्य था| इसी कारण उसका नाम घटोत्कच (घट=हाथी का मस्तक और उत्कच=केशहीन) पड़ा|

चूंकि घटोत्कच की माता एक राक्षसी थी, पिता एक वीर क्षत्रिय था, इसलिए इसमें मनुष्य और राक्षस दोनों के मिश्रित गुण विद्यमान थे| यह बड़ा क्रूर और निर्दयी था| पाण्डवों का बड़ा आत्मीय था| पांचों भाई इसको अपना पुत्र समझकर प्यार करते थे, इसलिए यह उनके लिए मर-मिटने को सदैव तत्पर रहता था|

महाभारत युद्ध के बीच इसने अपना पूर्ण पौरुष दिखाया था| देखा जाए तो इसने वह काम किया, जो एक अच्छे से अच्छा महारथी नहीं कर पाता| कर्ण सेनापति बनकर कौरवों के पक्ष से युद्ध कर रहा था| वह बड़ा अद्भुत योद्धा था| उसके पास इंद्र की दी हुई ऐसी शक्ति थी जिससे वह किसी भी पराक्रमी से पराक्रमी योद्धा को मार सकता था, वह शक्ति कभी खाली जा ही नहीं सकती थी| वैसे कर्ण की निगाह अर्जुन पर लगी हुई थी| वह उस शक्ति के द्वारा अर्जुन का वध करना चाहता था| श्रीकृष्ण इसको समझते थे, इसी कारण उन्होंने घटोत्कच को रण-भूमि में उतारा| इस राक्षस ने आकाश से अग्नि और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाना, आरंभ किया, उससे कौरव-सेना में हाहाकर मच उठा| सभी त्राहि-त्राहि करके भागने लगे| कर्ण भी इसकी मार से घबरा गया| उसने अपनी आखों से देखा कि इस तरह तो कुछ ही देर में सारी कौरव सेना नष्ट हो जाएगी, तब लाचार होकर उसने घटोत्कच पर उस अमोघ शक्ति का प्रयोग किया| उससे तो कैसा भी वीर नहीं बच सकता था| अत: घटोत्कच क्षण-भर में ही निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा| श्रीकृष्ण को इससे बड़ी प्रसन्नता हुई| पाण्डवों को उसकी मृत्यु से दुख हुआ था, लेकिन श्रीकृष्ण ने सारी चाल उनको समझाकर उन्हें संतुष्ट कर दिया|



* कृष्ण रूक्मणी विवाह कथ - Pauranik katha


विदर्भ के राजा भीष्मक की कन्या रूक्मिणी थी, रूक्मिणी के भाई थे रूक्म। रूक्म अपनी बहन की शादी शिशुपाल से करना चाहता था परंतु देवी रूक्मणी अपने मन में श्री कृष्ण को पति मान चुकी थी। अत: देवी रूक्मणी ने श्री कृष्ण को एक पत्र लिखा। पत्र प्राप्त कर श्री कृष्ण विदर्भ पहुंचे और स्वयंवर के दिन रूक्मणी को लेकर अपने साथ चल दिए। रूम्मणी के हरण की बात जानकर शिशुपाल जिससे रूक्मणी की शादी होने वाली थी वह तथा उसका भाई रूक्म अपनी अपनी सेना लेकर कृष्ण को सजा देने के लिए आगे आये लेकिन श्री कृष्ण ने सभी को पराजित कर दिया और रूक्मणी सहित अपने राज्य को लौट आये जहां राक्षस विधि से कृष्ण और रूक्मणी का विवाह सम्पन्न हुआ।



* ऐसे बचाई द्रौपदी की लाज - Pauranik katha


युधिष्ठिर जुए में अपना सर्वस्व हार गए थे| छलपूर्वक, शकुनि ने उनका समस्त वैभव जीत लिया था| अपने भाइयों को, अपने को और रानी द्रौपदी को भी बारी-बारी से युधिष्ठिर ने दांव पर रखा| जुआरी की दुराशा उसे बुरी तरह ठगती रहती है - 'कदाचित अबकी बार सफलता मिले|' किंतु युधिष्ठिर प्रत्येक दांव हारते गए| जब वे द्रौपदी को भी हार गए, तब दुर्योधन ने अपने छोटे भाई दु:शासन के द्वारा द्रौपदी को उस भरी सभा में पकड़ मंगवाया| दुरात्मा दु:शासन पांचाली के केश पकड़कर घसीटता हुआ उन्हें सभा में ले आया| द्रौपदी रजस्वला थे और एक ही वस्त्र पहने थी| विपत्ति यहीं समाप्त नहीं हुई| दुर्योधन ने अपनी जांघ खोलकर दिखाते हुए कहा, "दु:शासन ! इस कौरवों की दासी को नंगा करके यहां बैठा दो|"

सभा भरी थी| वहां धृतराष्ट्र थे, पितामह थे, द्रोणाचार्य थे| सैकड़ों सभासद थे| वयोवृद्ध विद्वान थे, शूरवीर थे और सम्मानित पुरुष भी थे| ऐसे लोगों के मध्य पांडवों की वह महारानी, जिसके केश राजसूय के अवभूथ स्नान के समय सिंचित हुए थे, जो कुछ सप्ताह पूर्व ही चक्रवर्ती सम्राट के साथ साम्राज्ञी के रूप में समस्त नरेशों द्वारा वंदित हुई थी, रजस्वला होने की स्थिति में केश पकड़कर घसीट लाई गई और अब उसे नग्न करने का आदेश दिया जा रहा है|

होने को वहां विदुर भी थे, किंतु उनकी बात कौन सुनता? द्रौपदी ने अनेक बार पूछा, "युधिष्ठिर जब अपने-आपको हार चुके थे, तब उन्होंने मुझे दांव पर लगाया था, अत: धर्मत: मैं हारी गई या नहीं?" किंतु भीष्म जैसे धर्मज्ञों ने भी कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया| जिसकी भुजाओं में दस हजार हाथियों का बल था, उस दुरात्मा दु:शासन ने द्रौपदी की साड़ी पकड़ ली|

"मेरे त्रिभुवन विख्यात शूरवीर पति !" द्रौपदी व्याकुल होकर इधर-उधर देख रही थी कि कोई उसकी रक्षा करेगा, किंतु पांडवों ने लज्जा तथा शोक के कारण मुख दूसरी ओर कर लिया था|

आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म, धर्मात्मा कर्ण... द्रौपदी ने देखा कि उसका कोई सहायक नहीं| कर्ण तो उलटे दु:शासन को प्रोत्साहित कर रहा है और भीम, द्रोण आदि बड़े-बड़े धर्मात्माओं के मुख दुर्योधन द्वारा अपमानित होने की आशंका से बंद हैं और उनके मस्तक नीचे झुके हैं|

