. . . Garuda Purana | संपूर्ण गरुड पुराण हिन्दी में 2020

Garuda Purana | संपूर्ण गरुड पुराण हिन्दी में 2020

Garuda Purana


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* गरुड़ पुराण - Garuda Purana


मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। 
 एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया।

 मत्स्य अवतार की कथा 
एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया। 
 इसकी विस्मयकारिणी कथा इस प्रकार है-
 कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया। यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। 
 अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? 

मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी। आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए।  


नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे 
भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया। 



* शरीर त्यागने के बाद कहां जाती है आत्मा - Garuda Purana


गरूड़ पुराण जो मरने के पश्चात आत्मा के साथ होने वाले व्यवहार की व्याख्या करता है उसके अनुसार जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो उसे दो यमदूत लेने आते हैं. मानव अपने जीवन में जो कर्म करता है यमदूत उसे उसके अनुसार अपने साथ ले जाते हैं. अगर मरने वाला सज्जन है, पुण्यात्मा है तो उसके प्राण निकलने में कोई पीड़ा नहीं होती है लेकिन अगर वो दुराचारी या पापी हो तो उसे पीड़ा सहनी पड़ती है. गरूड़ पुराण में यह उल्लेख भी मिलता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को यमदूत केवल 24 घंटों के लिए ही ले जाते हैं और इन 24 घंटों के दौरान आत्मा दिखाया जाता है कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किए हैं. इसके बाद आत्मा को फिर उसी घर में छोड़ दिया जाता है जहां उसने शरीर का त्याग किया था. इसके बाद 13 दिन के उत्तर कार्यों तक वह वहीं रहता है. 13 दिन बाद वह फिर यमलोक की यात्रा करता है.

पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं. उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है. ये तीन मार्ग हैं अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग. अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है.



* पुराण साहित्य - Garuda Purana


पुराण साहित्य में गरूड़ पुराण का प्रमुख स्थान है। सनातन धर्म में यह मान्यता है कि मष्त्यु के पश्चात् गरूड़ पुराण कराने से जीव को वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति हो जाती है। गरूड़ पुराण में 19 हजार श्लोक हैं किन्तु वर्तमान में कुल 7 हजार श्लोक ही प्राप्त होते हैं। प्रेत योनि को भोग रहे व्यक्ति के निमित्त गरूड़ पुराण करवाने से उसे आत्मशान्ति प्राप्त होती है और वह प्रेत योनि से मुक्त हो जाता है।

गरूड़ पुराण में प्रेत योनि एवं नर्क से बचने के उपाय बताये गये हैं। इनमें प्रमुख उपाय दान-दक्षिणा, पिण्ड दान, श्राद्ध कर्म आदि बताये गये हैं। मष्त आत्मा की सद्गति हेतु पिण्ड दानादि एवं श्राद्ध कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं और यह उपाय पुत्र के द्वारा अपने मष्तक पिता के लिये है क्योंकि पुत्र ही तर्पण या पिण्ड दान करके पुननामक नर्क से पिता को बचाता है। पुत्र का मुख देखकर पिता पैतष्क ऋण से मुक्त हो जाता है।

