. . . Gautam Buddha Ki Kahani | गौतम बुद्ध की कहानी हिन्दी में

Gautam Buddha Ki Kahani | गौतम बुद्ध की कहानी हिन्दी में


Today I am sharing this blog of  Gautam Buddha Ki Kahani   with all of you, which is quite valuable for every child. These moral stories will help a lot in understanding the society of children, so that they can become a good person. If you like this story, then do share it with other people.
मै आप सभी से  गौतम बुद्ध की कहानी हिन्दी में   साझा कर रहा हु, जो काफी मुल्यवान है, |यह कहानिए सच्ची है , जिससे आप  गौतम बुद्ध के जीवन के बारे में जान पाएगे ।  अगर आपको यह कहानिया अच्छी लगे तो अन्य लोगों से जरूर साझा करे । 


* गौतम की बुद्धत्व प्राप्ति - Gautam Buddha Ki Kahani


कपिलवस्तु के शाक्यवंशीय राजा सुद्धोदन और महिषी महामाया के पुत्र सिद्धार्थ गौतम (संस्कृत व हिन्दी : सिद्धार्थ गौतम झ्र५६३ ई.पू.- ४८७ ई.पू. का जन्म वैशाख-पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी के उपवन में स्थित एक साल-वृक्ष के नीचे हुआ था जब उनकी माता अपने माता-पिता से मिलने अपने मायके देवदह जा रही था।

पुत्र-जन्म के तत्काल बाद महामाया वापिस कपिलवस्तु लौट आयी थी। तावविंस देवों से शिशु के जन्म की सूचना पाते ही शिशु के दादा सीहहनु के गुरु तथा राजपुरोहित तत्क्षण कपिलवस्तु पहुँचे। शिशु को अपनी गोद में उठा या जैसे ही शिशु को निकट से देखा तो उनकी आँखें पहले तो खुशी से चमक उठीं लेकिन फिर आँसुओं में डूब गयीं। राजा सुद्धोदन द्वारा कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया था, " यह शिशु बुद्ध बनने वाला है इसलिए मैं प्रसन्न हूँ। किन्तु दु:ख इस बात का है कि शिशु की बुद्धत्व-प्राप्ति तक मैं जीवित नहीं रह सकूंगा।" 

शिशु के जन्म के पाँचवे दिन उसके नामकरण के अवसर पर एक सौ आठ ज्योतिषियों को आमंत्रित किया गया था जिन में आठ विलक्षण ज्योतिषी भी थे। उन आठ में से छ: राम, धज, लक्खण, मन्ती, भोज और सुदन्त ने यह भविष्यवाणी की थी कि वह शिशु या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या एक बुद्ध। किन्तु सबसे कम उम्र के ज्योतिषी कोण्डञ्ञ का कथन था कि वह शिशु निश्चित रुप से एक बुद्ध बनेगा। 

शिशु का नाम सिद्धार्थ गौतम रखा गया। सातवें दिन सिद्धार्थ की माता का देहांत हो गया, तब उसके लालन-पालन का दायित्व उसकी मौसी महापजापति ने लिया (वह भी सुद्धोदन की एक रानी थी ; और उनका विवाह भी सुद्धोदन के साथ उसी दिन हुआ था जिस दिन महामाया का।)

सोलह वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ ने शाक्यों की एक सभा में अपने अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाये। सारभड़ग जातक के अनुसार तो उन्होंने एक ऐसे धनुष को उठा अपने कर्तव्य दिखाये थे जिसे हज़ार आदमी मिल कर भी नहीं उठा सकते थे। किंवन्दन्ती तो यह है कि उनके शौर्य से प्रसन्न हो उन्हें चालीस हजार शाक्य-कन्याओं के हाथ प्राप्त हुए थे जिनमें सुधबुद्ध की राजकुमारी बिम्बा उनकी प्रमुख रानी बनी थी, जो बाद में राहुलमता के नाम से बौद्ध-साहित्य में विख्यात हैं। झ्र बिम्बा ही भद्दकच्छा, सुभद्दका और यशोधरा (हिन्दी-संस्कृत : यशोधरा) के नाम से जानी जाती हैं। 

उन्नतीस वर्षों तक ठरभ्भ', ठसुरभ्भ' और ठसुभ' नामक प्रासादों में राज-वैभव भोगने के बाद सिद्धार्थ संसार से विमुक्त हो संन्यास को उन्मुख हुए। 

कहा जाता है कि उन्होंने एक बार किसी रोगी को देखा और अनुभव किया कि हर कोई जो पैदा होता है रोग और व्याधि से पीडित होता रहता है। फिर उन्होंने किसी वृद्ध को देखा। इससे उन्हें यह विदित हुआ कि हर कोई जो जन्म लेता है, कालान्तर में वृद्ध भी होता है तत: उसके हाथ-पैर शिथिल और जर्जर हो जाते हैं। फिर जब उन्होंने एक मृत को देखा तो यह ज्ञान पाया कि हर कोई जो जन्म लेता है एक दिन मृत हो अपने संसार और नश्वर शरीर को भी छोड़ जाता है तब सारे सुख, सुविधाओं और वैभव की वस्तुएँ निरर्थक हो जाती है। अत: संसार सारहीन है। अंतत: जब उन्होंने वैभव का त्याग कर सत्य का अन्वेषण कर रहा था तो उन्होंने भी संसारिकता का परिव्याग कर संन्यास वरण कर गृह-त्याग किया।

शाक्य कोलि और मल्ल राज्यों को पार कर संन्यासी के रुप में वे राजगीर आदि स्थानों पर भटकने लगे। इसी क्रम में उन्होंने अकार-ककाम और उद्धकराम पुत्त को अपना गुरु बनाया। किन्तु उनके दर्शन व विचार से वे संतुष्ट नहीं हुए। अत: वे उरुवेका के सेनानीगाम पहुँचे और छ: वर्षा तक पाँच भिक्षुओं के साहचर्य में कठिन तपस्या की। कठिन चरम तप दो मार्ग की अनुपभुक्तटा जान पुन: वे साधारण भोजन ग्रहण करने को प्रेरित हुए जिससे खिन्न हो उनके पाँच भिक्षु-मित्र खिन्न हो उनका साथ छोड़ सारनाथ के इसिपत मिगदाथ को प्रस्थान कर गये।

सिद्धार्थ की साधारण भोजन ग्रहण करने की इच्छा सुजाता नाम की एक कन्या ने सोने की कटोरी में खीर अर्पित कर पूरी की। वह दिन वैशाख पूर्णिमा का था। गौतम ने निरञजरा नदी में स्नान कर खीर खाई और फिर कटोरी नदी में ही छोड़ दी। जो डूबती हुई नागराज काल के निवास-स्थान पर जा पहुँची थी। फिर सारा दिन साल-उपवन में व्यतीत कर शाम को वे पीपल के एक पेड़ के नीचे जा बैठे। वहीं सोत्यीय नामक एक घसियारे ने उन्हें आठ-मुट्ठी घास दिये। घास को उन्होंने पूर्व दिशा की ओर रख उसकी आसनी बनायी। फिर उसपर बैठकर उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक वे बोधि नहीं प्राप्त करते तबतक वहाँ से नहीं उठेंगे। उनकी प्रतिज्ञा के तेज से महाब्रह्म और सारे देव उनके सामने प्रकट हो उनकी स्तुति करने लगे।

किन्तु उनकी दृढ़ मार (शैतान) ने उनपर आक्रमण किया। जिसके भय से सारे देव वहाँ से भाग खड़े हुए। मार से उनकी रक्षा तब केवल दस पारमियों ने की। इन पारमियों को उन्होंने बोधिसत्व बनने के बाद के पाँच सौ पचास जन्मों के कठिन संघर्ष के क्रम में अर्जित किया था। (पारमी दस होते हैं-दान, शील, नेक्खम्म या नौकम्र्म) प्रज्ञा, वीर्य, खन्ति (या धैर्य), सत्य, अधिष्ठान, मेत्ता (या मैत्रेय) और उपेक्खा (या समभाव) अथवा अनासक्ति।

गौतम से परास्त हो जब मार और उसकी सेनाएं भाग खड़ी हुई तो सारे देवों ने विजेता की जयजयकार की।

तप में लीन गौतम ने रात के पहले प्रहर में अपने पूर्व जन्मों को जाना; दूसरे प्रहर में दिव्य-चक्षु को पाया, तीसरे प्रहर में परिच्यसमुप्पाद के ज्ञान को और अंतत: प्रत्यूष-काल में सम्बोधि की प्राप्ति की। ज्ञान को जिससे वे " पच्चेक (प्रत्येक) बुद्ध बने। परिच्चसमुप्पाद के सिद्धान्त का सुखद मनन उन्होंने प्रथम सात दिनों तक उसी बोधि-वृक्ष के नीचे बैठ किया। दूसरा सप्ताह उन्होंने अजपाल निग्रोध वृक्ष के नीचे बिताया जहाँ उनकी भेंट एक घमण्डी ब्राह्मण से हुई थी और जहाँ उन्होंने मार की तीनों कन्याओं को परास्त किया था। (उन कन्याओं के नाम (तृष्णा), अरति और राग थे।) तीसरा सप्ताह उन्होंने मुचलिन्द तालाब में नागराज मुचलिन्द के फनों के नीचे बैठ बिताया था। चौथे सप्ताह वे राजायतन पेड़ के नीचे बैठे रहे जहाँ उन्होंने तपुस्स और मल्लिक को बिना किसी देखना सुनाये ही अपना अनुयायी बनाया। 

तत्पश्चात ब्रह्मसहमपति के आग्रह पर उन्होंने पीड़ित मानव के उत्थान के लिए धम्मचक्क-पनत्तन का निश्चय किया । दूसरों के उत्थान की प्रतिज्ञा से वे सब्बञ्ञू (सर्वज्ञ) बुद्ध कहलाये। तब अपनी धम्म देशना के प्रवर्त्तन हेतु अपने पाँच तपस्वी मित्रों को योग्य पाया जो उन दिनों वाराणसी के इसिपतन मिगदाय में वास कर रहे थे। इस धम्म-चक्र प्रवर्तन की महत्ता को अशोक-कालीन सारनाथ सिंह स्तम्भ में दर्शाया गया है जो आज भारतीय गणराज्य का राजकीय चिह्म है। चार-मुख वाला वह सिंह-स्तंभ बुद्ध के धम्म या देशना का सिंह नाद आज भी हर दिशा में गुंजाता प्रतीत होता है। पुन: सिंह-स्तंभ में अंकित चक्र जो अशोक-चक्र के नाम से जाना जाता है, आज जो भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पर बड़े गौरव से लहराता रहता है वस्तुत: धर्म-चक्र का ही प्रतीक है।



* गौतम बुद्ध की जन्म-कथा - Gautam Buddha Ki Kahani


जैसे ही गौतम गर्भस्थ हुए उसी क्षण बत्तीस प्रकार की दैविक घटनाएँ घटित हुई थी जिनमें भूचालच; दस हज़ार लोकों में अचानक रोशनी का फैलाव और नरक की अग्नि का शमन उल्लेखनीय हैं।

दस महीनों के बाद लुम्बिनी के एक उपवन में गौतम का जन्म हुआ। कहा जाता है, शिशु के जन्म चार महाब्रह्मों द्वारा बिधायी गयी स्वर्ण-जाल में हुआ था तथा दैवी-बारिश में उनका स्नान हुआ था। जन्म लेने के साथ ही शिशु ने सात पग बढाए थे और सिंहनाद करते हुए स्वयं का परिचय लोक नाथ के रुप में दिया था। जिस दिन गौतम का जन्म हुआ था उसी दिन बोधि-वृक्ष; राहुलमाता (यशोधरा); अश्व; सारथी धन्न; उनका हाथी और सात प्रकार के बहुमूल्य कोश भी उत्पन्न हुए थे।


* महामाया का स्वप्न - Gautam Buddha Ki Kahani


सिद्धार्थ गौतम की माता महामाया और कपिलवस्तु के राजा सुद्धोदन की धर्म-पत्नी शक्यवंसीय अंजन की पुत्री थी, जो देवदह के प्रमुख थे। उनकी माता का नाम यशोधरा था। किन्तु थेरी गाथा उच्कथा के अनुसार उनके पिता का नाम महासुप्पबुद्धा था और अवदान कथा के अनुसार उनकी माता का नाम सुलक्खणा था। 

महामाया के दो भाई थे और एक बहन (बहन महा पजापति भी, राजा सुद्धोदन से उसी दिन ब्याही गयी थी जिसदिन महामाया से उन का विवाह हुआ था।)