एक वस्त्रा अबला नारी - उसकी एकमात्र साड़ी को दु:शासन अपनी बल बलभरी मोटी भुजाओं के बल से झटके से खींच रहा है| कितने क्षण द्रौपदी साड़ी को पकडे रह सकेगी? कोई नहीं-कोई नहीं, उसकी सहायता करने वाला| उसके नेत्रों से झड़ी लग गई, दोनों हाथ साड़ी छोड़कर ऊपर उठ गए| उसे भूल गई राजसभा, भूल गई साड़ी, भूल गया शरीर| वह कातर स्वर में पुकार उठी, "श्रीकृष्ण ! द्वारकानाथ, देव-देव ! गोपीजन प्रिय ! जगन्नाथ ! इन दुष्ट कौरवों के सागर में मैं डूब रही हूं, दयामय ! मेरा उद्धार करो|"

द्रौपदी पुकारने लगी - पुकारती रही उस आर्तिनाशन असहाय के सहायक करुणार्णव को| उसे पता नहीं था कि क्या हुआ या हो रहा है| सभा में कोलाहल होने लगा| लोग आश्चर्यचकित रह गए| दु:शासन पूरी शक्ति से द्रौपदी की साड़ी खींच रहा था| वह हांफने लगा था, थक गईं थीं दस सहस्त्र हाथियों का बल रखने वाली उसकी भुजाएं| द्रौपदी की साड़ी से रंग-बिरंगे वस्त्रों का अंबार निकलता जा रहा था| वह दस हाथ की साड़ी पांचाली के शरीर से तनिक भी हट नहीं रही थी| वह तो अनंत हो चुकी थी| दयामय द्वारकानाथ रजस्वला नारी के उस अपवित्र वस्त्र में ही प्रविष्ट हो गए थे| आज उन्होंने वस्त्रावतार धारण कर लिया था और अब उनके अनंता का ओर-छोर कोई कैसे पा सकता था?

"विदुर ! यह कोलाहल कैसा है?" अंधे राजा धृतराष्ट्र ने घबराकर पूछा|

महात्मा विदुर ने बताया, "दु:शासन द्रौपदी की साड़ी खींचते-खींचते थक चुका है| वस्त्रों का ढेर लग गया है| आश्चर्यचकित सभासदों का यह कोलाहल है| साथ ही आपकी यज्ञशाल में श्रृंगाल घुस आए हैं और रो रहे हैं| दूसरे भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं| द्रौपदी सर्वेश्वर श्रीकृष्ण को पुकारने में तन्मय हो रही है| उन सर्वसमर्थ ने अभी तो उनकी साड़ी बढ़ा दी है, किंतु यदि शीघ्र पांचाली को प्रसन्न नहीं करते तो श्रीकृष्ण का महाचक्र कब प्रकट होकर एक क्षण में आपके पुत्रों को नष्ट कर देगा - यह कोई नहीं कह सकता| आपके सभासद तो भय-व्याकुल होकर कोलाहल करते हुए दुर्योधन की जो निंदा कर रहे हैं, उसे आप सुन ही रहे हैं|"

धृतराष्ट्र को भय लगा| उन्होंने दुर्योधन का फटकारा| दु:शासन ने द्रौपदी की साड़ी छोड़ दी और चुपचाप अपने आसन पर बैठ गया| वह समझे या न समझे, पांडव तथा भीस्म जैसे भगवद्भक्तों को यह समझना नहीं था कि द्रौपदी की लज्जा-रक्षा कैसे हुई?



* धर्मराज युधिष्ठिर - Pauranik katha


युधिष्ठिर पांडु का ज्येष्ठ पुत्र था| धर्मराज द्वारा कुंती के आह्वान पर बुलाए जाने पर उनके अंश से ही यह पैदा हुआ था, इसलिए धर्म और न्याय इसके चरित्र में कूट-कूटकर भरा था| इसी के कारण इसको धर्मराज युधिष्ठिर पुकारा जाता था| वह कभी असत्य नहीं बोलता था, तभी शत्रु पक्ष के लोग भी उनकी बात पर पूरा विश्वास करते थे| स्वार्थ के कारण किसी प्रकार अनुचित कार्य करना इनको नहीं सुहाता था|

वह धीरबुद्धि था| कभी उतावला होकर कोई कार्य नहीं करता था| भीम, अर्जुन तथा अन्य भाइयों को कभी-कभी गुस्सा आता था तो वे मर्यादा की सीमाओं को भी लांघने को तैयार हो जाते थे, लेकिन युधिष्ठिर ने कभी सत्य के मार्ग को नहीं छोड़ा| अगर उसके चरित्र को अच्छी तरह देखा जाए तो वह व्यक्ति क्षत्रिय अवश्य था, लेकिन एक योद्धा क्षत्रिय न होकर दार्शनिक क्षत्रिय था| उसकी चेतना केवल क्षत्रिय की सीमाओं के अंदर ही सीमित नहीं थी, बल्कि वह प्राय: जीवन के विराट् सत्यों पर चिंतन किया करता था| छल-कपट उसे छू तक नहीं गया था| राजा होने पर भी कूटनीति से उसने कभी काम नहीं लिया| क्षमा सदा उसके व्यवहार में रही| बड़े-से-बड़े अपराधी को भी वह क्षमा कर देता था| गुरुदेव द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने प्रतिहिंसा की आग में जलकर द्रौपदी के पांचों पुत्रों को सोती अवस्था में मार दिया था| इससे बड़ा अपराध और क्या हो सकता था| एक तो पुत्रों की हत्या, वंश नाश करने की कुचेष्टा और इस तरह अन्याय से, लेकिन युधिष्ठिर ने उस आततायी अश्वत्थामा को भी क्षमा कर दिया| उस समय अश्वत्थामा का वध करने के लिए तुले हुए पाण्डव उसके सामने कुछ नहीं बोल पाए थे| उसकी आत्मिक शक्ति इतनी अधिक थी कि एक बार तो कितने भी क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति उसके सामने सिर झुका देता था|

