. . . Best Hindi Moral Stories For Class 8 | हिन्दी मे नैतिक कहानिया

Best Hindi Moral Stories For Class 8 | हिन्दी मे नैतिक कहानिया

Best Hindi Moral Stories For Class 8

Today I am sharing this blog of  Best Hindi Moral Stories For Class 8  with all of you, which is quite valuable for every child. These moral stories will help a lot in understanding the society of children, so that they can become a good person. If you like this story, then do share it with other people.


आज मै आप सभी से नैतिक कहानियों का  यह  ब्लॉग साझा कर रहा हु जो काफी मुल्यवान है, |यह नैतिक कहानिए बच्चों के समाज को समझने मे काफी मदद करेगा ,जिससे वह एक अच्छा इंसान बन सके |अगर आपको यह कहानिया अच्छी लगे तो अन्य लोगों से जरूर साझा करे |


1. मुट्ठी भर लोग - Hindi Moral Stories For Class 8



हर साल गर्मी की छुट्टियों में नितिन अपने दोस्तों के साथ किसी पहाड़ी इलाके में माउंटेनियरिंग के लिए जाता था. इस साल भी वे इसी मकसद से ऋषिकेश पहुंचे.

गाइड उन्हें एक फेमस माउंटेनियरिंग स्पॉट पर ले गया. नितिन और उसके दोस्तों ने सोचा नहीं था कि यहाँ इतनी भीड़ होगी. हर तरफ लोग ही लोग नज़र आ रहे थे.

एक दोस्त बोला, ” यार यहाँ तो शहर जैसी भीड़ है…यहाँ चढ़ाई करने में क्या मजा??”

“क्या कर सकते हैं… अब आ ही गए हैं तो अफ़सोस करने से क्या फायदा…चलो इसी का मजा उठाते हैं…”, नितिन ने जवाब दिया.

सभी दोस्त पर्वतारोहण करने लगे और कुछ ही समय में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए.

वहां पर पहले से ही लोगों का तांता लगा हुआ था. दोस्तों ने सोचा चलो अब इसी भीड़ में दो-चार घंटे कैम्पिंग करते हैं और फिर वापस चलते हैं. तभी नितिन ने सामने की एक चोटी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “रुको-रुको… ज़रा उस चोटी की तरफ भी तो देखो… वहां तो बस मुट्ठी भर लोग ही दिख रहे हैं… कितना मजा आ रहा होगा… क्यों न हम वहां चलें.”

“वहां!”, एक दोस्त बोला, “अरे वहां जाना सबके बस की बात नहीं है… उस पहाड़ी के बारे में मैंने सुना है, वहां का रास्ता बड़ा मुश्किल है और कुछ लकी लोग ही वहां तक पहुँच पाते हैं.”

बगल में खड़े कुछ लोगों ने भी नितिन का मजाक उड़ाते हुए कहा,” भाई अगर वहां जाना इतना ही आसान होता तो हम सब यहाँ झक नहीं मार रहे होते!”

लेकिन नितिन ने किसी की बात नहीं सुनी और अकेला ही चोटी की तरफ बढ़ चला. और तीन घंटे बाद वह उस पहाड़ी के शिखर पर था.

वहां पहुँचने पर पहले से मौजूद लोगों ने उसका स्वागत किया और उसे एंकरेज किया.

नितिन भी वहां पहुँच कर बहुत खुश था अब वह शांति से प्रकृति की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकता था.

जाते-जाते नितिन ने बाकी लोगों से पूछा,”एक बात बताइये… यहाँ पहुंचना इतना मुश्किल तो नहीं था, मेरे ख़याल से तो जो उस भीड़-भाड़ वाली चोटी तक पहुँच सकता है वह अगर थोड़ी सी और मेहनत करे तो इस चोटी को भी छू सकता है…फिर ऐसा क्यों है कि वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ है और यहाँ बस मुट्ठी भर लोग?”

वहां मौजूद एक वेटरन माउंटेनियर बोला, “क्योंकि ज्यादातर लोग बस उसी में खुश हो जाते हैं जो उन्हें आसानी से मिल जाता…वे सोचते ही नहीं कि उनके अन्दर इससे कहीं ज्यादा पाने का पोटेंशियल है… और जो थोड़ा पाकर खुश नहीं भी होते वे कुछ अधिक पाने के लिए रिस्क नहीं उठाना चाहते… वे डरते हैं कि कहीं ज्यादा के चक्कर में जो हाथ में है वो भी ना चला जाए… जबकि हकीकत ये है कि अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है! पर साहस ना दिखा पाने के कारण अधिकतर लोग पूरी लाइफ बस भीड़ का हिस्सा ही बन कर रह जाते हैं… और साहस दिखाने वाली उन मुट्ठी भर लोगों को लकी बता कर खुद को तसल्ली देते रहते हैं.”