महामाया में बुद्ध की माता बनने की सारी योग्यताएँ थीं। उन्होंने पञ्चशील - अर्थात प्राणहानि, चोरी, वासनात्मक कुमार्ग, झूठ और मद्यपान - न करने का सदैव पालन किया था। उसके अतिरिक्त दस पारमियों को सिद्ध करने के लिए वे एक हज़ार वर्षों तक संघर्षरत भी था।

जिस दिन गौतम उनके गर्भ में प्रविष्ट हुए उस दिन उन्होंने उपवास किया हुआ था। रात में उन्होंने एक स्वप्न देखा, स्वप्न में "चातुर्महाराजा अर्थात् चार देव गण उन्हें उठा हिमालय पर ले जाते हैं और एक साल वृक्ष के नीचे रखे हुए एक सुन्दर पलंग पर लिटा देते हैं। तब उन देवों की पत्नियाँ आती हैं और उन्हें अनोत्तत सरोवर में वहाँ स्नान कराती हैं फिर वे उन्हें दिव्य - परिधान धारण करा एक अद्भुत स्वर्ण-प्रासाद की दिव्य शय्या पर लिटा देती हैं। तभी एक सफेद हाथी अपनी चमकदार सूँड में एक ताज़ा सफेद कमल ले दाहिनी दिशा से उनके गर्भ में प्रवेश करता है।" 

वह दिन उत्तर आषाढ़-पूर्णिमा का था, और उस दिन से सात दिनों का महोत्सव भी नगर में प्रारम्भ हो चुका था। राजा सुद्धोदन भी उस रात महामाया के समीप नहीं आ सके थे।

अगले दिन महामाया ने जब महाराज को अपने दिव्य स्वप्न से अवगत कराया तो उन्होंने राज-ज्योतिषियों की राय उस स्वप्न पर जाननी चाही। ज्योतिषियों ने कहा था, "रानी के गर्भ में प्रविष्ट बालक या तो चक्रवत्तीं सम्राट बनेगा या बुद्ध।"


* असित - Gautam Buddha Ki Kahani



राजा सुद्धोदन के पिता सीहहनु के गुरु व राजपुरोहित असित सांसारिक भोगों से विरक्त एक चामत्कारिक और सिद्ध पुरुष थे। वृद्धावस्था में राज्यसुखों का परित्याग कर वे एक निर्जन वन में कुटिया बना कर आध्यात्मिक साधनाओं में लीन रहते। कहा जाता है कि अक्सर वे तावतिंस लोक के देवों के साथ उठते-बैठते रहते थे। एक दिन जब वे तावतिंस पहुँचे तो वहाँ उन्होंने दूर स्थान पर फूलों की सजावट देखी। देव-गण नाच-गा रहे थे। सर्वत्र उत्सव का माहौल था। वहाँ उन्हें बताया गया कि सिद्धार्थ गौतम, जो एक बुद्ध बनने वाले थे, जन्म ले चुके थे।

उपर्युक्त सूचना से उनकी खुशी की सीमा न रही और वे तत्काल कपिलवस्तु पहुँचे वहाँ पहुँचकर उन्होंने जब बालक को उठाकर अपनी गोद में रखा और अपनी आँखों के निकट लाकर देखा तो उनकी आँखों में असीम खुशी की लहर दौड़ पड़ी। फिर कुछ ही क्षणों में वहाँ अवसाद के बादल मंडराने लगे। राजा सुद्धोदन ने जब उनके इन विचित्र भावों का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, "यह बालक बुद्ध बनेगा। इसलिए मैं प्रसन्न हूँ। किन्तु इसके बुद्धत्व-दर्शन का सौभाग्य मुझे अप्राप्य है। मैं उतने दिनों तक जीवित नहीं रहूँगा। अत: मैं खिन्न हूँ।"

कुछ दिनों के पश्चात् असित ने अपनी बहन के पुत्र नालक को बुद्ध-देशनाओं को ग्रहण करने की पूर्ण शिक्षा दी।


* चार दृश्य - Gautam Buddha Ki Kahani


ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सुन राजा सुद्धोदन ने सिद्धार्थ गौतम को एक चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा ; न कि एक बुद्ध। अत: संन्यास और बुद्धत्व के सारे मार्ग अवरुद्ध कर उन्होंने सिद्धार्थ को एक योग्य राजा बनने की समस्त सुविधाएँ उपलब्ध करायी।

राजकुमार सिद्धार्थ जब उनतीस वर्ष के हो गये तो देवों ने उनके सम्बोधि-काल को देख उन्हें राज-उद्यान में भ्रमण को प्रेरित किया। वहाँ उन्होंने लाठी के सहारे चलते एक वृद्ध को देखा। तब उन्हें यह ज्ञान हुआ कि वे भी एक दिन वैसे ही हो जाएंगे ; सभी एक दिन वैसी ही अवस्था को प्राप्त होते हैं। 
वितृष्ण-भाव से वे तब प्रासाद को लौट आये। जब राजा को उनकी मनोदशा का ज्ञान हुआ तो उन्होंने राजकुमार के भोग-विलास के लिए और भी साधन जुटा दिये। किन्तु सांसारिक भोगों में राजकुमार की आसक्ति और भी क्षीण हो चुकी थी।

दूसरे दिन राजकुमार फिर से उद्यान-भ्रमण को गये। वहाँ उन्होंने एक रोगी व्यक्ति को देखा। उसकी अवस्था देख उन्हें यह ज्ञात हुआ कि हर कोई जो जन्म लेता है रोग का शिकार भी होता है। एक सम्राट भी रोग-मुक्त नहीं रह सकता। संसार का यह सत्य है।

तीसरे दिन भी सिद्धार्थ उद्यान-भ्रमण को गये। वहाँ उन्होंने एक मृत व्यक्ति को देखा। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि मृत्यु भी एक सत्य है। जो प्राणी जन्म लेता है एक दिन मरता भी है। उसके समस्त साधन जो उसके शरीर और अहंकार आदि प्रवृत्तियों को तुष्ट करते हैं और जिन्हें वह उपने जीवन का सार समझता है, वस्तुत: निस्सार हैं। हर मनुष्य राजा या रंक अपने मोह, अज्ञान और प्रमाद में उन्हें ही सार समझ अपना समस्त जीवन निस्सार को ही पाने में व्यर्थ गँवा देता है। मृत्यु ही वह कसौटी है जो चिता की धूमों से आसमान में यह लिख देता है कि जाने वाला सम्राट या फकीर संसार से क्या लेकर जाता है।

अगला दिन आषाढ़-पूर्णिमा का दिन था। उस दिन भी सिद्धार्थ उद्यान-भ्रमण को गये। मार्ग में उन्होंने एक संन्यासी को देखा। सारथी धन्न से उन्हें ज्ञात हुआ कि संन्यासी संसार की सारहीनता को समझ संसार से विरक्त हो सत्य और सार के अन्वेषी होते हैं। धन्न की बातें सुन गौतम के मन में संन्यास का औत्सुक्य जागृत हुआ और वे भी संन्यास वरण को प्रेरित हुए।

जब वे अपने महल को लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें यह सूचना मिली कि वे एक नवजात शिशु राहुल के पिता बन चुके थे। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने राजपरिवार की एक महिला दिसीगोतमी को गाते सुना " --------------निवृत्त हुई अब तो वह माता।ट्" सिद्धार्थ के लिए " निवृत्ति" तो इस सांसारिकता के अर्थ में थी। प्रसन्न मन उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकाल कर उस भद्र महिला को भिजवा अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन किया ; क्योंकि दिसीगोतमी ने उन्हें झ्रसंसार ठनिवृत्ति' का संदेश जो दिया था।


* गौतम का गृह-त्याग -Gautam Buddha Ki Kahani


जन्म, रोग और मृत्यु जीवन के सत्य हैं। राजकुमार सिद्धार्थ ने उन सत्यों का जब साक्षात्कार किया और उसके मर्म को समझा तो उसी दिन गृहस्थ जीवन का परित्याग कर वे संयास-मार्ग को उन्मुख हो गये।

वह दिन आषाढ़ पूर्णिमा का था। मध्य-रात्रि बेला थी। भोग-विलास के माहौल में उनके निकट ही एक सुंदरी बड़े ही भोंडे तरीके से सोई पड़ी थी। कुरुप सांसारिकता से वितृष्ण उन्होंने तुरंत ही अपने सारथी धन्न को बुलाया और अपने प्रिय घोड़े कंठक को तैयार रखने का आदेश दिया। फिर वे अपने शयन-कक्ष में गये जहाँ यशोधरा नवजात राहुल के साथ सो रही थी। उसी दिन राहुल का जन्म हुआ था। अपनी पत्नी और पुत्र पर एक अंतिम दृष्टि डाल, उन्हें सोते छोड़, कंठक पर सवार वे नगर की ओर निकल पड़े। रोकने के प्रयास में धन्न भी उनके घोड़े की पूँछ से लटक गया।

कहा जाता है कि देवों ने कंठक के पैरों के टाप और हिनहिनाहट के शोर को दबा दिया और उनके निष्क्रमण के लिए नगर-द्वार खोल दिये थे। कपिलवत्थु नगरी के बाहर आकर वे एक क्षण को रुके और अपने जन्म और निवास-स्थान पर एक भरपूर दृष्टि डाल आगे बढ़ गये। रात भर घुड़सवारी करने के बाद अनोगा नदी तक पहुँचे जो कपिलवस्तु से तीस भोजन दूर था। कंठक ने आठ उसम चौड़ी नदी को एक ही छलांग में पार कर लिया। नदी की दूसरी तरफ उन्होंने अपने तमाम आभूषण उतार धन्न को दे अपने बाल और दाढ़ी अपनी तलवार से काट हवा में उछाल दिये। सक्क (शक्र; इन्द्र) ने उन्हें आसमान में ही लपक तावतिंस लोक के चुल्लमणि चैत्य में प्रतिस्थापित करा दिया। ब्रह्म घटिकार ने तब स्वर्ग से उतर गौतम को कासाय चीवर तथा एक संयासी योग्य सात अन्य आवश्यक वस्तुएं प्रदान किये। संयासी का रुप धारण कर गौतम ने कंठक और धन्न को वापिस लौट जाने की आज्ञा दी। किन्तु अपने स्वामी के वियोग को सहन नहीं करते हुए कंठक ने वहीं अपने प्राण त्याग दिये।


* मार पर बुद्ध की विजय - Gautam Buddha Ki Kahani


ईसाई और इस्लाम परम्पराओं की तरह बोद्धों में भी शैतान-तुल्य एक धारणाहै, जिसे मार की संज्ञा दी गयी है। मार को 'नमुचि' के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि "नमुचीति मारो", अर्थात् जिससे कोई नहीं बच सकता वह 'मार' है।

कहा जाता है कि कंठक पर सवार गौतम जब अपने महानिष्क्रमण-काल में (अर्थात् जब गृहस्थ-जीवन त्याग कर) नगरद्वार पर पहुँचे तो मारने उनके समक्ष प्रकट हो उन्हें सात दिनों के अन्दर ही चक्रवर्ती सम्राट बनाने का प्रलोभन दे डाला था। सिद्धार्थ उसके प्रलोभन में नहीं आये और अपने लक्ष्य को अग्रसर होते चले गये।

मार की दस सेनाएँ होती है : राग (लिप्सा); असंतोष या भूख-प्यास; तृष्णा; आलस्य (दीन-मिद्ध); भय; शंका, झूठ और मूर्खता; झूठी शान और शोकत; दम्म। उन दस सेनाओं में तीन - तृष्णा, अरति और राग मार की तीन पुत्रियाँ भी शामिल हैं।

बोधिवृक्ष के नीचे गौतम ने जब सम्बोधि-प्राप्ति तक बैठ तप करने की प्रतिज्ञा ली तो मार अपने दसों प्रकार के सेनाओं के साथ स्वयं एक विकराल हाथी गिरिमेखल पर सवार हो बुद्ध पर आक्रमण कर बैठा। मार के विकराल और भयंकर सेनाओं को देख समस्त देव, नाग आदि जो गौतम की स्तुति कर रहे थे, भाग खड़े हुए। गौतम ने तब अपने दस पारमियों को बुला मार की सेना को खदेड़ दिया। खिन्न मार ने अपना अंतिम शस्र चक्कायध से गौतम पर प्रहार किया, जो उनके सिर पर एक फूलों की छत्र बन स्थिर हो गया। अपने अंतिम वार को भी जब मार ने खाली जाते देखा तो उसने चिल्लाकर कहा, "ओ गौतम! तुम जहाँ बैठे हो वह आसन मेरा है। अत: तुम्हें वहाँ बैठने का दुस्साहस न करो।"