स्वभाव से वह सहनशील था| दूसरों की क्षुद्रता पर रोष करना उसे नहीं आता था| कौरवों ने क्या-क्या कुचक्र नहीं रचे| उन्होंने अपने ही भाई पांडवों को वारणावत भेज दिया और वहां लाक्षागृह में ठहराया| वहां से उनको सुरंग लगाकर भागना पड़ा| और इस तरह दुर्योधन का वह षडयंत्र निष्फल चला गया, लेकिन युधिष्ठिर को इस पर भी क्रोध नहीं आया| उसने कभी भी अपने मुंह से यह बात नहीं कही कि दुर्योधन को नष्ट कर देना चाहिए| सच देखा जाए तो वह पूरी तरह निष्काम कर्म योगी था| इस भौतिक संसार के सुख और दुख उसको अधिक विचलित नहीं करते थे| बच्चों के समान सरल उसकी प्रकृति थी| दूसरों के बनाए षडयंत्रों को वह नहीं जान पाता था| इसका कारण यही था कि उसकी दृष्टि निरंतर जीवन की सुंदरता पर रहती थी| जीवन का पक्ष वह अच्छी तरह नहीं जानता था| भाई और मित्र पर पूरी तरह विश्वास करता था| एक सफल कूटनीतिज्ञ की तरह संदेह करना उसे नहीं आता था, तभी उसने दुर्योधन का जुआ खेलने का प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया| राजसूय यज्ञ के पश्चात उसके वैभव को देखकर वृद्ध धृतराष्ट्र के मन में ईर्ष्या जाग उठी थी| उधर, दुर्योधन भी अंदर-ही-अंदर इस सारे वैभव से जल रहा था| उन्होंने ही जुए के रूप में युधिष्ठिर का सबकुछ छीनने का षडयंत्र रचा था| उसी के लिए शकुनि तैयार किया गया था, जिसने प्रारंभ से अंत तक छल किया और अंत में युधिष्ठिर को हरा दिया| उस समय युधिष्ठिर धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मन के भाव नहीं जान पाया था| उसकी तो उनके प्रति पहले जैसी ही श्रद्धा थी| जुए में वह सबकुछ हार गया| यहां तक कि अपनी प्रिय पत्नी द्रौपदी और अपने प्यारे भाइयों को भी उसने दांव पर लगा दिया| उनको भी वह हार गया| उसकी सरलता के कारण ही उसकी यह पराजय हुई थी| उसके बाद जब द्रौपदी का भरी सभा में अपमान किया गया तो वह कुछ भी नहीं बोला| इसका कारण उसकी न्याय-प्रवृत्ति थी| द्रौपदी उसके दांव पर लगाने के कारण कौरवों की दासी हो गई थी, इसलिए दासी के साथ वे किसी प्रकार का व्यवहार कर सकते थे| यही उस समय समाज की मर्यादा थी| भला इसके विरुद्ध युधिष्ठिर कैसे जाता| इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्य और मर्यादा के पीछे वह धर्मात्मा अपने परिजनों को कितने भी कष्ट में देख सकता था|

बारह वर्ष तक वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास का दुख उसकी इस भूल के कारण सभी को सहना पड़ा था| लेकिन फिर भी उनके मन में इसके प्रति खेद नहीं था, बल्कि एह प्रकार का संतोष और सुख था कि वह अपने धर्म का पालन कर रहा है और उसने वनवास और अज्ञातवास की वह अवधि पूरी की| उस बीच कभी यह विचार उसके मन में नहीं आया कि कौरवों ने यह कुचक्र रचकर ही हमें वनवास दिया है| फिर इसको स्वीकार करके क्यों कष्ट भोगा जाए? वह सत्यवादी था| एक बार वचन देकर लौटना तो जानता ही नहीं था| वनवास के समय अन्य भाई कभी-कभी विक्षुब्ध हो उठते थे और कहते थे कि कौरवों के इस अन्याय को स्वीकार करना भी कौन-सा धर्म है? उधर, द्रौपदी भी निरंतर कौरवों के इस कुचक्र का बदला लेने के लिए युधिष्ठिर को उभारा करती, लेकिन वह धीर बुद्धि कभी भावावेश में आकर अनुचित पथ का अनुसरण नहीं करता था| वह द्रौपदी को समझाया करता था कि मनुष्य का सबसे बड़ा सुख तो उसके जीवन का सत्य है| यदि वह उसने छोड़ दिया तो धन-धान्य तथा अन्य राजसी ऐश्वर्य उसकी आत्मा को कभी संतोष नहीं पहुंचा सकते| असंतोष और तृष्णा ही तो जीवन में दुख का हेतु हैं, इन्हीं को जीतना जीवन की सबसे बड़ी विजय है| इस दृष्टि से युधिष्ठिर विजयी था| उसका चेहरा सदा प्रशांत भाव से देदीप्यमान रहता था| उसके इसी गुण के कारण ही सभी उसकी आज्ञा मानते थे| उसने अपने चरित्र से पूरी तरह सिद्ध कर दिया था कि महात्मा ही इस संसार में पूज्य हैं, बाकी अन्य बड़े-से-बड़े सम्राट भी अपने कार्यों के द्वारा घृणा के पात्र हो जाते हैं| महात्मा ही अमर होता है, अन्य सभी को काल निगल जाता है और शीघ्र ही उनकी स्मृति मिट जाती है| देखा जाए तो महाभारत का प्रमुख पात्र युधिष्ठिर ही है| जो अपने युग की सीमाओं के भीतर रहकर भी जीवन के विराट् सत्यों की ओर पूरी तरह सजग रहता है| अन्य कोई पात्र इस गौरव को नहीं पहुंचता| वही था जिसने कुत्ते को भी स्वर्ग का अधिकारी बनवाया था| समाजगत भेद-भावों को वह छोटी परिधि के सत्य मानता था, तभी तो उसने उस स्वर्ग में जाने से इनकार कर दिया था, जहां उसकी-सी ही आत्मा रखने वाले कुत्ते को प्रविष्ट करने का अधिकार न हो| क्या युधिष्ठिर के अलावा और व्यक्ति उस समय के समाज में यह बात कह सकता था?

वह जीवन के स्वार्थों के प्रति प्राय: उदासीन रहा करता था| महाभारत युद्ध के समय कभी उसने अपनी विजय के लिए उत्सुकता नहीं दिखाई| यहां तक कि जब कृष्ण ने द्रोणाचार्य के वध के लिए उससे यह कहलवाना चाहा कि अश्वत्थामा मर गया तो उसने यह झूठ बोलने से साफ इनकार कर दिया और फिर कृष्ण के बहुत कहने पर भी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि, 'द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा मर गया, बल्कि यह पता नहीं कि अश्वत्थामा नाम का मनुष्य मरा या उस नाम का हाथी,' इस तरह कहकर उसने अपने राज्य धर्म का पालन किया, लेकिन फिर भी वह झूठ तो था ही, क्योंकि पूरी तरह जानते हुए भी कि अश्वत्थामा हाथी ही मरा है, उसने यह संशयात्मक वाक्य कहा था, इसलिए कुछ क्षणों तक उसको नरक की यात्रा करनी पड़ी| बस इसी स्थल पर हम उसकी थोड़ी-सी शिथिलता पाते हैं, नहीं तो वह अपने जीवन के आदर्शों पर एक चट्टान की तरह दृढ़ था|

क्षमा उसके का आदर्श था| बिना शत्रु मित्र का विचार करके वह सभी को क्षमा कर दिया करता था| जिस समय गंधर्वराज चित्रसेन दुर्योधन आदि को बांध लाया था, तब युधिष्ठिर ने प्रार्थना करके उनको छुड़वा दिया था| गंधर्वराज ने बार-बार कहा था कि उसने दुष्ट दुर्योधन को पांडवों के हित के लिए ही बंदी बनाया है, लेकिन क्षमाशील और उदार प्रवृत्ति वाला युधिष्ठिर वनवास का यह कष्ट पाते हुए भी दुर्योधन के प्रति भ्रातृत्व का भाव रखता था और उसने चित्रसेन से प्रार्थना करके दुर्योधन को मुक्त करवा दिया|