मष्त्यु के बाद क्या होता है:-

यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर जानने की इच्छा सभी को होती है और सभी अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर भी देते हैं। गरूड़ पुराण भी इसी प्रश्न का उत्तर देता है। मनुष्य अपने जीवन में शुभ, अशुभ, पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक जो भी कर्म करता है गरूड़ पुराण ने उसे तीन भागों में विभक्त किया है। पहली अवस्था में मनुष्य अपने शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे कर्मों को इसी लोक में भोग लेता है। दूसरी अवस्था में मृत्यु के उपरान्त मनुष्य विभिन्न चैरासी लाख योनियों में से किसी एक में अपने कर्म के अनुसार जन्म लेता है। तीसरी अवस्था में वह अपने कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नर्क को प्राप्त करता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार जो दूसरे की सम्पत्ति को हड़पता है, मित्र से विश्वासघात करता है, ब्राह्मणों की सम्पत्ति से अपना पालन करता है, मन्दिर से धन चुराता है, परायी-स्त्री या पर-पुरूष से व्यभिचार करता है, निर्बल को सताता है, जो अपनी निर्दोष माता, बहन, पुत्री, स्त्री, पुत्रवधु, पुत्र, इन्हें बिना किसी कारण के त्यागता है उसे भयंकर नरक योनि में जाना पड़ता है एवं उसकी कभी मुक्ति नहीं होती है। इस संसार में भी ऐसे पापी व्यक्ति को अनेक रोग एवं कष्ट घेर लेते हैं। व्यापार में हानि, घर में कलह, कष्षि हानि, ज्वर, सन्तान मष्त्यु आदि दुःख से वह जीवन भर दुःखी रहता है। अन्त समय उसका बड़ा कष्टमय होता है तथा मरने के पश्चात वह भयंकर प्रेत योनि में चला जाता है।

शीघ्रंप्रचलदुष्टात्मन् गतोऽसित्वं यमायलं

कुम्भीपाकादिनरकात्वं नेष्यामश्च माचिम्               (गरूड़ पुराण)

दुष्ट एवं पापी व्यक्ति को यमदूत पकड़ कर कुम्भीपाक आदि नरकों में कोड़े मारते हुये, घसीटते हुये लिये चलते हैं। वहाँ यमदूत उसे पाश में बाँध देते हैं। वह भूख-प्यास से अत्यधिक व्याकुल और विकल होकर दुःख सहन करते हुये रोता है। उस समय मष्त्यु काल में दिये दान अथवा स्वजनों द्वारा मष्त्यु के समय दिये पिण्डों को वह खाता है, तब भी उसकी तष्प्ति नहीं होती। पिण्ड दान देने पर भी वह भूख एवं प्यास से व्याकुल लगता है। माँस भक्षण करने वाले व्यक्ति को नरक में वे सभी जीव मिलते हैं, जिनका उसने माँस-भक्षण किया था, और वे वहाँ उसके माँस को नोचते रहते हैं तथा वह कई कल्पों तक प्रेत योनि में भटकता रहता है।

जब ऋषि के श्राप से प्रेरित तक्षक नाग राजा परीक्षित को डसने जा रहा था, तब मार्ग में महर्षि कश्यप से उनकी भेंट हुयी। तक्षक ने ब्राह्मण का वेश बनाया और पूछा, ‘‘महाराज, आप इतनी उतावली में कहाँ जा रहे हो।’’ तब ऋषि कश्यप ने कहा कि ‘‘तक्षक नाग राजा परीक्षित को डसने जा रहा है और मेरे पास ऐसी विद्या है कि मैं राजा परीक्षित को पुनः जीवन दान दे दूँगा।’’ तक्षक ने सुना तो अपना परिचय दिया, कहा ‘‘ऋषिवर, मैं ही तक्षक हूँ और मेरे विष का प्रभाव है कि कोई आज तक मेरे विष से बच नहीं सका।’’ तब ऋषि कश्यप ने कहा कि मैं अपनी मंत्र शक्ति से राजा परीक्षित को फिर से जीवित कर दूँगा। इस पर तक्षक ने कहा, ‘‘यदि ऐसी बात है तो आप इस वृक्ष को हरा-भरा करके दिखाइये, मैं इसे डस कर भष्म कर देता हूँ।’’ ज्यों तक्षक नाग ने हरे-भरे वृक्ष को डंस मारा, त्योंहि वह हरा-भरा वृक्ष विष के दुष्प्रभाव से जल कर राख हो गया। तब ऋषि कश्यप ने अपने कमण्डल से अपने हाथ में जल लेकर वृक्ष की राख मेें छींटा मारा तो वह वृक्ष अपने स्थान पर फिर से हरा-भरा होकर अपने स्थान पर खड़ा हो गया।