मार के इस मिथ्याभियोग को सुन गौतम ने अपनी मध्यमा अंगुली से भूमि-स्पर्श कर धरती से साक्षी देने को कहा। धरती ने तब भयंकर गर्जन के साथ बुद्ध के वहाँ बैठे रहने की साक्षी दी जिससे मार की हार पूर्णतया सत्यापित हो गयी; और अंत में गौतम संबोधि प्राप्त कर बुद्ध बने।



* बुद्ध का व्यक्तित्व - Gautam Buddha Ki Kahani


बुद्ध के व्यक्तित्व के संदर्भ में कम ही जानकारियाँ प्राप्त हैं। उनके विरोधी और आलोचकों को भी यह स्वीकार्य है कि वे "सुन्दर" और "आकर्षक" व्यक्तित्व के स्वामी थे। रुप-लावण्य, कद-काठी और तेजस्विता से वे सभी का मन मोह लेते थे। दीर्घनिकाय के 'लक्खण-सुत' के अनुसार अन्य बुद्धों की तरह वे भी बत्तीस गुणों से सम्पन्न थे, जो एक चक्रवर्ती सम्राट या एक बुद्ध ही पा सकते हैं। काली आँखें, लम्बी जिह्मवा, हथेली का घुटनों से नीचे तक पहुँचना आदि गुण उपर्युक्त लक्षणों के कुछ उदाहरण हैं।

बुद्ध की वाणी के आठ लक्षण मान्य हैं, यथा- प्रवाह; स्पष्टता एवं सुबोधता; माधुर्य; स्फुटता (श्राव्य); अनुबंधता अथवा अविच्छेदन; परिस्फुटता; गांभीर्य तथ अनुमादिता।

बुद्ध आठ प्रकार का सभाओं को संबोधित करते थे, यथा- कुलीन, विद्वत्जन, गृहस्थ, संयासी, चातुर्महाराज, तावतिंस लोक के देवगण तथा मार।

उनकी चर्चा इस प्रकार थी कि वे प्रत्यूष काल में उठ कर नित्य-कर्मों से निवृत हो एकांतवास करते थे। फिर बाह्य चीवर धारण कर कभी बड़े भिक्षु समुदाय के साथ या फिर अकेले भिक्षाटन को निकलते थे।

जब वे अकेले भिक्षाटन को जाते तो अपनी कुटिया का द्वार पूरा करते था। यह भी माना जाता है कि वे यदा-कदा कुछ खीणामव (आश्रव) जिनके क्षीण होते हैं भिक्षुओं के साथ उड़ते हुए आराम से बाहर जाते थे। 

भिक्षाटन के बाद वे अपने पैर धोते। फिर भिक्षुओं से समाधि आदि विषयों पर चर्चा करते, या फिर उन्हें शिक्षा देते। समय मिलने पर ही वे आराम या शयन करते थे। वे प्राय: अपनी दिव्य-चक्षु से धर्म-ग्रहण करने योग्य व्यक्ति का अवलोकन करते।

शाम को वे फिर स्नान करते और रात के पहले पहर तक भिक्षुओं की सुमार्ग की देशना देते; दूसरे पहर देवों को। रात्रि के अंतिम पहर वे चंक्रमण करते या फिर समाधिस्थ होते। उसके बाद ही वे शयन करते थे। अगले दिन आँखे खुलने पर वे पुन: धर्म-देशना के याग्य व्यक्तियों (वेनेच्य) का अवलोकन करते।



* बुद्ध और नालागिरी हाथी -Gautam Buddha Ki Kahani


बुद्ध का ममेरा भाई देवदत्त सदा ही बुद्ध को नीचा दिखाने की चेष्टा में लगा रहता था, मगर उसे हमेशा मुँह की ही खानी पड़ती थी।

एक बार बुद्ध जब कपिलवस्तु पहुँचे तो अनेक कुलीन शाक्यवंसी राजकुमार उनके अनुयायी बने। देवदत्त भी उनमें से एक था। 

कुछ समय पश्चात् देवदत्त ने भी कुछ जादुई शक्तियाँ प्राप्त कीं और एक बार उनका प्रदर्शन मगध के भावी सम्राट अजातशत्रु के समक्ष किया। वहाँ वह एक शिशु के रुप में प्रकट हुआ जिसने साँप की मेखला बाँधी हुई थी। तभी से अजातशत्रु उसे परम आदर की दृष्टि से देखा करता था।

कुछ दिनों के बाद देवदत्त मगध से लौट कर जब संघ में वापिस आया तो उसने स्वयं को बुद्ध से श्रेष्ठ घोषित किया और संघ का नेतृत्व करना चाहा। भिक्षुओं को बुद्ध से विमुख करने के लिए उसने यह कहा हैं कि बुद्ध तो बूढ़े हो चुके थे और सठिया गये हैं। किन्तु भिक्षुओं ने जब उसकी कोई बात नहीं सुनी तो वह बुद्ध और संघ दोनों से द्वेष रखने लगा।

खिन्न होकर वह फिर वापिस मगध पहुँचा और अजात शत्रु को महाराज बिम्बिसार का वध करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि बिम्बिसार बुद्ध और बौद्धों को प्रचुर प्रश्रय प्रदान करते थे। प्रारंभिक दौर में बिम्बिसार को मरवाने की उसकी योजना सफल नहीं हुई। अत: उसने सोलह धुनर्धारियों को बुद्ध को मारने के लिए भोजा। किन्तु बुद्ध के व्यक्तित्व से प्रभावित हो सारे उनके ही अनुयायी बन गये।

क्रोध में देवदत्त ने तब बुद्ध पर ग्रीघकूट पर्वत की चोटी से एक चट्टान लुढ़काया जिसे पहाड़ से ही उत्पन्न हो दो बड़े पत्थरों ने रास्ते में ही रोक दिया।

देवदत्त के क्रोध की सीमा न रही। उसने एक दिन मगध राज के अस्तबल में जाकर एक विशाल हाथी नालगिरी को ताड़ी पिलाकर बुद्ध के आगमन के मार्ग में भेज दिया। नालगिरी के आगमन से सड़कों पर खलबली मच गई और लोग जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। तभी बुद्ध भी वहाँ से गुजरे। ठीक उसी समय एक घबराई महिला अपने बच्चे को हाथी के सामने ही छोड़ भाग खड़ी हुई। जैसे ही नालगिरि ने बच्चे को कुचलने के लिए अपने पैर बढ़ाये बुद्ध उसके ठीक सामने जा खड़े हुए। उन्होंने हाथी के सिर को थपथपाया। बुद्ध के स्पर्श से नालगिरि उनके सामने घुटने टेक कर बैठ गया।

नालगिरि हाथी की इस घटना से देवदत्त मगध में बहुत अप्रिय हुआ और उसे तत्काल ही नगर छोड़ कर भागना पड़ा।



* बालक कुमार कस्सप की कथा - Gautam Buddha Ki Kahani


बच्चों के प्रति बुद्ध का अनुराग सर्वविदित है। दो सोपकों, चुल्लपंथक, दब्बमल्लपुत्र और कुमार कस्सप की कथाएँ उपर्युक्त मान्यता के परिचायक हैं।

एक बार श्रावस्ती की एक महिला संघ में प्रवेश करने को आतुर थी किन्तु उसके माता-पिता ने उसे भिक्षुणी बनने की अनुमति नहीं दी और उसका विवाह एक श्रेष्ठी से करा दिया। कालांतर में उसने अपने पति से अनुमति लेकर भिक्षुणी बन संघ में प्रवेश किया।

उसके संघ-प्रवेश के कुछ दिनों के बाद यह विदित हुआ कि वह गर्भिणी थी। जब देवदत्त को उसकी गर्भावस्था की सूचना मिली तो उसने बिना जाँच-पड़ताल किए ही उस भिक्षुणी को 'चरित्रहीन' कहा। जब वह बात बुद्ध के कानों में पड़ी तो उन्होंने उपालि और विशाखा को जाँच-पड़ताल के लिए श्रावस्ती भेजा। उन लोगों ने पूरी जाँच-पड़ताल के पश्चात् यह पाया कि महिला निर्दोष थी। वह बच्चा उसके पति का ही था।

जब महिला ने पुत्र को जन्म दिया तो बुद्ध ने शिशु को आशीर्वाद भी दिये और उसका नाम कुमार कस्सप रखा। उसकी देखभाल के लिए बुद्ध ने उसे श्रावस्ती नरेश को सौंप दिया। सात वर्षों तक वह बालक श्रावस्ती नरेश की देख-रेख में पलता रहा। तत: बुद्ध की कृपा से प्रवर्जित हो संघ में प्रविष्ट हुआ।




* धम्म चक्र-पवत्तन-कथा - Gautam Buddha Ki Kahani


सम्बोधि- प्राप्ति के पश्चात् तथा ब्रह्मसहम्पति के अनुरोध पर गौतम बुद्ध ने बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय' हेतु धर्म-चक्र प्रवर्तन (धम्म-चक्र-पवत्तन) अर्थात् अपने ज्ञान-देशना के चक्र को चलायमान रखने की प्रतिज्ञा ली। तत: उन्हें सर्वप्रथम आकार कालाम की याद आई जिन्हें उन्होंने महानिष्क्रमण के बाद अपना पहला अल्पकालीन गुरु वरण किया था। लेकिन दिव्य चक्षु से उन्हें ज्ञात हुआ कि आकार की मृत्यु हो चुकी थी। तब बुद्ध ने अपने दूसरे अल्पकालीन गुरु उद्दकराम पुत्र को पहली देशना देने की सोची। किन्तु दिव्य चक्षु से उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका भी निधन हो चुका था। तब उन्होंने पाँच संयासियों को अपनी पहली देशना देने की सोची। ये संयासी छ: वर्षों तक बुद्ध के साथ कठिन तप करते रहे थे किन्तु बुद्ध ने जब अति-कठिन साधना की अनुपयुक्तता को समझ कर सामान्य भोजन को उन्मुख हो गये तो वे पाँच तपस्वी उन्हें छोड़ सारनाथ चले गये।

बुद्ध ने अपने उन पाँच तपस्वी साथियों को अपनी दिव्य चक्षु से सारनाथ के इसिपतन मिगदाय (मृगों के उद्यान) में देखा और तब वे सारनाथ के उसी उद्यान में पहुँचे। तपस्वियों ने बुद्ध को जब वहाँ पहुँचे देखा तो उन्होंने उनकी उपेक्षा करने की सोची। किन्तु जैसे ही बुद्ध को उन्होंने निकट से देखा और उनकी अनूठी प्रभा का साक्षात्कार किया तो उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया।

सर्वप्रथम बुद्ध ने उन्हें चार आर्य-सत्यों की शिक्षा दी। चार आर्य-सत्य हैं:

दु:ख
दु:ख का कारण
दु:ख-निरोध
दु:ख-निरोध का मार्ग, अर्थात् सम्यक् दृष्टि, सम्यक्, संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम (प्रयास), सम्यक् सति (स्सृति) तथा सम्यक् समाधि।

उपर्युक्त अष्टांगिक मार्ग ही 'मध्यम मार्ग' कहलाता है क्योंकि यह जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के दो अतिवादी मार्गों का निराकरण करता है। इनमें से प्रथम अतिवादी मार्ग है- ऐन्द्रिक सुखों एवं भौतिकता से पूर्ण तथा दूसरा है- जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कठिन तपस्या एवं आत्म-उत्पीड़न से युक्त।

साथ ही उन्होंने अन्योन्याश्रय उत्पत्ति (प्रतिच्चा-समुप्पाद) के सिद्धान्त को भी अपनाया। इसके अर्थ है कि संसार में सभी वस्तुएँ अन्योन्याश्रित हैं। इस परिप्रेक्ष में- यदि बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु आदि दु:ख हैं, तो वे जन्म पर आश्रित है। यदि जन्म ही नहीं होगा, तो कौन दु:ख भोगेगा? (यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि मृत्यु केवल एक जन्म का ही अन्त है, दूसरा जन्म इससे भी दु:खदायी हो सकता है।) जन्म सत् (होने) पर आधारित है, सत् ग्रहण पर आधारित है, ग्रहण, वासना पर आधारित है, वासना, ससंर्ग से उत्पन्न है, संसर्ग, संपर्क से उत्पन्न है, संघर्ष, षडोन्द्रियों से उत्पन्न होता है, षडेन्द्रियाँ, देहान्त-बोध से उत्पन्न हैं, देहान्त-बोध, स्पन्दन से उत्पन्न है, स्पन्दन संस्कारों से उत्पन्न है और संस्कार, अज्ञान से उत्पन्न है। दूसरे शब्दों में, उन्होंने बताया कि अज्ञान ही सब दु:खों का मूल कारण है।