इसी प्रकार जब एकचक्रा नगरी से पांडव आ रहे थे तो रास्ते में अंगारपूर्ण गंधर्वराज से अर्जुन की मुठभेड़ हो गई| युद्ध की तैयारी हो गई, लेकिन युधिष्ठिर ने ही अंगारपूर्ण को क्षमा कर दिया और अर्जुन को आज्ञा दी कि गंधर्वराज को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाए| इस प्रकार युधिष्ठिर के कहने से ही वह झगड़ा थम गया| युधिष्ठिर को क्रोध प्राय: बहुत कम आता था| जिस समय पांडव राजा विराट के यहां रहकर अपने अज्ञातवास का समय काट रहे थे, उसी समय विराट के ऊपर दो आक्रमण हुए| पहले तो उनके गोधन को लेने के लिए सुशर्मा ने उनके ऊपर आक्रमण किया, दूसरी ओर दुष्ट कौरवों ने आकर आक्रमण कर दिया| विराट तो सुशर्मा से लड़ने चले गए| कौरवों से युद्ध करने के लिए राजकुमार उत्तर बृहन्नला नामधारी अर्जुन को अपना सारथी बनाकर ले गया, लेकिन दुर्योधन की विशाल सेना देखकर उत्तर युद्ध से भागने लगा तो अर्जुन ने उसे रोककर स्वयं धनुष लेकर कौरवों से युद्ध किया और उनको पराजित कर दिया| लेकिन नगर में लौटने पर यही घोषित किया कि राजकुमार उत्तर ने ही यह विजय प्राप्त की है| राजा विराट सभा में बैठे हुए अपने पुत्र की प्रशंसा कर रहे थे, उस समय कंक नामधारी युधिष्ठिर ने कहा, "महाराज ! दुर्योधन आदि योद्धाओं को जीतना उत्तर के लिए कभी संभव नहीं है| उत्तर व्यर्थ अपनी प्रशंसा करते हैं| बृहन्नला ही उनको पराजित कर सकता है|"

यह सुनकर विराट ने अपने हाथ के पांसों को खींचकर युधिष्ठिर के मुंह पर मारा, जिससे उसके मुंह से खून बहने लगा| लेकिन उस समय भी वह धीरबुद्धि क्रुद्ध नहीं हुआ| उसके स्थान पर यदि और कोई होता तो राजा विराट के इस व्यवहार को नहीं सह पाता, लेकिन युधिष्ठिर कुछ नहीं बोला| उसकी इस महानता के कारण ही बाद में यह पता लगने पर ही कि अन्य नामधारी सभी पांडव भी यहां ठहरे हुए हैं, राजा विराट को अपने व्यवहार पर बड़ा दुख हुआ और उसने युधिष्ठिर से अपने धृष्टतापूर्ण व्यवहार के लिए क्षमा मांगी| वह बड़ा ही विनयशील था| बड़ों का सदा उचित सम्मान करता था| महाभारत युद्ध छिड़ने के पहले वह रथ से उतरकर पैदल ही भीष्म आदि गुरुजनों की वंदना करने गया था| उस समय भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और मद्रराज शल्य ने सच्चे हृदय से उसको आशीर्वाद दिया था| उसके इस शील-स्वभाव के कारण शत्रु-पक्ष के महारथी सदा उसकी प्रशंसा करते रहे|

युधिष्ठिर धर्म और समाज नीति को अच्छी तरह जानता था और सदा इस विषय पर चिंतन किया करता था| वनवास के समय एक बार भीमसेन एक विशाल अजगर के चंगुल में फंस गया| जब काफी देर तक वह नहीं लौटा तो युधिष्ठिर उसको खोजने निकला| वहां अजगर के चंगुल में अपने भाई को पाकर उसने अजगर से भीम को छोड़ देने की प्रार्थना की| अजगर ने कहा कि यदि तुम मेरे प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर दोगे तो मैं तुम्हारे भाई को छोड़ दूंगा| युधिष्ठिर ने यह शर्त स्वीकार कर ली| इसके पश्चात अजगर ने धर्म और समाजनीति पर प्रश्न पूछना शुरू किया| युधिष्ठिर ने प्रत्येक प्रश्न का समुचित उत्तर दिया| इससे प्रसन्न होकर अजगर से भीमसेन को छोड़ दिया|

वनवास के समय एक बार मार्कण्डेय मुनि से भी युधिष्ठिर की भेंट हुई थी और उन्होंने अनेक बहुमूल्य उपदेश उसको दिए थे| महाभारत युद्ध में अपने पक्ष की विजय हो जाने के पश्चात भी युधिष्ठिर को कोई हर्ष नहीं हुआ था| स्वजनों के इस महाविनाश के कारण उसका हृदय अत्यंत दुखी हुआ था और तभी उसने समाज की मर्यादा के विरुद्ध यह सलूक किया था कि क्षत्रिय का ऐसा क्रूर कर्म क्यों है? क्या धर्म की यह मर्यादा शाश्वत है? और तभी उसकी आत्मा बोल उठी - धर्म की गति विचित्र है|

सभी ने पांडवों की विजय पर खुशी मनाई थी, लेकिन वह बार-बार पूछता रहा था कि आखिर इस विजय का तात्पर्य क्या है? यह विजय किसकी है? क्या यह मानव के सत्य की विजय है? तो फिर इसमें हृदय को इतनी पीड़ा और दुख क्यों है? इस प्रकार के विचार निरंतर उसके मस्तिष्क में उठते रहे और दिन-प्रतिदिन अपने स्वजनों की याद करके वह अधीर रहने लगा| कुरुक्षेत्र में बहा हुआ भाइयों और पूज्यवरों का रक्त उसकी दृष्टि के सामने आने लगा| जो व्याकुलता अर्जुन को युद्ध के आरंभ में हुई थी, वह उसको अंत तक रही और अंत में तो काफी बढ़ गई थी| तभी श्रीकृष्ण उसे भीष्म पितामह के पास ले गए थे| वे कृष्ण, जिन्होंने गीता का उपदेश देकर अर्जुन को शांत किया था, युधिष्ठिर को नहीं समझा पाए| अपने धर्म युग का उपदेश वे उसको नहीं दे पाए|

उन्होंने जाकर शर-शय्या पर पड़े भीष्म पितामह से कहा, "जाति की हत्या करने के पाप से दुखी युधिष्ठिर बहुत ही व्याकुल हो रहे हैं| धर्मयुक्त उपदेश देकर उनके शोक को दूर करिए| इसीलिए मैं इनको आपके पास लाया हूं|"