Friends, अगर आप आज तक वो अगला साहसी कदम उठाने से खुद को रोके हुए हैं तो ऐसा मत करिए क्योंकि-

अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है!

खुद को उस effort को करने से रोकिये मत … थोडा सा साहस… थोड़ी सी हिम्मत आपको भीड़ से निकाल कर उन मुट्ठी भर लोगों में शामिल कर सकती है जिन्हें दुनिया lucky कहती है। 



2. चलते रहने की ज़िद - Hindi Moral Stories For Class 8



अजय पिछले चार-पांच सालों से अपने शहर में होने वाली मैराथन में हिस्सा लेता था…लेकिन कभी भी उसने रेस पूरी नहीं की थी.

पर इस बार वह बहुत एक्साइटेड था. क्योंकि पिछले कई महीनों से वह रोज सुबह उठकर दौड़ने की प्रैक्टिस कर रहा था और उसे पूरा भरोसा था कि वह इस साल की मैराथन रेस ज़रूर पूरी कर लेगा.

देखते-देखते मैराथन का दिन भी आ गया और धायं की आवाज़ के साथ रेस शुरू हुई. बाकी धावकों की तरह अजय ने भी दौड़ना शुरू किया.

वह जोश से भरा हुआ था, और बड़े अच्छे ढंग से दौड़ रहा था. लेकिन आधी रेस पूरी करने के बाद अजय बिलकुल थक गया और उसके जी में आया कि बस अब वहीं बैठ जाए…

वह ऐसा सोच ही रहा था कि तभी उसने खुद को ललकारा…

रुको मत अजय! आगे बढ़ते रहो…अगर तुम दौड़ नहीं सकते, तो कम से कम जॉग करते हुए तो आगे बढ़ सकते हो…आगे बढ़ो…

और अजय पहले की अपेक्षा धीमी गति से आगे बढ़ने लगा.

कुछ किलो मीटर इसी तरह दौड़ने के बाद अजय को लगा कि उसके पैर अब और आगे नहीं बढ़ सकते…वह लड़खड़ाने लगा. अजय के अन्दर विचार आया….अब बस…और नहीं बढ़ सकता!

लेकिन एक बार फिर अजय ने खुद को समझाया…

रुको मत अजय …अगर तुम जॉग नहीं कर सकते तो क्या… कम से कम तुम चल तो सकते हो….चलते रहो.

अजय अब जॉग करने की बजाय धीरे-धीरे लक्ष्य की ओर बढ़ने लगा.

बहुत से धावक अजय से आगे निकल चुके थे और जो पीछे थे वे भी अब आसानी से उसे पार कर रहे थे…अजय उन्हें आगे जाने देने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था. चलते-चलते अजय को फिनिशिंग पॉइंट दिखने लगा…लेकिन तभी वह अचानक से लड़खड़ा कर गिर पड़ा… उसके बाएँ पैर की नसें खिंच गयी थीं.

“अब कुछ भी हो जाए मैं आगे नहीं बढ़ सकता…”, जमीन पर पड़े-पड़े अजय के मन में ख़याल आया.

लेकिन अगले पल ही वो जोर से चीखा….

नहीं! आज चाहे जो हो जाए मैं ये रेस पूरी करके रहूँगा…ये मेरी ज़िद है…माना मैं चल नहीं सकता लेकिन लड़खड़ाते-लड़खड़ाते ही सही इस रेस को पूरा ज़रूर करूँगा….

अजय ने साहस दिखाया और एक बार फिर असहनीय पीड़ा सहते हुए आगे बढ़ने लगा….और इस बार वह तब तक बढ़ता रहा….तब तक बढ़ता रहा…जब तक उसने फिनिशिंग लाइन पार नहीं कर ली!

और लाइन पार करते ही वह जमीन पर लेट गया…उसके आँखों से आंसू बह रह थे.

अजय ने रेस पूरी कर ली थी…उसके चेहरे पर इतनी ख़ुशी और मन में इतनी संतुष्टि कभी नहीं आई थी…आज अजय ने अपने चलते रहने की ज़िदके कारण न सिर्फ एक रेस पूरी की थी बल्कि ज़िन्दगी की बाकी रेसों के लिए भी खुद को तैयार कर लिया था.

दोस्तों, चलते रहने की ज़िद हमें किसी भी मंजिल तक पहुंचा सकती है. बाधाओं के आने पर हार मत मानिए…

ना चाहते हुए भी कई बार conditions ऐसी हो जाती हैं कि आप बहुत कुछ नहीं कर सकते! पर ऐसी कंडीशन को “कुछ भी ना करने” का excuse मत बनाइए.