यह उपदेश सुनने के तुरन्त बाद कोन्दन्त (जिन्हें अन्नत्त-कोन्दन्न भी कहा जाता है) सोतपन्न बन गए, अन्य श्रोता भी कुद्ध के अनुयायी बन गए।

द्रष्टव्य महापरिनिब्बान सुत्त



* बुद्ध की अभिधर्म-देशना - Gautam Buddha Ki Kahani


सोगत-दर्शन या बौद्ध धर्म-दर्शन का सूक्ष्म का विस्तृत निरुपण अभिधम्म (संस्कृत अभिधर्म) दर्शन में निहित है। बुद्ध ने अभिधम्म की चर्चा सर्वप्रथम अपनी माता महामाया को की, जो उन दिनों पार्थिव शरीर त्याग तैंतीस देवों के लोक- तानतिंस लोक- में विहार कर रही थी। अभिधम्म की देशना में उन्हें तीन महीने लगे थे। प्रत्येक दिन वे अपनी माता को गूढ़ उपदेश देते और फिर पृथ्वी-लोक में उत्तर अनोत्तर सरोवर में उतर सारिपुत्र (संस्कृत शारिपुत्र) को उन्हीं देशनाओं को स्मरण-योग्य छंद-बद्ध कर पुन: सुनाते। सारिपुत्र उन छंदों का पाँच सौ विशिष्ट भिक्षुओं के साथ संगायन करते थे। वे सारे ही विशिष्ट भिक्षु अर्हत् बने। तत: अभिधम्म की गुरु-शिष्य श्रुत परम्परा का समुद्भव हुआ। अर्थात् बुद्ध ने सारिपुत्र को; सारिपुत्र ने भद्दजी को अभिदम्म-देसना दी। इस प्रकार अभिधम्म देसना भद्दजी, सोभित, पियजलि आदि से होते हुए महिन्द (महेन्द्र) सम्राट अशोक के पुत्र, इत्तिय, सम्बल, पण्डित तथा भद्दनाम के माध्यम से श्री लंका पहुँची। तत: म्यानमार, थाईलैंड, कम्बोडिया आदि देशों में अति गौरव को प्राप्त हुई जहाँ आज भी इसका इतना आदर होता है जितना हिन्दुओं के द्वारा 'ॠग्वेद' का, मुसलमानों के द्वारा 'कुरान' का तथा ईसाइयों के द्वारा 'बाईबिल' का। 

अभिधम्म का अर्थ

'अभिधम्म', 'अभि' और 'धम्म' (धर्म) शब्दों के योग से बना है। जहाँ 'अभि' शब्द 'अतिरेक' या 'विशेष' का द्योतक है, तथा 'धर्म' शब्द 'यथार्थ' या 'देशना' का परिचायक है। अत: परम्परा में 'अभिधम्म' उन विशिष्ट धर्मों का परिचायक है जो निर्वाण (या परमार्थ) प्रतिमुख धर्म है; अथवा, 'प्रज्ञाण्मला सानुचरा अभिधर्म:' (अभिधर्म कोश, १.२) अथवा वह शास्र जो निर्वाण-मार्ग को प्रकाशित करता है।

पालि परम्परा में भी उपर्युक्त विवेचना की पुष्टि होती है जहाँ बुद्धघोस ने 'धम्म' शब्द को साधारण देशना अर्थात् सुत्तपिटक की देशनाओं के संग्रह के रुप में तथा अभिधम्म को अभिधम्म-पिटक में संग्रहित विशिष्ट या अतिर्क्त धम्म-देशना की सूक्ष्म विश्लेष्णात्मकता के संदर्भ में प्रयुक्त माना हैं। (देखें ऊद्वसालिनी १.२) बिल्कुल ढीली है; और न ही इतनी कसी के जीवन की वीणा ही टूट जाय।

बुद्ध ने तब उन्हें 'प्रटिच्चसमुधाद' के दर्शन की देशना दी। यह दर्शन यह दर्शाता है कि प्रत्येक सांसारिक घटना किसी अन्य घटना पर निर्भर होती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक घटना की निष्पति किसी अन्य घटना पर निर्भर है। अत: दु:ख अर्थात् वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु आदि का होना जन्म पर निर्भर करता है; जन्म भव पर; भव उपादान (या ग्रहण करने की प्रवृत्ति) पर; वेदना सन्निकर्ष (फस्स) पर; सन्निकर्ष छ: ज्ञानेन्द्रियों पर; नाम-रुप विञ्ञाण (चित्त) पर और चित्त अज्ञान (अविद्या) पर निर्भर करता है। अत: अज्ञान ही दु:ख का मूल कारण है तथा अज्ञान नष्ट कर निर्मल चित्त का निर्माण ही धर्म चक्र प्रवर्तन का सार है। विमल चित्त का प्रादुर्भाव केवल कुशल कर्मों के व्कास से संभव है, जिनके मूल त्याग (अलोभ); प्रेम (अन्दोस) और ज्ञान (अमोह) हैं। अत: बुद्ध का धर्म के जिस चक्र को चलायमान किया हैं वे मूलत: त्याग, प्रेम और ज्ञान की शिक्षा देता है। यही चक्र भारतीय ध्वज पर भी अंकित है और भारत गणराज्य की त्याग, प्रेम और ज्ञान के प्रति की गयी वचनबद्धता का प्रतीक है। चूंकि अशोक कालीन सारनाथ के सिंह स्तम्भ पर यह चक्र उत्कीर्ण गई है, इसलिए आज इस चक्र को अशोक चक्र के नाम से जाना जाता है।

उपर्युक्त चार सिंहों का स्तम्भ जो चारों दिशाओं में सिंहनाद करते दिखाये गये हैं वस्तुत: बुद्ध की उसी धम्मचक्र-पवत्तन कथा को प्रतिध्वनित करते हैं।



* राहुलमाता से बुद्ध की भें - Gautam Buddha Ki Kahani


बुद्ध के सम्बोधि-प्राप्ति के पश्चात् सुद्धोदन ने उन्हें कई बार अपने दूतों को भेज कर बुलवाने की चेष्टा की, किन्तु हर दूत बुद्ध से प्रभावित हो उनका अनुयायी बन संघ में प्रविष्ट हो जाता। अंतत: सुद्धोदन ने बुद्ध को बचपन के मित्र कालुदायी को दूत बना बुद्ध के पास अपने संदेश के साथ भेजा। कालुदायी भी भिक्षु बन उनके संघ में प्रविष्ट हो गये, किन्तु उन्हें निरंतर सुद्धोदने से मिलने को प्रेरित करते रहे। तत: कालुदायी के दो महीने के प्रयास के पश्चात् बुद्ध ने कपिलवस्तु जाने का मन बना लिया।

कपिलवस्तु पहुँच बुद्ध ने निग्रोधाराम में रुक अपने वंश के लोगों को अद्भुत चमत्कार दिखाये। वहीं उन्होंने वेस्सतन्तर जातक की भी कथा सुनाई थी। दूसरे दिन बुद्ध अपनी नित्य चर्या के अनुरुप कपिलवस्तु की सड़कों पर भिक्षाटन के लिए निकल पड़े। राहुलमाता को जब यह सूचना मिली के बुद्ध नगर में भिक्षाटन कर रहे थे तब उन्होंने स्वयं महल के झरोखे से बुद्ध को झाँक कर देखा और उनकी तेजस्विता को देख अति प्रसन्न हुई और उनकी प्रशंसा के आठ छंद गाये जो 'नरसिंहगाथा' के नाम से प्रचलित हैं।

सुद्धोदन के कानों में जब यह खबर पहुँची कि बुद्ध, जो उनका पुत्र और कपिलवस्तु का भावी सम्राट था, उनके राज्य की ही सड़कों पर भिक्षाटन कर रहे हैं तो वे बहुत खिन्न हुए। किन्तु जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि भिक्षुओं के लिए भिक्षाटन अशोकालीय नहीं है तो उन्होंने उन्हें और उनके समस्त साथियों को महल में आमंत्रित किया। उनके दर्शन को राजपरिवार की सारी महिलाएँ भी आई। किन्तु उनकी पत्नी राहुलमाता (यशोदरा) अपने पुत्र के साथ अपने कक्ष में बैठी रही और यह बोली कि यदि उनमें शीलत्व है तो बुद्ध निश्चय ही स्वयं उनके पास आएँगे।

अपने दो विशिष्ट भिक्षुओं के साथ जब बुद्ध राहुलमता के कक्ष में पहुँचे तो राहुलमाता ज़मीन पर लेट अपने दोनों को पकड़् अपना शीष रख दिया। यह ध्यातव्य है कि जब से बुद्ध ने गृह-त्याग सारे साधनों का उपभोग बंद कर वैसा ही जैसे बुद्ध के विषय में उन्हें बताया गया था यथा पीला-परिधान और एक बार भोजन आदि।

बुद्ध ने तब यशोदरा के शीलत्व की प्रशंसा करते हुए 'चन्दकिन्नर जातक' की कथा सुनायी थी। राहुलमाता जब अपने किसी पूर्व जन्म में किन्नरी थी और उसके पति की हत्या हो चुकी थी तो उन्होंने अपने शीलत्व की शक्ति से अपने पति को पुनर्जीवित कर दिया था।

सातवें दिन जब बुद्ध कपिलवस्तु के राजमहल से निकल रहे थो तो राहुलमाता ने अपने सात वर्षीय पुत्र राहुल को यह कहकर बुद्ध के पास भेजा कि "जाओ अपना उत्तराधिकार अपने पिता से माँग लो।" बुद्ध ने तब राहुल को भी अपने संघ में शरण प्रदान की।

कालान्तर में जब भिक्षुणियों का प्रवेश संघ में होना आरम्भ हुआ तो राहुलमाता भी महाप्रजापति गौतमी के संरक्षण में भिक्षुणी बन संघ में प्रविष्ट हुई।



* सावत्थि चमत्कार - Gautam Buddha Ki Kahani


चमत्कार बुद्ध कथाओं व आख्यायिकों का महत्त्वपूर्ण अंग है। बुद्ध के जन्म के साथ अनेकों अद्भुत, दैविक एवं चमत्कारिक घटनाओं का प्रचुर आख्यान अनेकों स्थान पर उपलब्ध व प्रचलित हैं।

एक बार भिक्षु पिण्डोल भारद्वाज राजगृह में भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठी को एक ऊँची यष्टि पर चंदन की लकड़ी का एक कटोरा लटकवाते देखा। कारण पूछने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि उस श्रेष्ठी को न तो आध्यात्मिक सिद्धियों पर विश्वास था और न ही किसी सिद्ध संयासी पर। अत: संयासियों का माखौल उड़ाने के उद्देश्य से उसने उस बाँस के लंबे डंडे पर वह कटोरा लटकवाया था। भिक्षु पिण्डोल भारद्वाज ने श्रेष्ठी के अभिमान को दूर करने के लिए उड़ते हुए उस बाँस के शीर्ष पर से चंदन के उस कटोरे को उतार लिया।

बुद्ध ने जब भिक्षु पिण्डोल भारद्वाज द्वारा राजगीर में दिखाए गये उस रास्ते चमत्कार की चर्चा सुनी तो उन्होंने भिक्षुओं को जनसाधारण को बीच चमत्कार न दिखाने का आदेश दिया।

तत: कई छोटे-मोटे संयासी लोगों को अपने चमत्कार दिखा कर प्रभावित करते और बौद्धों को पाखण्डी घोषित करते क्योंकि बौद्ध भिक्षुओं ने लोगों के समक्ष चमत्कार दिखाना बंद कर दिया था।

जब मगध-राज बिम्बिसार को इसकी सूचना मिली तो वे बुद्ध के पास पहुँचे और उनसे श्रावस्ती में चमत्कार दिखाने की प्रार्थना की। चूँकि गौतम बुद्ध के पूर्वोत्तर बुद्धों ने भी श्रावस्ती में चमत्कार दिखाए थे। अत: गौतम ने भी बिम्बिसार की प्रार्थना स्वीकार की और श्रावस्ती में अपने चमत्कार दिखाये।

वहाँ उन्होंने रत्नों की एक छत बनाई और उड़ते हुए उस पर पहुँच चक्रमण करने लगे। तत: कुछ प्रचलित लोक-मान्यताओं के अनुसार उन्होंने स्वयं को हजार रुपों में एक साथ ही प्रकट किया। फिर अन्य बुद्धों की तरह ही तीन पगों में तावलिंस लोक पहुँच गये।

बुद्ध को इन चमत्कारों से उनके आलोचक श्रावस्ती छोड़ भाग खड़े हुए। कहा जाता है कि पूरण कस्सप ने भी तभी श्रावस्ती छोड़ा और रास्ते में उनका अन्तकाल हुआ था।