तक्षक को बड़ा आश्चर्य हुआ और पूछा, ऋषिवर आप वहाँ किस कारण से जा रहे हैं। इस पर ऋषि कश्यप ने बताया कि मैं राजा परीक्षित के प्राणों की रक्षा करूँगा तो मुझे बहुत-सा धन मिलेगा। तक्षक ने ऋषि कश्यप को संभावना से ज्यादा धन देकर विदा करना चाहा लेकिन ऋषि कश्यप ने यह उचित नहीं समझा और नहीं माने। वहाँ पर तक्षक ने ऋषि कश्यप को गरूड़ पुराण की कथा सुनायी, जिससे ऋषि कश्यप को ज्ञान हुआ कि जिसने जो कर्म किया वह अवश्य ही भोगना पड़ेगा और किसी के बचाने से कोई बच नहीं सकता। इस प्रकार से ऋषि कश्यप बहुत-सा धन लेकर वहीं से विदा हो गये।

वास्तव मे गरूड़ पुराण सुनने से मनुष्य को सच्चे ज्ञान एवं वैराग्य की प्राप्ति होती है और वह बुरे कर्म करने से बचता है तथा जीवन का यथार्थ ज्ञान उसे मिलता है। इस पुराण में महर्षि कश्यप और तक्षक नाग को लेकर एक कथा है।



* यजुर्वेद - Garuda Purana


'यजुष' शब्द का अर्थ है- 'यज्ञ'। यर्जुवेद मूलतः कर्मकाण्ड ग्रन्थ है। इसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है। यजुर्वेद में आर्यो की धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की झांकी मिलती है। इस ग्रन्थ से पता चलता है कि आर्य 'सप्त सैंधव' से आगे बढ़ गए थे और वे प्राकृतिक पूजा के प्रति उदासीन होने लगे थे। यर्जुवेद के मंत्रों का उच्चारण 'अध्वुर्य' नामक पुरोहित करता था। इस वेद में अनेक प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न करने की विधियों का उल्लेख है। यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है। गद्य को 'यजुष' कहा गया है। यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषयद है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक चिन्तन से है। उपनिषदों में यह लघु उपनिषद आदिम माना जाता है क्योंकि इसे छोड़कर कोई भी अन्य उपनिषद संहिता का भाग नहीं है। यजुर्वेद के दो मुख्य भाग है-

1.शुक्ल यजुर्वेद

2.कृष्ण यजुर्वेद

शुक्ल यजुर्वेद

विषय सूची

[छिपाएं]1 शुक्ल यजुर्वेद

2 कृष्ण यजुर्वेद

3 यजुर्वेद की अन्य विशेषताएँ

4 संबंधित लेख

इसमें केवल 'दर्शपौर्मासादि' अनुष्ठानों के लिए आवश्यक मंत्रों का संकलन है। इसकी मुख्य शाखायें है-

1.माध्यन्दिन

2.काण्व

इसकी संहिताओं को 'वाजसनेय' भी कहा गया है क्योंकि 'वाजसनि' के पुत्र याज्ञवल्क्य वाजसनेय इसके दृष्टा थे। इसमें कुल 40 अध्याय हैं।

कृष्ण यजुर्वेद

इसमें मंत्रों के साथ-साथ 'तन्त्रियोजक ब्राह्मणों' का भी सम्मिश्रण है। वास्तव में मंत्र तथा ब्राह्मण का एकत्र मिश्रण ही 'कृष्ण यजुः' के कृष्णत्त्व का कारण है तथा मंत्रों का विशुद्ध एवं अमिश्रित रूप ही 'शुक्त यजुष्' के शुक्लत्व का कारण है। इसकी मुख्य शाखायें हैं-

1.तैत्तिरीय,

2.मैत्रायणी,

3.कठ और

4.कपिष्ठल

तैत्तरीय संहिता (कृष्ण यजुर्वेद की शाखा) को 'आपस्तम्ब संहिता' भी कहते हैं।

महर्षि पंतजलि द्वारा उल्लिखित यजुर्वेद की 101 शाखाओं में इस समय केवल उपरोक्त पाँच वाजसनेय, तैत्तिरीय, कठ, कपिष्ठल और मैत्रायणी ही उपलब्ध हैं।