पितामह ने राजधर्म, आप धर्म और मोक्ष के उपदेश युधिष्ठिर को दिए और अनेक तरह से उसको समझाया, लेकिन फिर भी उसके हृदय का संताप पूरी तरह नहीं मिटा| तभी तो जिस समय अंत में स्वर्गीय स्वजनों को पानी देने के लिए खड़े युधिष्ठिर के सामने कुंती ने यह भेद खोला था कि कर्ण उसी का अग्रज है तो उसने क्रुद्ध होकर अपनी माता को ही शाप दे दिया था कि स्त्री के पेट में आज से कभी कोई बात अधिक देर तक नहीं टिकेगी| यदि उसको पहले ही यह पता होता तो वह कर्ण को अग्रज मानकर उसकी आज्ञा में चलता और इस महाविनाश के पाप का बोध उसके सिर पर नहीं चढ़ता| अंत तक उसके हृदय को यही बात कष्ट देती रही कि सबसे बड़ा भाई होने नाते वही उस महाभारत के भीषण संग्राम के लिए उत्तरदायी है|

युद्ध समाप्त होते ही द्रौपदी के पांचों पुत्र मारे गए| उधर, अभिमन्यु पहले ही मारा जा चुका था| फिर कृष्ण के कुल में भी फूट पड़ गई थी और वहां भी सर्वनाश हो गया था| स्वयं श्रीकृष्ण को उपेक्षित की भांति अपने प्राण त्यागने पड़े थे| उस समय उनका दाह-संस्कार करने तक के लिए उनका कोई स्वजन उपस्थित नहीं था| इन सभी कारणों से युधिष्ठिर जीवन के प्रति उदासीन हो उठा| यद्यपि महाभारत के बाद कुछ वर्ष तक वह राज्य करता रहा, लेकिन कभी भी उसका चित्त प्रसन्न नहीं रहा| अनेक प्रकार के भयानक प्रश्न उसके मस्तिष्क में उठते थे और उसकी चेतना को झकझोरकर रख देते थे| अंत में वह जीवन से इतना ऊब गया था कि इसमें किसी प्रकार का सौंदर्य और सुख उसे दिखता ही नहीं था| जीवित रहने का लगाव उसके हृदय से मिट गया था, तभी अपने पोते परीक्षित को राज्य देकर वह अपनी पत्नी द्रौपदी और चारों भाइयों के साथ हिमालय की ओर चल दिया और वहीं उसके भाई और द्रौपदी बर्फ में गलकर मर गए थे और वह सदेह स्वर्ग गया| इंद्र और स्वयं धर्मराज उसको लेने आए थे| यह उसके पुण्य का प्रभाव ही था| पहले-पहले उसे नरक में होकर गुजरना पड़ा था| वहां सहसा उसे अपने भाइयों तथा द्रौपदी की चीत्कार सुनाई दी| इससे वह व्यथित हो उठा और इंद्र से वह पूछने लगा, "क्या कारण है कि मेरे भाइयों को और द्रौपदी को नरक की दारुण यातना भोगनी पड़ रही है?"

इंद्र ने कहा, "हे धर्मराज ! मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है| तुम्हारे भाइयों और द्रौपदी के थोड़े पापकर्म हैं, उन्हीं के कारण इनको ये यातनाएं सहनी पड़ रही हैं, लेकिन शीघ्र ही इनकी मुक्ति होगी और फिर सदा ये पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्ग का आनंद भोगेंगे|"

इसके पश्चात युधिष्ठिर स्वर्ग में पहुंचा तो वहां उसको दुर्योधन, कर्ण आदि सभी मिले| उन्हें देखकर उसको भी विस्मय होने लगा और फिर धर्मराज के न्याय पर क्रोध भी आने लगा, लेकिन इंद्र ने कहा, "युधिष्ठिर ! इन्होंने युद्ध करके वीरगति प्राप्त की है| इसी का पुण्य फल ये स्वर्ग में भोग रहे हैं, लेकिन इसके समाप्त हो जाने के पश्चात अपने अनेक पापों का परिणाम ये नरक में भोगेंगे| शीग्र ही इनका पतन होगा|"

कुछ ही देर के पश्चात युधिष्ठिर ने देखा कि कौरवों का पतन होने लगा| वे चीत्कार करते हुए स्वर्ग से नरक की आग में गिरने लगे और नरक में से अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के साथ स्वर्ग में आ गए| उनसे मिलकर युधिष्ठिर को अत्यधिक प्रसन्नता हुई| इसके पश्चात वे सभी अपने पुण्यों का फल भोगने लगे|

युधिष्ठिर के चरित्र को पूरी तरह देखने से यह मालूम होता है कि वह सद्गुणों की खान था| वह एक विचारक था, जो निरपेक्ष दृष्टि से मानवतागत मूल्यों पर विचार किया करता था और फिर अपने हृदय की बात को कहने का साहस रखता था| कभी स्वार्थ के लिए सत्य पर परदा डालने की उसने चेष्टा नहीं की| अपना दयालु स्वभाव होते हुए भी वह रणभीरू कभी नहीं था| जब कभी युद्धस्थल में उतरता था तो पूर्ण साहस के साथ युद्ध करता| मद्रराज शल्य उसी के हाथ से मारा गया था| कर्ण से भी उसने युद्ध किया था, लेकिन घायल होने के कारण आगे उससे युद्ध नहीं कर पाया था| अर्जुन ने कर्ण से टक्कर ली थी और जब अर्जुन पूरे दिन लड़कर भी कर्ण को परास्त नहीं कर पाया था तो युधिष्ठिर ने उसको बुरी तरह फटकारा था| उसने उसके गाण्डीव धनुष तक को ललकारा था| इस पर अर्जुन ने क्रुद्ध होकर अपने अग्रज का वध करने की ठान ली थी, लेकिन कृष्ण ने बीच-बचाव कर दिया| फिर अर्जुन ने युधिष्ठिर से अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगी थी|

युधिष्ठिर के जीवन में यही एक घटना है, जहां उसने अपना धैर्य तोड़ दिया था, नहीं तो सदा धैर्य रखा| आशा ही उसके जीवन को सुखमय बनाती रहती थी| वह आशावादी था| बड़ी से बड़ी आपत्ति आने पर भी वह घबराता नहीं था और उनके बीच भी भविष्य में सुखी जीवन की आशा करता था|