* बुद्ध की आकाश-उड़ान -Gautam Buddha Ki Kahani 


संबोधि-प्राप्ति के पाँचवे वर्ष में बुद्ध वैशाली के कूटागारसाला में विहार कर रहे थे। तभी वहाँ एक दिन उन्होंने अपने दिव्य-चक्षु से अपने पिता को मृत्यु-शय्या पर पड़े देखा। उनके पिता अर्हत् की योग्यता प्राप्त कर चुके थे। अत: वह समय उनके पिता को धम्म-देसना देने के लिए उपयुक्त था। इसके अतिरिक्त बुद्ध कपिलवस्तु के शाक्य और कोलनगर (व्याधपज्ज) के कोलों के बीच शांति-वार्ता को मध्यस्थता भी करना चाहते थे क्योंकि दोनों ही वंशों में रोहिणी नदी के जल-विवाद को लेकर भयंकर संग्राम छिड़ गया था।

तत: बुद्ध उड़ते हुए कपिलवस्तु पहुँचे। पिता को धर्म-उपदेश दिये जिसे सुनकर सुद्धोदन अर्हत् बनकर मृत्यु को प्रप्त हुए।

सुद्धोदन की मृत्यु के पश्चात् बुद्ध ने शाक्यों और कोलियों के बीच मध्यस्थता की। दोनों ने उनकी बातें सुनी और समझी जिससे दो मित्रवत् पड़ोसी राज्यों के बीच होने वाला संग्राम टल गया। हजारों लोगों के प्राण बच गये और युद्ध से होने वाले अनेक दुष्परिणाम भी। दोनों ही राष्ट्रों के अनेक लोगों ने बुद्ध, धम्म और संघ की शरण ली। बुद्ध ने भी दोनों राज्यों का आतिथ्य स्वीकार कर कुछ दिन कपिलवस्तु तथा कुछ दिन कोलिय नगर में रुक कर उन्हें अपना धन्यवाद ज्ञापित किया।



* परिनिब्बान-कथा - 

राजगीर के गिज्जहकुत पर्वत से, भिक्षुओं के बड़े संघ के साथ, बुद्ध ने अपनी अन्तिम यात्रा प्रारम्भ की। अम्बलथ्थिका और नालन्दा होते हुए वे पाटलिगाम गाँव (आधुनिक पटना, जिसे बाद में पाटलिपुत्र कहा गया) पहुँचे। उत्तरवर्ती काल में मौर्यों की राजधानी बना पाटलि, उन दिनों एक गाँव-मात्र था। वहाँ बुद्ध ने इस नगरी के महान् भविष्य की भविष्यवाणी की। पाटलि से उन्होंने गंगा नदी पार की और कोटिगाम और वैशाली होते हुए वे अम्बापाली (संस्कृत- आम्रपालि) के उद्यान में पहुँचे। अगले दिन, उन्होंने लिच्छवि राजवंश का निमंत्रण अस्वीकार करके, एक गणिका, अम्बापालि से भोजन ग्रहण किया। अपि च, भिक्षुओं के उपयोग हेतु अम्बापालि द्वारा दानस्वरुप प्रदत्त उद्यान भी स्वीकार कर लिया। फिर, भिक्षुओं को वैशाली में ही छोड़, वे वर्षा ॠतु (वस्सावास) व्यतीत करने के लिए बेलुवा की ओर चल दिए। बेलुवा में वे गम्भीर रुप से बीमार हो गए। उन्होंने आनन्द को अपनी भवितव्य मृत्यु की सूचना दी। तदनन्तर, अपने वर्षाकालीन प्रवास से वैशाली लौटकर उन्होंने अपनी मृत्यु की पूर्व-सूचना वहाँ उपस्थित सभी भिक्षुओं को भी दे दी।

इसके बाद, हत्थिगाम, अम्बागाम, जम्बुगाम और भोगनगर होते हुए वे पावा पहुँचे। वहाँ एक कर्मकार, चुन्द की आम्र-वाटिका में वे ठहरे और उन्होंने कुछ खाया, जिससे वे और भी अस्वस्थ हो गए। (यह कर्मकार चुन्द, गया के वेलुवन के चुन्द शूकरिक (सुअर का माँस-विक्रेता) से भिन्न है; साथ ही बुद्ध को दिया गया भोजन सूकर-मद्दव, सूअर का माँस नहीं है, यद्यपि कुछ लोगों को यह भ्रान्ति है।) पर यह भ्रान्ति ही है क्योंकि सूकर-सालि का अर्थ होता है- जंगली चावल और मद्दव शब्द (संस्कृत- मार्दव) मृदु अर्थात् मधुर (मीठे) से व्युत्पन्न है। अपि च, पालि-अंग्रेज़ी शब्दकोश (टी. डब्ल्यू रॉइस डेविस और विलियम स्टेड, पृ. ७२१, ५१८-१९) के अनुसार, मद्दव का अर्थ है- 'कोमल' और 'विदीर्ण' (भुना हुआ)। अत: संभव है कि बुद्ध ने जो भोजन किया था, वह भुने हुए चावल ही थे (भुंजे चावल, उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक प्रचलित खाद्यान्न है)। इतना ही नहीं, बुद्ध ने बड़े स्पष्ट शब्दों में चुन्द सूकरिक के सूकर-माँस विक्रेता होने और इस व्यवसाय की कड़ी निन्दा की थी। और अपने इसी जघन्य व्यवसाय के परिणाम-स्वरुप बुद्ध के निर्वाण से सात दिन पूर्व ही चुन्द की मृत्यु हो गई थी और उसे नरकाग्नि में यातना झेलनी पड़ी थी। (द्रष्टव्य- धम्मपद अट्ठकथा १-१०५) और सबसे बड़ी बात ये है कि बौद्ध धर्म के भोजन संबंधी नियम बहुत कठोर थे। उदाहरणार्थ, सारिपुत्त को केवल औषधि के रुप में लहसुन का सेवन करना अनुमत था।

अपनी बीमारी को वश में करके बुद्ध कुशीनर (आधुनिक कुशीनगर) पहुँचे और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। वहाँ उन्होंने आनन्द द्वारा ककुत्थ नदी से लाया गया जल ग्रहण किया। तब एक मल्लन, पक्कुस उनके दर्शनार्थ आया और उन्हें एक सुवर्ण-रंग का वस्र अर्पित किया। वह वस्र धारण करते हुए बुद्ध ने आनन्द को बताया कि सभी बुद्ध बुद्धत्व की पूर्व रात्रि और मृत्यु से पूर्व की रात्रि को सुवर्ण वस्र धारण करते हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि वे कुशीनर में ही निर्वाण प्राप्त करेंगे। तब बुद्ध ने ककुत्थ नदी में स्नान किया और कुछ देर विश्राम करके उपवत्तन साल उद्यान में पहुँचे। वहाँ आनन्द ने उत्तर की ओर सिर वाली एक शय्या उनके लिए बनाई। कहा जाता है कि पेड़ों ने उनके शरीर पर पुष्प-वृष्टि की। आकाश से दिव्य मन्दवर पुष्पों और चन्दन-रज की वृष्टि हुई। पवन ने दिव्य संगीत एवं ध्वनि-वादन किया। साल-उद्यान ने अपने सभी वृक्षों की शाखाओं को झुका कर उन पर चँवर डुलाए, पर बाद में दिव्य गणों ने उससे उन्हें हटाने का अनुरोध किया, जिससे वे सब भी बुद्ध के अन्तिम दर्शन कर सकें।

तब बुद्ध ने आनन्द को अपने अंतिम संस्कारों के विषय में निर्देश दिए। व्यथित आनन्द ने बुद्ध से कुशीनर में प्राणोत्सर्ग न करने का आग्रह किया क्योंकि वह एक गन्दा और गर्हित गाँव था। तब बुद्ध ने उस स्थान की प्रशंसा की क्योंकि एक बार ये स्थान महा-सुदस्सन की राजधानी रह चुका था।

बुद्ध की आसन्न मृत्यु की सूचना पाकर कुशीनर के मल्ल और बहुत से अन्य लोग भी वहाँ एकत्रित हो गए। बुद्ध ने सुभद्द को दीक्षित किया जिसे आनन्द ने अस्वस्थ बुद्ध के पास जाने से रोका था। तब बुद्ध ने भिक्षुओं से शंका-निवारण के लिए पूछा। पर किसी भिक्षु ने कोई प्रश्न नहीं किया। तब बुद्ध बोले-

जो भी सत् है उसका, निश्चित है विनाश।
बन्धन-मुक्ति के लिए, करते रहो सतत् प्रयास।।

ये उनके अन्तिम शब्द थे। तब समाधि की विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए, वैशाख मास की पूर्णिमा को, अस्सी वर्ष की आयु में उन्होंने परिनिर्वाण प्राप्त किया। मल्लों ने उनकी चिता को अग्नि दी। जब चिता पूर्णतया भ हो गई तो उन्होंने भालों से उसे चारों ओर से घेर लिया और सात दिनों तक शोक मनाया।

(थाई संस्करण)

बुद्ध के परिनिब्बान के उपरान्त, उनके अवशेषों के कई दावेदार उपस्थित हो गए और युद्ध की सी स्थिति हो गई। अंतत:, विवाद इस प्रकार टला- अवशेषों के आठ बराबर हिस्से किए गए और मगधराज अजातसत्तु, कपिलवत्थु के शाक्य, रामगाम के कोलिय, वेसालि के लिच्छवि, अल्लकप्पा के बुल, वेलपत्था के एक ब्राह्मण, पावा के एक प्रतिनिधिमंडल और कुशीनर के मल्लों ने ये हिस्से आपस में बाँट लिए। अवशेषों का वितरण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करने वाले दोन को वितरण-पात्र रखने की अनुमति दि गई। पिप्फलिवन के मोरियों को देर से आने के कारण केवल भ ही प्राप्त हुई।




* सुद्धोदन - Gautam Buddha Ki Kahani


गौतम बुद्ध के पिता शाक्यवंसी सुद्धोदन, राजा सीहहनु के पुत्र कपिवस्तु के राजा थे। उनकी माता का नाम कच्चाना था, जो देवदत के राजा देवदत सक्क की राजकुमारी था। सुद्धोदन के चार सहोदर भाई द्योतदन, सक्कोदन, सुक्कोदन तथा अमितोदन थे। उनकी दो बहनें थी- अमिता और पमिता।

सुद्धोदन की पटरानी गौतम बुद्ध की माता महामाया थी, जिनकी मृत्यु के पश्चात् महाप्रजापति गौतमी की छोटी बहन जो महामाया के साथ ही उनसे ब्याही गयी थी, उनकी नयी पटरानी बनी।

जब उनके कुल-गुरु असित बुद्ध के जन्म पर कपिलवस्तु पधारे और शिशु में बुद्धत्व के सारे लक्षणों का अवलोकन कर उनके पैरों को अपने शीश से सटा प्रणाम किया तो सुद्धोदन ने भी बुद्ध का पूजन किया।

सुद्धोदन ने बुद्ध का पूजन दूसरी बार तब किया जब बुद्ध हल-जोतने की रीति निभाते हुए एक जम्बु-वृक्ष के नीचे बैठ ध्यानमग्न थे।

सुद्धोदन ने जब विशिष्ट ज्योतिषियों के द्वारा गौतम के बुद्ध बनने की संभावना को सुना तो उन्होंने हर सम्भव प्रयत्न किया कि संयासोन्मुखी कोई भी बात या घटना या दृश्य सिद्धार्थ के सामने न आये और हर प्रकार के राजकीय जीवन में उन्हें लिप्त रखने की चेष्टा की। किन्तु उनकी हर चेष्टा निर्रथक सिद्ध हुई और सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए गृह-त्याग कर ही गये।

सुद्धोदन को जैसे ही बुद्ध की सम्बोधि प्राप्ति की सूचना मिली और उनके गौरव पता चला तो उन्होंने तत्काल दस हज़ार सिपाहियों के साथ एक दूत बुद्ध को बुलाने के लिए भेजा। किन्तु उनके सारे अनुचर वापिस न लौट बुद्ध के अनुयायी बन उनके संघ में प्रविष्ट हो गये। उक्त घटना के पश्चात् भी उन्होंने नौ बार दूत भेजे। किन्तु हर बार उनके दूत और उनके साथी बुद्ध के अनुयायी बन संघ में प्रविष्ट हो जाते। अंतत: सुद्धोदन ने बुद्ध के बचपन के सखा कालुदायी को बुद्ध को दूत के रुप में बुद्ध के पास भेजा। कालुदायी भी बुद्ध से प्रभावित हो संघ में प्रविष्ट हो गये। किन्तु कालुदायी ने जो वचन सुद्धोदन को दिया था उसके पालन करते हुए बुद्ध को अपने पिता से मिलने का आग्रह करते रहे। अंतत: कालुदायी के दो महीनों के आग्रह के बाद बुद्ध ने कपिलवस्तु जाने को तैयार हुए और अपने साथ भिक्षुओं का एक महासंघ भी लेते गये।