यजुर्वेद से उत्तरवैदिक युग की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती हैं।

इन दोनों शाखाओं में अंतर यह है कि शुक्ल यजुर्वेद पद्य (संहिताओं) को विवेचनात्मक सामग्री (ब्राह्मण) से अलग करता है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में दोनों ही उपस्थित हैं।

यजुर्वेद में वैदिक अनुष्ठान की प्रकृति पर विस्तृत चिंतन है और इसमें यज्ञ संपन्न कराने वाले प्राथमिक ब्राह्मण व आहुति देने के दौरान प्रयुक्त मंत्रों पर गीति पुस्तिका भी शामिल है। इस प्रकार यजुर्वेद यज्ञों के आधारभूत तत्त्वों से सर्वाधिक निकटता रखने वाला वेद है।

यजुर्वेद संहिताएँ संभवतः अंतिम रचित संहिताएँ थीं, जो ई. पू. दूसरी सहस्त्राब्दी के अंत से लेकर पहली सहस्त्राब्दी की आरंभिक शताब्दियों के बीच की हैं।

यजुर्वेद की अन्य विशेषताएँ

यजुर्वेद गद्यात्मक हैं।

यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को ‘यजुस’ कहा जाता है।

यजुर्वेद के पद्यात्मक मन्त्र ऋग्वेद या अथर्ववेद से लिये गये है।

इनमें स्वतन्त्र पद्यात्मक मन्त्र बहुत कम हैं।

यजुर्वेद में यज्ञों और हवनों के नियम और विधान हैं।

यह ग्रन्थ कर्मकाण्ड प्रधान है।

यदि ऋग्वेद की रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई थी तो यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र के प्रदेश में हुई थी।

इस ग्रन्थ से आर्यों के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है।

वर्ण-व्यवस्था तथा वर्णाश्रम की झाँकी भी इसमें है।

यजुर्वेद में यज्ञों और कर्मकाण्ड का प्रधान है।

निम्नलिखित उपनिषद् भी यजुर्वेद से सम्बद्ध हैं:-

श्वेताश्वतर

बृहदारण्यक

ईश

प्रश्न

मुण्डक

माण्डूक्य




* यजुर्वेद में औषधीय वनस्पति की प्रार्थना - Garuda Purana


प्राचीन वैदिक ग्रंथ यजुर्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी मंत्र दिये गये हैं । इनमें से दो, मंत्र संख्या 100 एवं 101, इस प्रकार हैं:

दीर्घायुस्त औषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम् । अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात् ।।

(शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय १२, मंत्र १०० )

(दीर्घायुः त औषधे खनिता यस्मै च त्वा खनामि अहम्, अथो त्वं दीर्घायुः भूत्वा शत-वल्शा विरोहतात् । खनिता, खनन करने वाला; शत-वल्शा, सौ अंकुरों वाला; विरोहतात्, ऊपर उठो, आरोहण पाओ)

हे ओषधि, हे वनस्पति, तुम्हारा खनन (खोदने का कार्य) करने वाला मैं दीर्घायु रहूं; जिस आतुर रोगी के लिए मैं खनन कर रहा हूं वह भी दीर्घायु होवे । तुम स्वयं दीर्घायु एवं सौ अंकुरों वाला होते हुए ऊपर उठो, वृद्धि प्राप्त करो ।

त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः । उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्मॉं२ऽभिदासति ।।

(शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय १२, मंत्र १०१)

(त्वम् उत्तम असि ओषधे, तव वृक्षा उपस्तयः, उपस्तिः अस्तु साः अस्माकं यो अस्मान् अभिदासति । उपस्तयः, उपकार हेतु स्थित (बहुवचन); उपस्तिः उपकार हेतु स्थित (एकवचन); अभिदासति, हानि पहुंचाता है)