मार-काट और युद्ध से वह सदा घृणा करता था, तभी उसने क्षत्रिय के इस क्रूर कर्म की कुछ आलोचना की थी| महाभारत के युद्ध को टालने की उसने हर बार कोशिश की, लेकिन दुर्योधन की दुष्टता के आगे उसकी कोशिश बेकार हो गई| उसने वनवास तक स्वीकार कर लिया और फिर कौरवों से अपना हिस्सा प्राप्त करने तक की आशा की, लेकिन वह भी उसे नहीं मिला| तब अंत में विवश होकर उसे युद्ध करना पड़ा| स्वाभिमानी वह पूरा था, वह कभी दबना नहीं जानता था| दबता तो वह सत्य से था| व्यक्ति की सत्ता का उसके सामने अधिक मूल्य नहीं था| द्रौपदी के अपमानित होने के समय वह सिर्फ मर्यादा और अपने दिए हुए वचन के कारण ही चुप बैठा रहा था, किसी प्रकार के भय के कारण नहीं| माता का भी वह अनन्य सेवक था| पुत्रहीन गांधारी की उसने ऐसी सेवा की थी कि स्वयं दुर्योधन भी अपने जीवन-काल में ऐसी सेवा नहीं कर पाया| धृतराष्ट्र भी उसकी सेवा से प्रसन्न हो गए थे| उसने अपने जीवन के आदर्शों पर चलकर ही तो गांधारी और धृतराष्ट्र का असीम प्रेम प्राप्त किया था| शत्रु वर्ग से भी ऐसा प्रेम प्राप्त कर लेना महापुरुषों के लिए ही संभव है| इस दृष्टि से देखा जाए तो वह रोग और द्वेष से परे था| गीता के अनुसार देखा जाए तो वह निष्फल कर्मयोगी था| उसकी समान दृष्टि थी| भेदभाव करना वह नहीं जानता था| राजनीति के मामलों में इतना नादान था कि कभी-कभी तो बिना सोचे-समझे ही बात मुंह से निकाल जाता था| इसी प्रकार जब कौरव पक्ष का अंतिम योद्धा दुर्योधन बच रहा और वह जाकर द्वैपायन सरोवर में जा छिपा तो सभी पाण्डव उसे खोजते हुए वहीं जा पहुंचे| उस समय सभी ने दुर्योधन को ललकारा, जिससे आवेश में आकर वह बाहर निकल आया| उस समय दुर्योधन ने उससे कहा, "युधिष्ठिर ! अब सबकुछ विनष्ट हो चुका है| मेरी ओर से सभी पराक्रमी योद्धा मारे जा चुके हैं, अब मुझे इस राज्य की आकांक्षा नहीं है| इसे तुम्हीं ले लो|"

इस पर युधिष्ठिर बोला, "दुर्योधन ! यदि तुम इसी डर से इस सरोवर में छिप गए हो कि अकेले पर हम सभी आक्रमण करेंगे, तो सुनो, हम पांचों भाइयों में से जिस एक से तुम युद्ध करना चाहो, उसी से युद्ध कर लो| जो जीत जाएगा, वही राज्य का अधिकारी होगा|"

उसकी यह बात सुनकर सभी एक साथ सकते में रह गए| कृष्ण तो सोचने लगे कि युधिष्ठिर ने सारा बना-बनाया खेल ही बिगाड़ दिया, क्योंकि उस समय यदि दुर्योधन नकुल, सहदेव या उस युधिष्ठिर से ही गदा युद्ध करने की इच्छा प्रकट करता तो उनमें से कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता था| यहां तक कि यदि भीमसेन भी कृष्ण का इशारा न समझकर वैसे ही लड़ता रहता तो दुर्योधन उसे धराशायी कर देता| कृष्ण ही वह सफल राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सदा पांडवों की भूलों को सुधारा और उनको ठीक सलाह देकर परिस्थित को अपने वश में किया| महाभारत में पांडवों की विजय का सारा श्रेय श्रीकृष्ण को ही है| यदि वे नहीं होते तो पांडव कभी भी विजयी नहीं होते|

युधिष्ठिर तो पल-पल में संशय में पड़ जाता था| एक तरफ तो महाभारत का युद्ध हो रहा था और दूसरी ओर उसकी आत्मा में एक प्रकार का भीषण संघर्ष चल रहा था| इसी निरंतर चलते संघर्ष के कारण वह कभी एक क्षत्रिय की तरह क्रूर नहीं हुआ| उसने कभी अपने आपको अन्य क्षत्रिय धर्म की सीमाओं में नहीं मिटाया, बल्कि वह तो सत्य को खोजने वाला दार्शनिक था| दुर्योधन के प्रति एक बार भीम इतना क्रूर हो गया था कि उसकी जांघ तोड़ने के बाद वह उसके सिर को लात मारने के लिए भी उद्यत हो गया, लेकिन युधिष्ठिर ने भीम को रोक लिया| उसके हृदय में दुर्योधन के प्रति किसी प्रकार की घृणा नहीं थी| घृणा उसे मनुष्य से नहीं थी, बल्कि मनुष्य के विकारों से थी| क्षत्रिय होकर भी जीवन की समस्याओं के ऊपर निरंतर चिंतन करने वाला इतिहास में यह पहला ही दार्शनिक मिलता है जिसकी चेतना ने मर्यादा की संकीर्णता को स्वीकार नहीं किया था| अंत में महाभारत के इस महान द्रष्टा का जीवन संसार को यह पाठ देकर समाप्त हो गया कि धर्म की गति विचित्र है| मनुष्य जिन मर्यादाओं को सत्य और शाश्वत मानता है, वे शाश्वत नहीं हैं| चेतना का प्रवाह पहले रहता है और उन मूल्यों में निरंतर परिवर्तन आता रहता है|

महाभारत का अंत एक तीव्र विषमता और दुख में हुआ, उसी प्रकार इसका जीवन भी दुख को इस संसार में सत्य घोषित करके समाप्त हुआ| वह प्रमाणित कर गया कि मनुष्य के सुख और वैभव से भी ऊंचा मनुष्य के जीवन का सत्य है और उसी के साक्षात्कार से जीवन में सच्चा संतोष मिलता है, उसी से परलोक में स्वर्ग का सुख मिलता है|

अंत में यही कहना उचित होगा कि युधिष्ठिर महाभारत का सबसे महान और उदात्त पात्र है, जिसके चरित्र के द्वारा ही महाभारत का दार्शनिक पक्ष स्पष्ट होता है|



* जब टूटा शनिदेव का अंहकार - Pauranik katha


त्रेतायुग में एक बार बारिश के अभाव से अकाल पड़ा। तब कौशिक मुनि परिवार के लालन-पालन के लिए अपना गृहस्थान छोड़कर अन्यत्र जाने के लिए अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ चल दिए। फिर भी परिवार का भरण-पोषण कठिन होने पर दु:खी होकर उन्होनें अपने एक पुत्र को बीच राह में ही छोड़ दिया।

वह बालक भूख-प्यास से रोने लगा। तभी उसने कुछ ही दूरी पर एक पीपल का वृक्ष और जल का कुण्ड देखा। उसने भूख शांत करने के लिए पीपल के पत्तों को खाया और कुण्ड का जल पीकर अपनी प्यास बुझाई। वह बालक प्रतिदिन इसी तरह पत्ते और पानी पीकर और तपस्या कर समय गुजारने लगा। तभी एक दिन वहां देवर्षि नारद पहुंचे। बालक ने उनको नमन किया। नारद मुनि विपरीत दशा में बालक की विनम्रता देखकर खुश हुए। उन्होंने तुरंत बालक का यथोचित संस्कार कर वेदों की शिक्षा दी। उन्होंने उसे ओम नमो भगवते वासुदेवाय की मंत्र दीक्षा भी दी।