कपिलवत्थु पहुँच कर बुद्ध अपने साथियों के साथ निग्रोधाराम में रुके। तत: वे दैनिक भिक्षाटन के लिए निकले।

राजा सुद्धोदन को जब यह सूचना मिली कि बुद्ध कपिलवस्तु का उत्तराधिकारी, उनके ही राज्य की गलियों में भिक्षाटन कर रहे थे तो बहुत खिन्न हुए। किन्तु बुद्ध ने उन्हें जब यह कही कि भिक्षुओं के लिए भिक्षाटन कोई असंगत कार्य नहीं है तो राजा उनके उत्तर से संतुष्ट हुए। उनकी संतुष्ति ने तत्काल उन्हें सोतापन्न (अर्थात् जिसका अधिकतम जन्म सात बार तक हो सकता है) बना दिया।

बुद्ध और उनके साथी भिक्षुओं को जब अपने प्रासाद में भोजन कराने के बाद उन्होंने जब बुद्ध की 
देशना सुनी तो वे सकिदागामी बने (अर्थात् जिसका अधिकतम जन्म सिर्फ एक बार और होता है)। फिर बुद्ध द्वारा महाधम्मपाल जातक सुनने के बाद अनागामी बने (अर्थात् जिसका जन्म पृथ्वी पर दुबारा नहीं होता)।

सुद्धोदन जब मृत्यु-शय्या पर पड़े थे तब बुद्ध ने उनके अंतकाल को अपनी दिव्य-चक्षु से देखा। और उड़ते हुए उनके पास पहुँच उन्हें धम्म देशना दी जिसे सुन सुद्धोदन की प्राप्ति की सांसारिक बंधनों से मुक्त प्राणी जो निर्वाण पद को पाते है अर्हत कहलाते हैं।



* सुजाता - Gautam Buddha Ki Kahani


सम्बोधि-प्राप्ति के पूर्व बुद्धों का किसी न किसी महिला के हाथों खीर का ग्रहण करना कोई अनहोनी घटना नहीं रही हैं। उदाहरणार्थ, विपस्सी बुद्ध ने सुदस्सन-सेट्ठी पुत्री से, सिखी बुद्ध ने पियदस्सी-सेट्ठी-पुत्री से, वेस्सयू बुद्ध ने सिखिद्धना से, ककुसंघ बुद्ध ने वजिरिन्धा से, कोमागमन बुद्ध ने अग्गिसोमा से, कस्सप बुद्ध अपनी पटनी सुनन्दा से तथा गौतम बुद्ध ने सुजाता से खीर ग्रहण किया था।

पाँच तपस्वी साथियों के साथ वर्षों कठिन तपस्या करने के बाद गौतम ने चरम तप का मार्ग निर्वाण प्राप्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना। तत: उन तपस्वियों से अलग हो वे जब अजपाल निग्रोध वृक्ष के नीचे बैठे तो उनमें मानवी संवेदनाओं के अनुरुप मानवीय आहार ग्रहण करने की इच्छा उत्पन्न हुई जिसे सुजाता नाम की महिला ने खीर अपंण कर पूरा किया।

उस वृक्ष के नीचे एक बार उसवेला के निकटवर्ती सेनानी नाम के गाँव के एक गृहस्थ की पुत्री सुजाता ने प्रतिज्ञा की थी के पुत्र-रत्न प्रप्ति के बाद वह उस वृक्ष के देव को खीर-अपंण करेगी। जब पुत्र-प्राप्ति की उसकी अभिलाषा पूर्ण हुई, तब उसने अपनी दासी पुनाना के उस वृक्ष के पास की जगह साफ करने को भेजा जहाँ उसे खीरापंण करना था। जगह साफ करते समय पुनाना ने जब गौतम को उस पेड़ के नीचे बैठे देखा तो उन्हें ही उस पेड़ का देव समझ भागती हुई अपनी स्वामिनी को बुलाने गयी। देव की उपस्थिति के समाचार से प्रसन्न सुजाता भी तत्काल वहाँ पहुँची और सोने की कटोरी में बुद्ध को खीर अपंण किया।

बुद्ध ने उस कटोरी को ग्रहण कर पहले सुप्पतित्थ नदी में स्नान किया। तत्पश्चात् उन्होंने उस खीर का सेवन कर अपने उनचास दिनों का उपवास तोड़ा।



* सारिपुत्र - Gautam Buddha Ki Kahani


सारिपुत्र (शारिपुत्र) और मोग्गल्लान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्य 'धम्म-सेनापति' के नाम प्रसिद्ध हैं। सारिपुत्र का वास्तविक नाम उपतिस्स था। बौद्ध परम्परा में उन्हें सारिपुत्र का नाम इस कारण दिया गया था कि वे नालक निवासिनी रुपसारी के पुत्र (पुत्त) थे। उनका दृढ़ संकल्प बौद्ध इतिहास में विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। गौतम बुद्ध के पुत्र राहल की उपसंपटा (दीक्षा) भी उनके द्वारा की गई थी।

अभिधम्म-बुद्ध धम्म की मौलिक विवेचनात्मक सूक्ष्मता की देशना है। इसे धरती पर सुनने वाले सबसे पहले मानव सारिपुत्र थे और समस्त मानव-जाति में वे अकेले व्यक्ति थे जिसे बुद्ध के मुख से सीधी सुनने का गौरव भी प्राप्त हैं। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि सीधी सुनने का गौरव भी प्राप्त हैं। धरती पर अभिधम्म की ज्योति जलाने वाले पहले आचार्य सारिपुत्र थे जिन्होंने गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा समस्त विश्व को अभिधम्म का अनुपम उपहार दिया। परम्परा के अनुसार उन्होंने सर्वप्रथम भद्दजी को अभिधम्म की शिक्षा दी जिसने कालान्तर में सोभित, पियजलि आदि के माध्यम से अशोक-पुत्र महिन्द (महेन्द्र), इत्तिय, संबल पण्डित एवं भद्दनाम के माध्यम से श्रीलंका को आलोकित किया। तत: म्यानमार, थाईलैंड आदि देशों में भी अभिधम्म-ज्योति उच्चतम प्रतिष्ठा को प्राप्त हुई। इस शिक्षा का वहाँ वही स्थान है जो इस्लामिक देशों में कुरान शरीफ का, ईसाइयों में बाईबिल का और हिन्दुओं में ॠग्वेद का हैं।

कहा जाता है कि तावलिंस लोक में परिच्छतक वृक्ष के नीचे सक्क (शक्र, इन्द्र) के आसन पर विराजमान हो तीन महीने तक अपनी माता को अभिधम्म की शिक्षा देते रहे। किन्तु हर दिन वे अपना प्रतिरुप वहाँ रख अनोत्तप सरोहर में उत्तर सारिपुत्र को वही देशना सहज स्मरणीय रुप में सुना जाते। 

सारिपुत्र फिर उन्हीं देशनाओं का संगमन अपने पाँच सौ शिष्यों के साथ करते थे। तत: तीन मास में जैसे ही बुद्ध ने अभिधम्म की शिक्षा तावलिंस व अनोतय पर पूरी की तो पृथ्वी पर भी अभिधम्म की सात पुस्तकें तैयार हो गयी तथा तभी से अभिधम्म संगमन परम्परा द्वारा विश्व में जीवित रही।

सारिपुत्र के विषय में एक और कथा प्रचलित है कि एक बार वे एक चाँदनी रात में किसी खुले मैदान में समाधिस्थ थे तो उनके ऊपर से एक उड़ता हुआ यक्ष जा रहा था। उनके चमकीले व चिकने सिर पर पड़ती हुई चाँद की रोशनी से आकृष्ट हो उस यक्ष को एक शरारत सूझी और उसने उनके सिर पर एक जोर का घूँसा मारा। कहा जाता है कि वह घूँसा इतना शक्तिशाली था कि उससे एक पर्वत भी ध्वस्त हो सकता था। किन्तु सारिपुत्र की समाधि पर उस घूँसे का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हाँ, जब वे समाधि से उठे तो उन्होंने अपने सिर पर थोड़ी पीड़ा अवश्य अनुभव की।



* मोग्गलन - Gautam Buddha Ki Kahani


बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों में से एक थे- मोग्गलन, जिन्हें पालि परम्परा में, महामोग्गलन भी कहा जाता है। इन्हें बुद्ध ने सारिपुत्त के साथ एक ही दिन दीक्षा दी थी और यह भी घोषणा कि थी कि ये दोनों उनके प शिष्य हैं। सारिपुत्त जहाँ अपनी बुद्धिमत्ता के लिए विख्यात थे, वहीं मोग्गलन अपनी अद्भुत चामत्कारिक शक्तियों के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरण के लिए, वे विविध जीवन्त आकृतियों के निर्माण में समर्थ थे, कोई भी रुप धारण कर सकते थे। एक बार उन्होंने मिगरमतुपसाद नामक मठ को अपने चरण-स्पर्श मात्र से हिला दिया था। यह भू-तल के उन कुछ भिक्षुओं के लिए चेतावनी थी जो यह जानते हुए भी गल्प-कथन में मग्न थे कि स्वयं बुद्ध उस मठ के प्रथम तल पर विद्यमान हैं।

मोग्गलन और सारिपुत्त एक ही दिन जन्मे थे। इनकी माता का नाम मोग्गली (या मोग्गलानी) होने से इनका नाम मोग्गलन पड़ा। इनके गाँव के नाम की वजह से इन्हें कोलित भी कहा जाता था। मोग्गलन और सारिपुत्त के परिवारों के बीच सात पीढियों से मैत्री सम्बन्ध था, अत: ये दोनों भी शैशव से ही मित्र थे। एक बार दोनों मित्र एक नाटक (गिरग्गसमज्जा) देखने गए और उसके माध्यम से दोनों ने अनुभव किया कि 'यह विश्व भी एक नाटक ही हैं और 'सभी सांसारिक वस्तुएँ अनित्य हैं।' इस अनुभव से दोनों संसार से विरक्त हो गए। पहले ये संजय के शिष्य हुए, पर उनकी शिक्षाओं से असन्तुष्ट हो, इन्होंने सारे भारत में घूम-घूमकर उस समय के सभी विद्वानों से विचार-विमर्श किया। अन्तत:, इस सब से असन्तुष्ट दोनों ने अलग-अलग होने का निश्चय किया और प्रण लिया कि दोनों एक-दूसरे को किसी भी उल्लेखनीय अन्वेषण से अवगत करवाएंगे।

जब सारिपुत्त ने बुद्ध के एक शिष्य अस्साजी के प्रवचन सुने, तो वे उनके सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुए और एक सोतपन्न बन गए। वे मोग्गलन के पास पहुँचे और उन्हें अपनी उपलब्धि की सूचना दी और बुद्ध-वचन सुन, मोग्गलन भी एक सोतपन्न बन गए। दोनों संजय के पाँच सौ शिष्यों सहित बुद्ध के दर्शनार्थ चल दिए। उन सभी ने बुद्ध के दर्शन किए और उनके प्रवचन सुने और मोग्गलन एवं सारिपुत्त को छोड़, सभी अर्हत् बन गए। मोग्गलन मगध के कल्लवल के उपग्राम में चले गए। दीक्षा के एक सप्ताह के उपरान्त, समाधि की परम अवस्था में, उन्हें बुद्ध से दीक्षा प्राप्त हुई और वे भी अर्हत् बन गए। मोग्गलन समाधि की तुरीय अवस्था में बहुत जल्दी पहुँच जाते थे। इसीलिए महान् नाग नन्दोपनन्द के दमन को उनकी पारलौकिक शक्तियों का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है।

जब देवदत्त द्वारा संघ में विभाजन की बात उठी, तो बुद्ध ने इन दो प शिष्यों को गयासीस भेजा, ताकि वे भ्रमित भिक्षुओं को लौटा पाएँ। दोनों ने पाँच सौ भिक्षुओं को संघ में वापस लौटाकर, अपने कर्त्तव्य का सफलतापूर्वक निर्वहण किया। बुद्ध के पुत्र राहुल के गुरु सारिपुत्त थे, तो मोग्गलन उनके शिक्षक। सारिपुत्त और मोग्गलन ने एक-दूसरे से एक अनुरोध किया था। मोग्गलन ने सारिपुत्त के पन्द्रह दिन बाद प्रतिपदा के दिन देह-त्याग किया।