हे औषधि, तुम उत्तम हो, उपकारी हो; तुम्हारे सन्निकट लता, गुल्म, झाड़ी, वृक्ष आदि (अन्य वनस्पतियां) तुम्हारा उपकार करने वाले होवें, अर्थात् तुम्हारी वृद्धि में सहायक होवें । हमारी यह भी प्रार्थना है कि जो हमारा अपकार करने का विचार करता हो, जो हमें हानि पहुंचा रहा हो, वह भी हमारी उपकारी बने, हमारे लाभ में सहायक होवे ।

इन मंत्रों के निहितार्थ से ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषिवृंद वनस्पतियों के औषधीय गुणों से परिचित थे और वे मन में प्रार्थना तथा कृतज्ञता का भाव लिए हुए ही वनस्पतियों को प्रयोग में लेते थे । वे उन औषधीय वनस्पतियों को संरक्षित रखने के प्रति सचेत थे । वे उन्हें समूल नष्ट नहीं करते थे, बल्कि दुबारा पनपने और निर्वाध रूप से वृद्धि पाने के लिए उसका आवश्यक अंश छोड़ देते थे । कदाचित् आज की तरह त्वरित लाभ में उन उपयोगी वनस्पतियों को उजाड़ने से बचते थे । वे ऋषिगण कदाचित् यह भी जानते थे कि वे वनस्पतियां एक-दूसरे का पोषण भी करती हैं । यह तो आज के वनस्पति विज्ञानी भी मानते हैं कि ‘मोनोकल्चर’ बहुधा दीर्घकाल में अलाभदायक सिद्ध होता है । (मोनोकल्चर यानी एक ही प्रजाति की वनस्पतियों को किसी भूखंड पर उगाना ।) कई वनस्पतियां एक दूसरे के सान्निध्य में ही ठीक-से पनप पाती हैं ।

इन औषधियों का सेवन मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माना जाता था । इसीलिए ऋषिजन प्रार्थना करते थे कि इनके प्रभाव से जो हमसे द्वेष रखता हो उसकी भी मति बदल जाये और वह भी हमारे प्रति हित की भावना रखने लगे । एक स्वस्थ तथा सभ्य समाज के निर्माण में परस्पर उपकार की भावना का होना आवश्यक है । इस कार्य में भी औषधीय वनस्पतियों की भूमिका है, यह वैदिक चिंतकों की मान्यता रही होगी । और उन औषधियों का संरक्षण वे अपना कर्तव्य मानते होंगे । इसी प्रकार के विचार इन मंत्रों में प्रतिबिंबित होते हैं ।



* यजुर्वेद में व्रत की परिभाषा - Garuda Purana


यजुर्वेद में व्रत की बहुत सुन्दर परिभाषा दी गई है-

अग्ने-व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तच्छकेयं तन्मे राध्यताम।

इदं अहं अनृतात् सत्यम् उपैमि।। यजु.

अर्थात्, हे अग्निस्वरूप व्रतपते सत्यव्रत पारायण साधक पुरूषों के पालन पोषक परमपिता परमेश्वर! मैं भी व्रत धारण करना चाहता हूँ। आपकी कृपा से मैं अपने उस व्रत का पालन कर सकूँ। मेरा यह व्रत सफल सिद्ध हो। मेरा व्रत है कि मैं मिथ्याचारों को छोड़ कर सत्य को प्राप्त करता हूँ।इस वेद मंत्र में परमपिता परमेश्वर को व्रतपते कहा गया अर्थात् सत्याचरण करने वाले सदाचारियों का पालक पोषक रक्षक कहा गया। सत्यस्वरूप ईश्वर सत्य के व्रत को धारण करने वाले साधकों व्रतियों का अर्थात् ईश्वर के सत्य स्वरूप को जान मान कर पालन करने वालों का पालक पोषक रक्षक है। अतः व्रत धारण करने वाला मनुष्य असत्य को छोड़कर सत्य को धारण करने का संकल्प ले इसी का नाम व्रत है। देव दयानन्द ने आर्य समाज के नियमों में ”असत्य को छोड़ने और सत्य के ग्रहण करने के लिए सदा उद्यत रहना चाहिए“ लिखकर मानव जीवन में सदा व्रत धारण करने की प्रेरणा दी। ”वेद सब सत्य विद्याआंे की पुस्तक है“ ऐसा कहकर देव दयानन्द ने वेदानुकूल जीवनयापन को व्रत धारण करने की श्रेणी में रखा है। इस प्रकार व्रत का यौगिक अर्थ है। असत्य को त्याग कर सत्य को ग्रहण करना और वेदानुकूल जीवन यापन करना। संस्ड्डत के एक कवि ने व्रत या उपवास की सुन्दर परिभाषा दी है।