वह बालक नित्य भगवान विष्णु के मंत्र का जप कर तप करने लगा। नारद मुनि उस बालक के साथ ही रहे। बालक की तपस्या से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। भगवान विष्णु ने प्रगट होकर बालक से वर मांगने को कहा। बालक ने भगवत भक्ति का वर मांगा। तब भगवान विष्णु ने बालक को योग और ज्ञान की शिक्षा दी। जिससे वह परम ज्ञानी महर्षि बन गया।

एक दिन बालक के मन में जिज्ञासा पैदा हुई। उसने नारद मुनि से पूछा कि इतनी छोटी उम्र में ही क्यों मेरे माता-पिता से अलगाव हो गया। क्यों मुझे इतनी पीड़ा भोगना पड़ रही है। आपने मुझे संस्कारित कर ब्राह्मण बनाया है। अत: मेरी पीड़ा का कारण भी बताएं। नारद मुनि ने बालक से कहा - तुमने पीपल के पत्तों को खाकर घोर तप किया है, इसलिए आज से तुम्हारा नाम पिप्पलाद रखता हूं। जहां तक तुम्हारे कष्टों की बात है, तो उसका कारण शनि ग्रह है। जिसके अहंकार वश धीमी चाल के कारण तुम्हारे साथ ही पूरा जगत भी अकाल की पीड़ा भोग रहा है।

यह सुनकर बालक ने बहुत क्रोधित हो गया। उसने आवेशित होकर जैसे ही आकाश में विचरण कर रहे शनि को देखा। तब शनि ग्रह बालक पिप्पलाद के तेजोबल से जमीन पर एक पर्वत पर आ गिरा। जिससे वह अपंग हो गया। शनि की ऐसी दुर्दशा देखकर नारद मुनि खुश हो गए। उन्होंने सभी देवी-देवताओं को यह दृश्य देखने के लिए बुलाया।

तब वहां पर ब्रह्मदेव सहित अन्य देवों ने आकर बालक पिप्पलाद के आवेश को शांत कर कहा कि नारद मुनि द्वारा रखा गया तुम्हारा नाम श्रेष्ठ है और आज से तुम पूरे जगत में इसी नाम से प्रसिद्ध होगे। जो भी व्यक्ति शनिवार के दिन पिप्पलाद नाम का ध्यान कर पूरी श्रद्धा और भावना से पूजा करेगा। उसको शनि ग्रह के कष्टों से छुटकारा मिलेगा और उसको संतान सुख भी प्राप्त होंगे।

ब्रह्मदेव ने साथ ही पिप्पलाद मुनि को शनिग्रह की शांति के लिए उनकी पूजा और व्रत का विधान बताकर कहा कि तुम धराशायी हुए शनि को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित कर दो, क्योंकि वह निर्दोष हैं। पिप्पलाद मुनि ने भी ब्रह्मदेव के आदेश का पालन किया और उनसे शनिश्चर व्रत विधि जानकर जगत को शनि ग्रह की शांति का मार्ग बताया। इसीलिए शनि ग्रह की शांति के लिए शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के साथ ही शनिदेव के पूजन की परंपरा है।



* शिव का क्रोध - Pauranik katha


महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं।

एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया।

महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया।

वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।”

उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।”

भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे।

वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।



* दुष्यंत एवं शकुन्तला की कथ - Pauranik katha


एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था। कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये। पुकार लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा, "हे राजन्! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है।" उस कन्या को देख कर महाराज दुष्यंत ने पूछा, "बालिके! आप कौन हैं?" बालिका ने कहा, "मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ।" उस कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले, "महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं?" उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुन्तला ने कहा, "वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की। इसी लिये मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वे मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला - ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।"

शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, "शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।" शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले, "प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा।" इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।

एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले, "बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।" दुर्वासा ऋषि के शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, "अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।"

महाराज दुष्यंत के सहवास से शकुन्तला गर्भवती हो गई थी। कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया। इस पर महर्षि कण्व ने कहा, "पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है।" इतना कह कर महर्षि ने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया। मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई।

महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, "महाराज! शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें।" महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे। शकुन्तला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सब के सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।

जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुन्तला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला।

कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पाकर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वे उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी, "हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।" यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है। सखी को ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा। सखी ने प्रसन्न हो कर समस्त वृतान्त शकुन्तला को सुनाया। शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुन्तला को पहचान लिया। उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये।

महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ।




* अर्जुन का अहंकार -Pauranik katha 


एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’

‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’

‘आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा।

‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’




* शिव विवाह - Pauranik katha


सती के विरह में शंकरजी की दयनीय दशा हो गई। वे हर पल सती का ही ध्यान करते रहते और उन्हीं की चर्चा में व्यस्त रहते। उधर सती ने भी शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं राजा हिमालय के यहाँ जन्म लेकर शंकरजी की अर्द्धांगिनी बनूँ।

अब जगदम्बा का संकल्प व्यर्थ होने से तो रहा। वे उचित समय पर राजा हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ में प्रविष्ट होकर उनकी कोख में से प्रकट हुईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे 'पार्वती' कहलाईं। जब पार्वती बड़ी होकर सयानी हुईं तो उनके माता-पिता को अच्छा वर तलाश करने की चिंता सताने लगी।

एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और पार्वती को देख कहने लगे कि इसका विवाह शंकरजी के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से इसके योग्य हैं।

पार्वती के माता-पिता के आनंद का यह जानकर ठिकाना न रहा कि साक्षात जगन्माता सती ही उनके यहाँ प्रकट हुई हैं। वे मन ही मन भाग्य को सराहने लगे।

एक दिन अचानक भगवान शंकर सती के विरह में घूमते-घूमते उसी प्रदेश में जा पहुँचे और पास ही के स्थान गंगावतरण में तपस्या करने लगे। जब हिमालय को इसकी जानकारी मिली तो वे पार्वती को लेकर शिवजी के पास गए।

वहाँ राजा ने शिवजी से विनम्रतापूर्वक अपनी पुत्री को सेवा में ग्रहण करने की प्रार्थना की। शिवजी ने पहले तो आनाकानी की, किंतु पार्वती की भक्ति देखकर वे उनका आग्रह न टाल न सके।

शिवजी से अनुमति मिलने के बाद तो पार्वती प्रतिदिन अपनी सखियों को साथ ले उनकी सेवा करने लगीं। पार्वती हमेशा इस बात का सदा ध्यान रखती थीं कि शिवजी को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो।

वे हमेशा उनके चरण धोकर चरणोदक ग्रहण करतीं और षोडशोपचार से पूजा करतीं। इसी तरह पार्वती को भगवान शंकर की सेवा करते दीर्घ समय व्यतीत हो गया। किंतु पार्वती जैसी सुंदर बाला से इस प्रकार एकांत में सेवा लेते रहने पर भी शंकर के मन में कभी विकार नहीं हुआ।

वे सदा अपनी समाधि में ही निश्चल रहते। उधर देवताओं को तारक नाम का असुर बड़ा त्रास देने लगा। यह जानकर कि शिव के पुत्र से ही तारक की मृत्यु हो सकती है, सभी देवता शिव-पार्वती का विवाह कराने की चेष्टा करने लगे।