कलसिल में मोग्गलन जब अपने कक्ष में थे तो कुछ डाकुओं ने उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा। उनका अन्त बहुत कारुणिक हुआ। किसी तरह अपनी टूटी हड्डियों वाले जर्जर शरीर को घसीटते हुए, वे बुद्ध के पास पहुँचे और उनसे इस संसार को छोड़ने की अनुमति मांगी। परम्परा कहती है कि उनका दु:खदायी अन्त इसलिए हुआ क्योंकि अपने किसी पूर्वजन्म में उन्होंने अपने बूढ़े, जर्जर और अन्धे माता-पिता को, अपनी पत्नी के दुराग्रह पर एक वन में ले जाकर पीट-पाटकर मार डाला था। ऐसा उन्होंने मोहग्रस्त होकर किया था। 
इसीलिए इस वर्तमान जन्म में उन्हें ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई क्योंकि कर्मफल से कोई नहीं बच सकता।

जातक कथाओं में मोग्गलन कई पात्रों के रुप में चित्रित हैं- उदाहरणार्थ- इन्द्रिय जातक में किसवच्चा, कुर्रूंगमिग जातक में कछुआ, तित्तिर जातक में व्याघ्र, विधुरपंडित जातक में गरुड़राज इत्यादि।



* मार-कथा - Gautam Buddha Ki Kahani


बौद्ध-परम्परा में मार मृत्यु, कुकृत बल और प्रलोभक के रुप में जाना जाता है जिसे आधुनिक भाषा में शैतान का रुप समझा जा सकता हैं।

जब यह कहा जाता है कि 'मार एक है' तो वह क्लेश अथवा मृत्यु का द्योतक है। मार के पाँच रुप माने जाते हैं जब उसे पाँच संघों के संदर्भ में समझा जाता है। पुन: मार को अभिसड्खार मार तथा यम के चार देव पुत्रों के रुप में भी स्वीकार किया गया है।

मार को नमुचि का नाम दिया गया है क्योंकि कोई भी उससे नहीं बच सकता। उसे वसवत्ती भी कहा जाता हैं क्योंकि वह हर कोई को अपने वश में करता हैं। जब भी वह किसी को शील के मार्ग पर अग्रसर देखता है तो उसे पथ-भ्रष्ट करने के लिए अनेकों अवरोध उत्पन्न करता हैं। उदाहरण के लिए श्रेष्ठी-जातक में जब एक राजा किसी पच्चेक बुद्ध को दान देने के लिए उन्मुख होता है तो मार उसके मामने एक विशालकाय खाई उत्पन्न करता है जिससे अग्नि की प्रचण्ड लपटें भयंकर गर्ज़ना के साथ उठती हैं।

मार की कहानियों का प्रथम परिचय पधान-सुत्त में होता है जहाँ मार बुद्ध को संबोधि-प्राप्त करने से रोकने का यत्न करता है।

मार की दस सेनाएँ होती हैं, यथा राग (लिप्सा), असंतोष या घृणा, भूख, प्यास, तृष्णा, आलस्य, भय, शंका, दम्भ तथा घमण्ड। उपर्युक्त सेनाओं में उसकी तीन पुत्रियाँ भी है जो तृष्णा, अरति (असंतोष) तथा राग के नाम से जानी जाती हैं।



* बिम्बिसार - Gautam Buddha Ki Kahani


मगध के राजा बिम्बिसार की राजधानी राजगीर थी। बिम्बिसार गौतम बुद्ध के सबसे बड़े प्रश्रयदाता थे। वे पन्द्रह वर्ष की आयु में राजा बने और अपने पुत्र अजातसत्तु (संस्कृत- अजातशत्रु) के लिए राज-पाट त्यागने से पूर्व बावन वर्ष इन्होंने राज्य किया। राजा पसेनदी की बहन और कोसल की राजकुमारी, इनकी पत्नी और अजातसत्तु की माँ थी। खेमा, सीलव और जयसेना नामक इनकी अन्य पत्नियाँ थीं। विख्यात वारांगना अम्बापालि से इनका विमल कोन्दन्न नामक पुत्र भी था।

सुत्तनिपात अट्ठकथा के पब्बज सुत्त के अनुसार, इन्होंने संयासी गौतम का प्रथम दर्शन पाण्डव पब्बत के नीचे अपने राजभवन के गवाक्ष से किया और उनके पीछे जाकर, उन्हें अपने राजभवन में आमंत्रित किया। गौतम ने इनका निमंत्रण अस्वीकार किया तो इन्होंने गौतम को उनकी उद्देश्य-पूर्ति हेतु शुभकामनाएँ दी और बुद्धत्व-प्राप्ति के उपरान्त उन्हें फिर से राजगीर आने का निमंत्रण दिया। तेभतिक जटिल के परिवर्तन के बाद, बुद्ध ने राजगीर में पदापंण करके, अपना वचन पूरा किया।

बुद्ध और उनके अनुयायी राजकीय अतिथियों की भाँति राजगीर आए। बुद्ध और उनके अनुयायियों के लिए वेलुवन उद्यान दान में देने के अपने प्रण की पूर्ति दर्शाने के लिए, बिम्बिसार ने बुद्ध के हाथ स्वर्ण-कलश के पानी से धुलवाए। अपि च, आगामी र्तृतीस वर्षों तक बिम्बिसार बौद्ध धर्म के विकास में सहायक बने।

बिम्बिसार का अन्त बड़ा दारुण हुआ। ज्योतिषियों की इस भविष्यवाणी के बाद भी कि उनका पुत्र अजातसत्तु उनके लिए अशुभ सिद्ध होगा, उन्होंने उसे बड़े लाड-प्यार से पाला। बुद्ध को राजा द्वारा दिए गए प्रश्रय से देवदत्त बहुत द्वेष करता था और उसी के दुष्प्रभाव में आकर अजातसत्तु ने अपने पिता की हत्या का षड्यन्त्र रचा, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और धूमिल हो गई। षड्यन्त्र का पता चलने और पुत्र की राज्य-लिप्सा की तीव्रता को देखकर, बिम्बिसार ने स्वयं ही राज्य-त्याग कर दिया और अजातसत्तु राजा बन गया। परन्तु देवदत्त द्वारा पुन: उकसाए जाने पर नए राजा ने बिम्बिसार को बन्दी बना लिया।

चूँकि बिम्बिसार को केवल भूखा रखकर ही मारा जा सकता था, उन्हें एक गरम कारागार में भूखा रखा गया। खेमा (अजातसत्तु की माँ) के अतिरिक्त किसी को उनसे मिलने की अनुमति नहीं थी। पहले, खेमा अपने परिधान में एक सुवर्ण-पात्र में भोजन, छिपाकर ले गईं। उसका पता चलने पर वे अपने पाद-त्राण में भोजन छिपाकर ले गईं। उसका भी पता चल गया तो उन्होंने अपने शिरो-वस्र (मोलि) में भोजन छिपाकर ले जाना चाहा। उसका भी पता चला गया तो वे सुगंधित जल में स्नान करके, अपनी देह को मधु से लेपकर गईं, जिससे वृद्ध राजा उसे चाट लें और बच जाएँ। पर अन्तत:, यह भी पता चल गया और उनका भी प्रवेश निषेध कर दिया गया।

फिर भी चल-ध्यान योग से बिम्बिसार जीवित रहे। जब पुत्र को पता चला कि पिता यूँ सरलता से प्राण-त्याग नहीं करेंगें तो उसने कारागार में कुछ नाइयों को भेजा। बिम्बिसार ने सोचा कि अंतत: पुत्र को अपनी भूल का अनुभव हुआ और ब वह पश्चाताप कर रहा है। अत: उन्होंने नाइयों से अपनी दाढ़ी और बाल काटने को कहा ताकि वे भिक्षुवत् जीवन-यापन कर पाऐं। पर नहीं! उन नाइयों को इसलिए भेजा गया था ताकि वे बिम्बिसार के पैरों को काटकर उनके घावों में नमक और सिरका डाल दें और तत्पश्चात् उन घावों को कोयलों से जला दें।

इस प्रकार बिम्बिसार का चल-ध्यान रोक दिया गया और वे दु:खद मृत्यु को प्राप्त हुए।



* नंद कुमार - Gautam Buddha Ki Kahani


बुद्ध के सौतेले भाई तथा उनकी माता की छोटी बहन के पुत्र नंद जिस दिन जनपद कल्याणी के साथ परिणय-सूत्र में बँधने वाले थे उसी दिन बुद्ध उनके महल में पहुँचे। फिर उनसे अपने भिक्षाटन के कटोरे को उठा अपने साथ अपने विहार ले आये। विहार लाकर बुद्ध ने उन्हें भी भिक्षु बना दिया। नंद ने भी भिक्षुत्व स्वीकार किया किन्तु उनका मन बार-बार जनपद-कल्याणी की ओर खींच-खींच जाता था।

एक दिन बुद्ध नंद को हिमालय की सैर कराने ले गये। वहाँ उन्होंने एक जली हुई बंदरिया का मृत शरीर देखा। नंद से पूछा, "क्या जनपद कल्याणी इससे भी अधिक सुंदर है?" नंद ने कहा, "हाँ"। तब बुद्ध उन्हें आकाश-मार्ग से उड़ाते हुए तावतिंस लोक ले गये, जहाँ सबक (शक्र; इन्द्र) और उसकी अपूर्व सुंदरियों ने उनकी आवभगत की। बुद्ध ने तब नंद से पूछा, "क्या जनपद कल्याणी इन सुंदरियों से भी सुंदर है?" तब नंद ने कहा, "नहीं"। बुद्ध ने नंद के सामने तब यह प्रस्ताव रखा कि यदि वे भिक्षु की चर्या अपनाएंगे तो उनकी शादी शक्क की किसी भी सुन्दरी से करा देंगे। नंद ने बुद्ध का प्रस्ताव मान लिया।

नंद के साथ जब बुद्ध अपने विहार पहुँचे तो वहाँ उपस्थित अस्सी भिक्षुओं ने नंद से उनके भिक्षुत्व की प्रतिज्ञा के संदर्भ में प्रश्न किया। तब नन्द का मुख लज्जावनत हो गया। वे अपनी पूरी शक्ति के साथ अर्हत्व की साधना में जुट गये और अंतत: अर्हत् बनने का लक्ष्य प्राप्त कर ही लिया।



* जनपद कल्याणी नंदा -Gautam Buddha Ki Kahani 


बुद्ध के भाई नंद की मंगेतर जनपद कल्याणी नंदा अपने काल की अपूर्व रुपसी थी। उसका नाम 'जनपद कल्याणी' इसलिए पड़ा था कि उसका रुप, लावण्य और शोभा और श्री समस्त जनपद के लिए कल्याणकारी माना जाता था। नंद से उसका प्रगाढ प्रेम था और उनसे शादी की आशा में वह फूले न समा रही थी।

किन्तु जिस दिन वह नंद के साथ परिणय-सूत्र में बंधने जा रही थी और अपनी शादी की सारी तैयारियों को निहार-निहार पुलकित हो रही थी ठीक उसी समय उसने नंद को बुद्ध के साथ बुद्ध के भिक्षाटन के कटोरे को लिये प्रासाद से बाहर जाते देखा। फिर बहुत देर तक उनके लौटने की राह तकती रही । देर शाम तक नंद वापिस न लौटे। तभी अचानक उसे यह सूचना दि गयी कि नंद भी गृहस्थ त्याग भिक्षु बन चुके थे। इस सूचना से जनपद कल्याणी नंदा को गहरा आघात लगा और वह मूर्व्हिच्छत हो गई।



* फुस्स बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


चौबीस बुद्धों की परिगणना में फुस्स बुद्ध का स्थान अट्ठारहवाँ हैं। इनका जन्म काशी के सिरिमा उद्यान में हुआ था। इनके पिता का नाम जयसेन था जो एक कुलीन क्षत्रिय थे। मनोरत्थपूरणी के अनुसार उनके पिता का नाम महिन्द्र था। उनकी एक बहन थी और तीन सौतेले भाई। इनकी पत्नी का नाम किसागोतमा था, जिससे उन्हें आनन्द नाम के पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई थी।

परम्परा के अनुसार उनकी लम्बाई अट्ठावन हाथों की थी तथा वे गरुड, हंस तथा सुवम्णभार नामक तीन प्रासादों में छ: हज़ार वर्षों तक रहे। तत: एक हाथी पर सवार हो उनहोंने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। एवं छ: वर्षों के तप के बाद उन्होंने सम्बोधि प्राप्त की।

सम्बोधि के ठीक पूर्व उन्होंने एक श्रेष्ठी कन्या सिरिवड्ढा के हाथों खीर और सिखिवड्ढ नामक एक संयासी द्वारा प्रदत्त घास का आसन ग्रहण किया था। एक अमन्द (आम्लक) वृक्ष के नीचे विद्या बोधि की प्राप्ति की।