उपाव्रतस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह।

उपवासः स विशेय न तु कायस्य शोषणम्।।

अर्थात् पाप असत्य में निवृत होकर अपने में सत्य गुणों का धारण करना इसको ही व्रत वा उपवास कहते हैं। शरीर को भूख से सुखाने का नाम उपवास नहीं है।ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्रों में प्रथम मंत्र:-

“विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद भद्रं तन्न आ सुव।।”

अर्थात् विश्वानि देव परमपिता परमेश्वर से मनुष्य अपने संपूर्ण दुर्गुण दुव्र्यसनों असत्य को दूर करते हुए मंगलमय गुण कर्म पदार्थ सत्य को प्राप्त करने की कामना करते हुए व्रतपति ईश्वर से अपने सत्य व्रत को धारण करने की सफलता की प्रार्थना कामना करता है।यजुर्वेद में आदेश है-:

व्रतं कृणुत- यजु. 4/11

अर्थात् व्रत धारण करो, व्रती बनो।

अब प्रश्न उठता है कि मनुष्य जीवन में असत्य को छोड़कर सत्य को ग्रहण करता हुआ किस प्रकार के व्रत धारण करे। मनुष्य जीवन में सभी संभव दुव्र्यसनों बीड़ी सिगरेट शराब मांस जुआ झूठ आदि को त्यागकर सदाचारी बनने का व्रत ले। देश सेवा, परोपकार, ब्रह्मचर्य, कर्तव्य पालन, विद्याभ्यास, वेदाध्ययन, सन्धया, स्वाध्याय आदि का व्रत लें। इस प्रकार यदि मनुष्य जीवन में दो चार व्रतों को भी धारण कर ले तो निश्चित रूप से उसका जीवन सफल हो जायेगा।