उन्होंने शिव को पार्वती के प्रति अनुरक्त करने के लिए कामदेव को उनके पास भेजा, किंतु पुष्पायुध का पुष्पबाण भी शंकर के मन को विक्षुब्ध न कर सका। उलटा कामदेव उनकी क्रोधाग्नि से भस्म हो गए।

इसके बाद शंकर भी वहाँ अधिक रहना अपनी तपश्चर्या के लिए अंतरायरूप समझ कैलास की ओर चल दिए। पार्वती को शंकर की सेवा से वंचित होने का बड़ा दुःख हुआ, किंतु उन्होंने निराश न होकर अब की बार तप द्वारा शंकर को संतुष्ट करने की मन में ठानी।

उनकी माता ने उन्हें सुकुमार एवं तप के अयोग्य समझकर बहुत मना किया, इसीलिए उनका 'उमा'- उ+मा (तप न करो)- नाम प्रसिद्ध हुआ। किंतु पार्वती पर इसका असर न हुआ। अपने संकल्प से वे तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे भी घर से निकल उसी शिखर पर तपस्या करने लगीं, जहाँ शिवजी ने तपस्या की थी।

तभी से लोग उस शिखर को 'गौरी-शिखर' कहने लगे। वहाँ उन्होंने पहले वर्ष फलाहार से जीवन व्यतीत किया, दूसरे वर्ष वे पर्ण (वृक्षों के पत्ते) खाकर रहने लगीं और फिर तो उन्होंने पर्ण का भी त्याग कर दिया और इसीलिए वे 'अपर्णा' कहलाईं।

इस प्रकार पार्वती ने तीन हजार वर्ष तक तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या को देख ऋषि-मुनि भी दंग रह गए।

अंत में भगवान आशुतोष का आसन हिला। उन्होंने पार्वती की परीक्षा के लिए पहले सप्तर्षियों को भेजा और पीछे स्वयं वटुवेश धारण कर पार्वती की परीक्षा के निमित्त प्रस्थान किया।

जब इन्होंने सब प्रकार से जाँच-परखकर देख लिया कि पार्वती की उनमें अविचल निष्ठा है, तब तो वे अपने को अधिक देर तक न छिपा सके। वे तुरंत अपने असली रूप में पार्वती के सामने प्रकट हो गए और उन्हें पाणिग्रहण का वरदान देकर अंतर्धान हो गए।

पार्वती अपने तप को पूर्ण होते देख घर लौट आईं और अपने माता-पिता से सारा वृत्तांत कह सुनाया। अपनी दुलारी पुत्री की कठोर तपस्या को फलीभूत होता देखकर माता-पिता के आनंद का ठिकाना नहीं रहा।

उधर शंकरजी ने सप्तर्षियों को विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमालय के पास भेजा और इस प्रकार विवाह की शुभ तिथि निश्चित हुई।

सप्तर्षियों द्वारा विवाह की तिथि निश्चित कर दिए जाने के बाद भगवान्‌ शंकरजी ने नारदजी द्वारा सारे देवताओं को विवाह में सम्मिलित होने के लिए आदरपूर्वक निमंत्रित किया और अपने गणों को बारात की तैयारी करने का आदेश दिया।

उनके इस आदेश से अत्यंत प्रसन्न होकर गणेश्वर शंखकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, कुंडक, काकपादोदर, मधुपिंग, प्रमथ, वीरभद्र आदि गणों के अध्यक्ष अपने-अपने गणों को साथ लेकर चल पड़े।

नंदी, क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज भी कोटि-कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नीले चिन्ह थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म पुती हुई थी।

इन गणों के साथ शंकरजी के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गई। इनमें डाकनी, शाकिनी, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस आदि भी शामिल थे। इन सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे।

किसी के मुख ही नहीं था और किसी के बहुत से मुख थे। कोई बिना हाथ-पैर के ही था तो कोई बहुत से हाथ-पैरों वाला था। किसी के बहुत सी आँखें थीं और किसी के पास एक भी आँख नहीं थी। किसी का मुख गधे की तरह, किसी का सियार की तरह, किसी का कुत्ते की तरह था।

उन सबने अपने अंगों में ताजा खून लगा रखा था। कोई अत्यंत पवित्र और कोई अत्यंत वीभत्स तथा अपवित्र गणवेश धारण किए हुए था। उनके आभूषण बड़े ही डरावने थे उन्होंने हाथ में नर-कपाल ले रखा था।

वे सबके सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए महादेव शंकरजी के चारों ओर एकत्रित हो गए।

चंडीदेवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुई भगवान्‌ रुद्रदेव की बहन बनकर वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण पहन रखे थे। वे प्रेत पर बैठकर अपने मस्तक पर सोने का कलश धारण किए हुए थीं।

धीरे-धीरे वहाँ सारे देवता भी एकत्र हो गए। उस देवमंडली के बीच में भगवान श्री विष्णु गरुड़ पर विराजमान थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनके पास में मूर्तिमान्‌ वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकाद महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा कई परिजनों के साथ उपस्थित थे।

देवराज इंद्र भी कई आभूषण पहन अपने ऐरावत गज पर बैठ वहाँ पहुँचे थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहाँ आ गए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नर भी शिवजी की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ पहुँच गए थे। इनके साथ ही सभी जगन्माताएँ, देवकन्याएँ, देवियाँ तथा पवित्र देवांगनाएँ भी वहाँ आ गई थीं।

इन सभी के वहाँ मिलने के बाद भगवान शंकरजी अपने स्फुटिक जैसे उज्ज्वल, सुंदर वृषभ पर सवार हुए। दूल्हे के वेश में शिवजी की शोभा निराली ही छटक रही थी।

इस दिव्य और विचित्र बारात के प्रस्थान के समय डमरुओं की डम-डम, शंखों के गंभीर नाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के मनमोहक नृत्य और मंगल गीतों की गूँज से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे।

उधर हिमालय ने विवाह के लिए बड़ी धूम-धाम से तैयारियाँ कीं और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालय के द्वार पर आ लगी। पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनकी भूत-प्रेतों की सेना को देखकर मैना बहुत डर गईं और उन्हें अपनी कन्या का पाणिग्रहण कराने में आनाकानी करने लगीं।

पीछे से जब उन्होंने शंकरजी का करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला सोलह वर्ष की अवस्था का परम लावण्यमय रूप देखा तो वे देह-गेह की सुधि भूल गईं और शंकर पर अपनी कन्या के साथ ही साथ अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर दिया।

हर-गौरी का विवाह आनंदपूर्वक संपन्न हुआ। हिमाचल ने कन्यादान दिया। विष्णु भगवान तथा अन्यान्य देव और देव-रमणियों ने नाना प्रकार के उपहार भेंट किए। ब्रह्माजी ने वेदोक्त रीति से विवाह करवाया। सब लोग अमित उछाह से भरे अपने-अपने स्थानों को लौट गए।


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