सुखित और धम्मसेन उनके प्रमुख शिष्य थे तथा साला और उपसाला उनकी प्रमुख शिष्याएँ। संजय, धनन्जय तथा विसारक उनके प्रमुख उपासक थे तथा पदुमा और नागा उनकी प्रमुख उपासिकाएँ। उपर्युक्त दोनों महिलाएँ उनकी मुख्य प्रश्रय-दा थीं।

उन दिनों बोधिसत्त अरिमंद नामक स्थान में उत्पन्न हुए थे। तब उनका नाम निज्जितावी था।

नब्बे हजार वर्ष की अवस्था में उनहोंने सेताराम (सोनाराम) में परिनिर्वाण की प्राप्ति की। तत: उनके अवशेष बिखेर दिये गये थे। 



* विपस्सी बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


पालि परम्परा में विपस्सी उन्नीसवें बुद्ध माने जाते हैं। उनका जन्म बन्धुमती के खेम-उद्यान में हुआ था। उनकी माता का नान भी बन्धुमती था। उनके पिता का नाम बन्धुम था, जिनका गोत्र कोनडञ्ञ था। उनका विवाह सूतना के साथ हुआ था जिससे उन्हें समवत्तसंघ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

एक रथ पर सवार हो उन्होंने अपने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। तत: आठ महीने के तप के बाद उन्होंने एक दिन सुदस्सन-सेट्ठी की पुत्री के हाथों खीर ग्रहण कर पाटलि वृक्ष के नीचे बैठ सम्बोधि प्राप्त की। उस वृक्ष के नीचे उन्होंने जो आसन बनाया था उसके लिए सुजात नामक एक व्यक्ति ने घास दी थी।

सम्बोधि प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना पहला उपदेश अपने भाई संघ और अपने कुल पुरोहित पुत्र-लिस्स को खोयमित्रदाय में दिया था। अशोक उनके मुख्य उपासक थे तथा चंदा एवं चंदमिता उनकी मुख्य उपासिकाएँ थी। पुनब्बसुमित्त एवं नाग उनके मुख्य प्रश्रयदाता तथा सिरिमा एवं उत्तरा उनकी प्रमुख प्रश्रयदातृ थीं। अस्सी हजार वर्ष की अवस्था में वे परिनिवृत हुए।

विपस्सी बुद्ध के काल में बोधिसत्त अतुल नामक नागराज के रुप में जन्मे थे। तब उन्होंने विपस्सी बुद्ध को एक रत्न-जड़ित स्वर्ण-आसन प्रदान करने का गौरव प्राप्त किया था।



* शिखि बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


पालि परम्परा में शिखि बुद्ध बीसवें बुद्ध हैं। इनके पिता का नाम अरुनव और माता का नाम पभावति है। अरुणावती नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ। इनकी पत्नी का नाम सब्बकामा था। इनके अतुल नाम का एक पुत्र था।

इन्होंने हाथी पर सवार होकर गृह-त्याग करने से पूर्व, सात हज़ार वर्षों तक सुछन्दा, गिरि और वेहन के प्रासादों में निवास किया। आठ महीने इन्होंने तपस्या की। बुद्धत्व-प्राप्ति से पूर्व इन्होंने प्रियदस्सी सेट्ठी की पुत्री से खीर ग्रहण की, और अनोमादास्सी द्वारा निर्मित आसन पर ये बैठे। पुण्डरीक (कमल) के वृक्ष के नीचे इन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई। मिगचिर उद्यान में इन्होंने अपना प्रथम उपदेश दिया और सुरियावती के निकट एक चम्पक-वृक्ष के नीचे इन्होंने अपने चमत्कार द्वय का प्रदर्शन किया। इनके पट्टशिष्य थे- अभिभू और सम्भव। अखिला (या मखिला) और पदुमा इनकी प्रमुख शिष्याएँ थीं। खेमंकर इनके प्रमुख सेवक थे। सिरिवद्ध और छन्द (या नन्द) इनके मुख्य आश्रयदाता थे तथा चित्ता एवं सुगुत्ता इनकी प्रमुख आश्रयदातृयाँ थीं।

ये सत्तर हज़ार वर्ष जिए और सीलावती के दस्साराम (अस्साराम) में इन्होंने देह-त्याग किया।

इनकी पगड़ी (उन्हिस; संस्कृत- उष्णीष) शिखा (आग की लपट) की भाँति प्रतीत होने से इन्हें शिखि कहा गया।

इस युग में बोधिसत्त का अवतार राजा अरिन्दम के रुप में हुआ और उन्होंने परिभुत्त पर राज्य किया।



* वेस्सभू बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


वेस्सभू बुद्ध पालि परम्परा में इक्कीसवें बुद्ध के रुप में मान्य हैं। उनके पिता का नाम सुप्पतित्त तथ माता का नाम यसवती था। उनका जन्म अनोम नगर में हुआ था तथा उनका नाम वेस्सभू रखा गया था क्योंकि पैदा होते ही उन्होंने वृसभ की आवाज़ निकाली थी। उनकी पत्नी का नाम सुचित्रा तथा पुत्र का नाम सुप्पबुद्ध था।

छ: हज़ार सालों तक रुचि, सुरुचि और वड्ढन नामक प्रासादों में सुख-वैभव का जीवन-यापन करने के बाद सोने की पालकी में बैठकर उन्होंने अपने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था।

तत: छ: महीनों के तप के पश्चात् उन्होंने एक साल वृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त की। सम्बोधि के पूर्व उन्होंने सिरिवड्ञना नामक कन्या के हाथों खीर ग्रहण किया था। उनका आसन नागराज नरीन्द ने एक साल वृक्ष के नीचे बिताया था। उन्होंने अपने प्रथम उपदेश अपने दो भाई सोन और उत्तर को दिये थे, जो कि उनके दो प्रमुख शिष्यों के रुप में जाने जाते हैं। उपसन्नक उनके प्रमुख उपासक थे। उनके प्रमुख प्रश्रयदाता सोत्थिक एवं राम, गोतमी और सिरिमा तथा उनकी प्रश्रयदातृ थीं।

साठ हज़ार वर्ष की अवस्था में उन्होंने खोमाराम में परिनिर्वाण प्राप्त किया। उनके अवशेषों को अनेक स्थानों में बिखेर दिया गया था। उन दिनों बोधिसत्त सारभवती में राजा सुदस्सन के नाम से राज्य करे था।



* ककुसन्ध बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


पालि-परम्परा में ककुसन्ध बाईसवें बुद्ध हैं। ये खेमा वन में जन्मे थे। इनके पिता अग्गिदत्त खेमावती के राजा खेमंकर के ब्राह्मण पुरोहित थे। इनकी माता का नाम विशाखा था। इनकी पत्नी का नाम विरोचमना और पुत्र का नाम उत्तर था।

इन्होंने चार हज़ार वर्ष की आयु में एक रथ पर चढ़ कर सांसारिक जीवन का परित्याग किया और आठ महीने तपस्या की। बुद्धत्व-प्राप्ति से पूर्व इन्होंने सुचिरिन्ध ग्राम की वजिरिन्धा नामक ब्राह्मण-कन्या से खीर ग्रहण की और ये सुभद्द द्वारा निर्मित कुशासन पर बैठे। शिरीष-वृक्ष के नीचे इन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई और अपना प्रथम उपदेश इन्होंने मकिला के निकट एक उद्यान में, चौरासी हज़ार भिक्षुओं को दिया।

भिक्षुओं में विधुर एवं संजीव इनके पट्टशिष्य थे और भिक्षुणियों में समा और चम्पा। बुद्धिज इनके प्रमुख सेवक थे। प्रमुख आश्रयदाता थे- पुरुषों में अच्छुत और समन तथा महिलाओं में नन्दा और सुनन्दा। अच्छुत ने ककुसन्ध बुद्ध के लिए उसी स्थान पर एक मठ बनवाया था, जहाँ कालान्तर में अनाथपिण्डक ने गौतम बुद्ध के लिए जेतवन आराम बनवाया था।

संयुत्त निकाय (त्त्.१९४) के अनुसार, उस समय राजगीर के वेपुल्ल पर्वत का नाम पच्छिनवंस था और उस क्षेत्र के लोग तिवर थे।

ककुसन्ध बुद्ध ने चालीस हज़ार वर्ष की आयु में देह-त्याग किया। इनके समय में बोधिसत्त ने राजा खेम के रुप में अवतार लिया था।



* कोनगमन बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


कोनगमन तेईसवें बुद्ध माने जाते हैं। ये भद्वकप्र (भद्र कल्प) के दूसरे बुद्ध हैं। सोभावती के समगवती उद्यान में जन्मे कोनगमन के पिता का नाम यञ्ञदत्त था। उत्तरा उनकी माता थी। इनकी धर्मपत्नी का नाम रुचिगत्ता था; और उनके पुत्र का नाम सत्तवाहा।

तीन हज़ार सालों तक एक गृहस्थ के रुप में रहने के बाद एक हाथी पर सवार होकर इन्होंने गृह-त्याग किया और संयास को उन्मुख हुए। छ: महीनों के कठिन तप के बाद इन्होंने अग्गिसोमा नाम की एक ब्राह्मण कन्या के हाथों खीर ग्रहण किया। फिर तिन्दुक नामक व्यक्ति द्वारा दी गई घास का आसन उदुम्बरा वृक्ष के नीचे बिछा कर तब तक समाधिस्थ रहे जब तक कि मेबोधि प्राप्त नहीं की। तत: सुदस्मन नगर के उद्यान में उनहोंने अपना पहला उपदेश दिया।

भिथ्य व उत्तर उनके प्रमुख शिष्य थे और समुद्दा व उत्तरा उनकी प्रमुख शिष्याएँ। कोपगमन का नाम कनकगमन से विश्पत्त है क्योंकि उनके जन्म के समय समस्त जम्बूद्वीप (भारतीय उपमहाद्वीप) में सुवर्ण-वर्षा हुई थी। इन्हीं का नाम संस्कृत परम्परा में कनक मुनि है। इनके काल में राजगीर के वेपुल्ल पर्वत का नाम वंकक था और वहाँ के लोग रोहितस्स के नाम से जाने जाते थे। उन दिनों बोधिसत्त मिथिला के एक क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए थे। तब उनका नाम पब्बत था। तीस हज़ार वर्ष की आयु में पब्बताराम में उनका परिनिर्वाण हुआ।

कोनगमन की कथ् केवल साहित्यिक स्रोत्रों पर ही आधारित नहीं है, उनका पुरातात्त्विक आधार भी है क्योंकि सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में कोनगमन बुद्ध के छूप को, जो उनके जन्मस्थान पर निर्मित था, दुगुना बड़ा करवाया था। इसके अतिरिक्त, फाहियान व ह्मवेनसांग ने भी उस छूप की चर्चा की है।



*  मेत्रेयः भावी बुद्ध - Gautam Buddha Ki Kahani


पालि परम्परा में मेत्रेय भावी बुद्ध के रुप में जाने जाते हैं। (संस्कृत ग्रंथों में इनका नाम मैत्रेय है ) परम्परा में यह मान्य है कि इनका जन्म तब होगा जब मनुष्यों का औसतन जीवन-काल चौरासी हज़ार वर्षों का होगा।

मेत्रेय का जन्म एक प्रसिद्ध विद्वत्-कुल में अजित के नाम से केतुमती नामक एक स्थान में होगा। इनके पिता का नाम सुब्रह्मण तथा माता का नाम ब्राह्मवती होगा। इनकी पत्नी की नाम चंदमुखी और पुत्र का नाम ब्रह्मवड्ढन होगा।

अभी मेत्रेय तुसित नामक देवलोक में नाथ के नाम से निवास कर रहे हैं। इन्हें विश्वपाणि भी कहा जाता है। महामाया के पेट में गर्भस्थ होने से पूर्व गौतम ने विश्वपाणि को ही तुसितलोक का उत्तराधिकार सौंपा था। चूँकि मेत्रेय ने अभी तक सांसारिकता का त्याग नहीं किया है। अत: चित्रों व प्रतिमाओं में मुकुट के साथ ही दर्शाए जाते हैं। 


Also read - 



👨   Summury - 

 If you liked this post of Gautam Buddha Ki Kahani , then do share it with others. To read more such post, please follow us.

अगर आपको Gautam Buddha Ki Kahani की यह पोस्ट अच्छी  लगी तो , इसे दूसरों के साथ  साझा  जरूर करे | इस तरह के पोस्ट को आगे और पढ़ने के लिए  फॉलो हमे जरूर करे |



Post a Comment

0 Comments