* यजुर्वेद - Garuda Purana


जो नर यज्ञ - हवन  करते हैं  इह - पर  में वे  सुख  पाते हैं

पर  उपकार  में  रत  रहते हैं  श्रेष्ठ  कर्म  से  यश   पाते  हैं ।

धर्म  मार्ग  ईश्वर  ने दिखाया  सत्य न्याय से युक्त  वही है

वह ही शुभचिंतक है सबका पुरुषार्थ मात्र का श्रोत वही है ।

जैसा  कर्म  जीव  करता  है   वैसा  ही  प्रतिफल  पाता  है

दुष्ट कर्म का प्रतिफल दुख है मनुज  इसी से दुख पाता है ।

ईश्वर का आदेश  यही  है  दुष्ट  बुध्दि  का त्याग  हम करें

प्रेरित हो कर  फिर  सत्पथ पर  हर  मानव  का दुख हरें ।

वेद -  ज्ञान के  द्वारा मानव  श्रेष्ठ  मार्ग  का  बने  सृजेता

सत्कर्मों  के माध्यम  से वह शत्रु  जीत कर बने विजेता ।

सृष्टि ब्रह्म की अद्भुत अनुपम सूर्य जगत को करे प्रकाशित

वसुधा  होती  पुष्ट  वायु  से  यह  धरती  हमसे  हो रक्षित ।

नर पाए आरोग्य यज्ञ से व्याधि  नाश हो यश - विस्तार

पूर्ण आयु ले जिए धरा पर सुख - समृध्दि सतत हो सार ।

दुष्ट- बुध्दि  नर  पीडा  पाते  निम्न  योनियों  में जाते  हैं

सत्य धर्म के पथिक संत ही कष्ट - क्लेश से बच पाते हैं ।

मात- पिता षड् - ऋतु सम  होते  देते  हैं  उत्तम  उपदेश

उन्हें नित्य संतुष्ट  रखें  हम  पायें  सदा  सुखद  सन्देश ।

बाल्य- काल में मात- पिता ज्यों संतति को देते आकार

उन्हें सदा ही हम कृतज्ञ बन गरिमा- मय देवें  व्यवहार ।

पर- हित चिन्तन होता जिसका विद्यावान वही  होता है

नभ शुचि होता यज्ञ धूम से आरोग्य तभी पावस देता है ।

राजपुरुष का यज्ञ न्याय है जन- हित हो राजा का ध्येय

धर्म अर्थ और काम  मोक्ष हो हर मानव का चिंतन श्रेय ।

ईश्वर का आदेश  यही है सिंहासन  उत्तम जन को  सौंपो

सुख से भर दो वसुन्धरा को क्षुद्र-पुरुष को कभी न सौंपो ।

आज्ञा यह भी  है ईश्वर  की उत्तम  हो  व्यक्तित्व  तुम्हारा

जड्ता कभी न हो तन- मन में जग पूरा  परिवार हमारा ।

विद्याओं  में जो  पारंगत  हो  राजतंत्र  का  हो  अधिकारी

सतजन की  रक्षा  करता  हो  दुर्जन  हेतु  विपद हो भारी ।

ब्रह्मचर्य  है  पहला  आश्रम  उत्तम  विद्या  ग्रहण  करे  नर

द्वितीय गृहस्थाश्रम में सञ्चय तृतीय आश्रम धर्मम् चर ।

चतुर्थ आश्रम संन्यासी  का  बन संन्यासी  धर्म  धरे नर

वेद - गिरा का  करे  प्रकाश  तम मेटे आलोक  प्रभा  धर ।

सुख वैभव यदि नर चाहे तो निज स्वभाव  स्तर अनुरुप

निज इच्छा से विवाह कर ले  मोद मनाये निजस्वरुप ।

ज्यों पश्चिम जा कर विद्वद्जन करें वस्तुओं का सन्धान

नर - नारी  उत्तम सन्तति से  श्रेष्ठ  गुणों के बनें निधान ।

दो  ही तीर्थ  धरा  पर  पावन गुरु  सेवा  विद्या  अद्वितीय

उदधि - पार  आने  जाने में हों समर्थ जो तीर्थ - द्वितीय ।

सत्य न्याय चहुँ हो आलोकित न्यायासन पर सज्जन हों

दुष्टों  को  जो दण्ड  दे सकें  सिंहासन  पर  पावन  नर हों ।

सेना - नायक  वही  बने  जो  धर्म  मार्ग का अनुयायी हो

दया-रहित हो दुष्टों के प्रति सज्जन का वह अनुगामी हो ।

जैसे  सेनापति  सेना  को  सूर्य   मेघ  को  वर्धित  करता

वैसे  ही  गुरु सदाचरण  से  प्राणिमात्र  की  सेवा  करता ।

सभी  लोक  ज्यों  सूर्य  लोक  से  उत्तम  आश्रय  पाते   हैं

श्रेष्ठ  पुरुष वैसा ही आश्रय  निज आश्रित को  दे  जाते हैं ।

मात पिता निज संतति  की ज्यों रक्षा  करते प्रेरित करते

अध्यापक  भी  निज  शिष्यों को विद्या से संवर्धित करते ।

औषधियों  से होम  जो करता  जग को  सुरभित करता है

सर्वाधिक शुभचिंतक है जग का महादान वह ही करता है ।

गो- धन  की  जो  सेवा  करता अति परोपकारी है वह नर

जो  भी  भावुक  पशुपालक  है वास करे सुख वैभव के घर ।

व्यथित कभी भी आत्मा न हो नितप्रति इसका ध्यान रखें

वज्रपात न  करें किसी पर बन  कर कृतज्ञ निज को परखें ।

वेद - वाङमय  जो  कहते  हैं  हम  करें  उसी  का  अनुष्ठान

संतति को  मॉं सँस्कारित करती  वैसे ही सबको देवें ज्ञान ।

पथ- औषधि का सेवन करके करें प्रकाशित  निज जीवन

विद्वद् जन की सेवा  करके सेवा भावी बन जाए तन - मन ।

बढ  जाता   है  मान   मान  से  सदा   दूसरों  को  दें   मान

मान - महत्ता  के ज्ञाता  को  शीर्ष  सदृश  अति उत्तम मान ।

आत्मा  तन  से  जब  जाती  है  वही  भाव  नित मन में हो

शव  के  जल  जाने  पर  कोई  संस्कार  कभी  न उसका हो ।

परमेश्वर  है  एक  सदा  से  उपासना हो  उसी  की प्रतिदिन

कर्म नहीं निष्फल होता है रहें धर्म में रत छिन- पल- छिन ।

ऋग्वेद  सदृश  हो  उत्तम वाणी यजुर्वेद सम उज्ज्वल  मन

हो सामवेद सम प्राञ्जल  प्राण अथर्ववेद  सम हो यह तन ।


* यजुर्वेद उन्नति - 

देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठमाय कर्मण।

सबको उत्पन्न करने वाला देव, तुम सबको श्रेष्ठतम कर्म को प्रेरित करे।

यहां यह प्रेरणा मिलती है कि सबको मिलजुल कर श्रेष्ठतम कर्मों को करना चाहिए, तभी उन्नति संभव है। प्रत्येक मनुष्य की यह महत्वांकांक्षा होनी चाहिए कि वह ऐसे कार्य करें जो उन्नतिकारक एवं प्रशंसनीय हों। ऐसे कर्म नहीं करने चाहिएं जो अवनति की ओर प्रवृत करें। यहां श्रेष्ठतम कर्म करने का आदेश हैं। ऐसे सर्वोतम कर्मो के प्रतिफल में सर्व प्रकार से उन्नति होती है.

मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिह्वार्षइत।

तू कुटिल न बन व न तेरा यज्ञपति भी कुटिल होवे।

सुकर्म करने के लिए अकुटिल अर्थात सरल होना चाहिए.

साविश्वायु: सा विश्वाकर्मा सा विश्वाधायाः।

सर्व आयु, सर्व कर्म शकित व सर्व धारक शकित के रूप में ये तीन कामधेनुएं हैं।

प्रत्येक मनुष्य के पास तीन प्रकार की कामधेनुएं है- सर्व आयु, सर्व कर्मा व सर्व धाया। पुराणों में एक प्रकार की गाय की चर्चा आती है जो सब मनोरथों को पूर्ण करती है, यह स्वर्ग की गाय है जिसे कामधेनु कहते है। मनुष्य संपूर्ण आयु जो वह भोगता है अर्थात आयुरूपी धेनु को दुहता है, इसी प्रकार जीवन भर कर्म करता है अर्थात सर्वकर्मा नामक गाय को दुहता है और परिणाम स्वरूप पुरुषार्थी कहलाता है। इसी प्रकार जीवन भर धारक शकित के रूप में सर्वधाया नामक गाय को दुहता रहता है, मानो अपनी धारक शकित को बढा रहा हो। अतः स्पष्ट है- जीवन भर पुर्ण लगन से प्रयत्न करोगे तभी परम लक्ष्य प्राप्त कर सकोगे अर्थात तीनों प्रकार की कामधेनुओं को भली-भांति दुह सकोगे।

* यजुर्वेद के आधार पर संदेश - Garuda Purana


इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है

यजुर्वेद में कहा गया है कि

सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।

विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।

हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।

हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।

हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।

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