घर में मेहमान हैं आप 8 घंटे नहीं पढ़ सकते….कोई बात नहीं 2 घंटे तो पढ़िए…

बारिश हो रही है…आप 10 कस्टमर्स से नहीं मिल सकते…कम से कम 2-3 से तो मिलिए…

एकदम से रुकिए नहीं… थोड़ा-थोड़ा ही सही आगे तो बढ़िये.

और जब आप ऐसा करेंगे तो अजय की तरह आप भी अपने ज़िन्दगी की रेस ज़रूर पूरी कर पायेंगे और अपने अन्दर उस ख़ुशी उस संतुष्टि को महसूस कर पायेंगे जो सिर्फ चलते रहने की ज़िद से आती है! 




3. बादल और राजा – दो घोड़ों की कहानी - Hindi Moral Stories For Class 8



बादल अरबी नस्ल का एक शानदार घोड़ा था। वह अभी 1 साल का ही था और रोज अपने पिता – “राजा” के साथ ट्रैक पर जाता था। राजा

घोड़ों की बाधा दौड़ का चैंपियन था और कई सालों से वह अपने मालिक को सर्वश्रेष्ठ घुड़सवार का खिताब दिला रहा था।

बादल भी राजा की तरह बनना चाहता था…लेकिन इतनी ऊँची-ऊँची और कठिन बाधाओं को देखकर उसका मन छोटा हो जाता और वह सोचने लगता कि वह कभी अपने पिता की तरह नहीं बन पायेगा।

एक दिन जब राजा ने बादल को ट्रैक के किनारे उदास खड़े देखा तो बोला, ” क्या हुआ बेटा तुम इस तरह उदास क्यों खड़े हो?”

“कुछ नहीं पिताजी…आज मैंने आपकी तरह उस पहली बाधा को कूदने का प्रयास किया लेकिन मैं मुंह के बल गिर पड़ा…मैं कभी आपकी तरह काबिल नहीं बन पाऊंगा…

राजा बादल की बात समझ गया। अगले दिन सुबह-सुबह वह बादल को लेकर ट्रैक पर आया और एक लकड़ी के लट्ठ की तरफ इशारा करते हुए बोला- ” चलो बादल, ज़रा उसे लट्ठ के ऊपर से कूद कर तो दिखाओ।”

बादला हंसते हुए बोला, “क्या पिताजी, वो तो ज़मीन पे पड़ा है…उसे कूदने में क्या रखा है…मैं तो उन बाधाओं को कूदना चाहता हूँ जिन्हें आप कूदते हैं।”

“मैं जैसा कहता हूँ करो।”, राजा ने लगभग डपटते हुए कहा।

अगले ही क्षण बादल लकड़ी के लट्ठ की और दौड़ा और उसे कूद कर पार कर गया

शाबाश! ऐसे ही बार-बार कूद कर दिखाओ!”, राजा उसका उत्साह बढाता रहा।

अगले दिन बादल उत्साहित था कि शायद आज उसे बड़ी बाधाओं को कूदने का मौका मिले पर राजा ने फिर उसी लट्ठ को कूदने का निर्देश दिया।

करीब 1 हफ्ते ऐसे ही चलता रहा फिर उसके बाद राजा ने बादल से थोड़े और बड़े लट्ठ कूदने की प्रैक्टिस कराई।

इस तरह हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा कर के बादल के कूदने की क्षमता बढती गयी और एक दिन वो भी आ गया जब राजा उसे ट्रैक पर ले गया।

महीनो बाद आज एक बार फिर बादल उसी बाधा के सामने खड़ा था जिस पर पिछली बार वह मुंह के बल गिर पड़ा था… बादल ने दौड़ना शुरू किया… उसके टापों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी… 1…2…3….जम्प….और बादल बाधा के उस पार था।

आज बादल की ख़ुशी का ठिकाना न था…आज उसे अन्दर से विश्वास हो गया कि एक दिन वो भी अपने पिता की तरह चैंपियन घोड़ा बन सकता है और इस विश्वास के बलबूते आगे चल कर बादल भी एक चैंपियन घोड़ा बना।

दोस्तों, बहुत से लोग सिर्फ इसलिए goals achieve नहीं कर पाते क्योंकि वो एक बड़े challenge या obstacle को छोटे-छोटे challenges में divide नहीं कर पाते। इसलिए अगर आप भी अपनी life में एक champion बनना चाहते हैं…एक बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो systematically उसे पाने के लिए आगे बढिए… पहले छोटी-छोटी बाधाओं को पार करिए और ultimately उस बड़े goal को achieve कर अपना जीवन सफल बनाइये।

Moral of the story is: जल्दी हार मत मानिए, बल्कि छोटे से शुरू करिए और प्रयास जारी रखिये…इस तरह आप उस लक्ष्य को भी प्राप्त कर पायेंगे जो आज असंभव लगता है



4. सबसे बड़ी समस्या - Hindi Moral Stories For Class 8


हुत समय पहले की बात है एक महा ज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे . लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे . लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी की

लोग दुर्गम पहाड़ियों , सकरे रास्तों , नदी-झरनो को पार कर के भी उससे मिलना चाहते थे , उनका मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकता है

इस बार भी कुछ लोग ढूंढते हुए उसकी कुटिया तक आ पहुंचे . पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा .

तीन दिन बीत गए , अब और भी कई लोग वहां पहुँच गए , जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले ,” आज मैं आप सभी के प्रश्नो का उत्तर दूंगा , पर आपको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के बारे में नहीं बताएँगे , ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ …..चलिए अपनी -अपनी समस्याएं बताइये “

यह सुनते ही किसी ने अपनी परेशानी बतानी शुरू की , लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी . सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा ; इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे . कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली -बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा ,” कृपया शांत हो जाइये ! अपनी -अपनी समस्या एक पर्चे पे लिखकर मुझे दीजिये . “

सभी ने अपनी -अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी . पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले , ” इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये , हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा . उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है ?”

हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता , उसे पढता और सहम सा जाता . एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ; सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है . दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे , वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे .

Friends, ऐसा कौन होगा जिसकी life में एक भी problem न हो ? हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं , कोई अपनी health से परेशान है तो कोई lack of wealth से …हमें इस बात को accept करना चाहिए कि life है तो छोटी -बड़ी समस्याएं आती ही रहेंगी , ऐसे में दुखी हो कर उसी के बारे में सोचने से अच्छा है कि हम अपना ध्यान उसके निवारण में लगाएं … और अगर उसका कोई solution ही न हो तो अन्य productive चीजों पर focus करें … हमें लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर यकीन जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी -बड़ी problems हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं … इसलिए ईश्वर ने जो भी दिया है उसके लिए thankful रहिये और एक खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करिये 



5. मुसीबत का सामना - Hindi Moral Stories For Class 8


जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था , तभी एक बछड़े (पाड़ा) ने पुछा , ” पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है ?”

” बस शेरों से सावधान रहना …”, भैंसा बोला

“हाँ , मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं . अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा ..”, बछड़ा बोला .

“नहीं , इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते ..”, भैंसा बोला

बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी , वह बोला ” क्यों ? वे खतरनाक होते हैं , मुझे मार सकते हैं तो भला मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं ?”

भैंसा समझाने लगा , ” अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे , भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं … और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो …”

” तो.. तो। .. ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ?”, बछड़े ने घबराहट में पुछा .

” अगर तुम कभी भी शेर को देखो , तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो . अगर वो ना जाएं तो उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ और खुरों को जमीन पर पटको . अगर तब भी शेर ना जाएं तो धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़ो ; और अंत में तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उसपर हमला कर दो .”, भैंसे ने गंभीरता से समझाया .

” ये तो पागलपन है , ऐसा करने में तो बहुत खतरा है … अगर शेर ने पलट कर मुझपर हमला कर दिया तो ??”, बछड़ा नाराज होते हुए बोला .

“बेटे , अपने चारों तरफ देखो ; क्या दिखाई देता है ?”, भैंसे ने कहा .

बछड़ा घूम -घूम कर देखने लगा , उसके चारों तरफ ताकतवर भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था .

” अगर कभी भी तुम्हे डर लगे , तो ये याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं . अगर तुम मुसीबत का सामना करने की बजाये , भाग खड़े होते हो , तो हम तुम्हे नहीं बचा पाएंगे ; लेकिन अगर तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे .”

बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को इस सीख के लिए धन्यवाद दिया .

हम सभी की ज़िन्दगी में शेर हैं … कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे हम डरते हैं , जो हमें भागने पर … हार मानने पर मजबूर करना चाहती हैं , लेकिन अगर हम भागते हैं तो वे हमारा पीछा करती हैं और हमारा जीना मुश्किल कर देती हैं . इसलिए उन मुसीबतों का सामना करिये … उन्हें दिखाइए कि आप उनसे डरते नहीं हैं … दिखाइए की आप सचमुच कितने ताकतवर हैं …. और पूरे साहस और हिम्मत के साथ उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये … और जब आप ऐसा करेंगे तो आप पाएंगे कि आपके परिवार और दोस्त पूरी ताकत से आपके पीछे खड़े हैं .




6. आखिरी पड़ाव - Hindi Moral Stories For Class 8


सुंदरबन इलाके में रहने वाले ग्रामीणों पर हर समय जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था . खासतौर पर जो युवक घने जंगलों में लकड़ियाँ चुनने जाते थे उनपर कभी भी बाघ हमला कर सकते थे . यही वजह थी की वे सब पेड़ों पर तेजी से चढ़ने-उतरने का प्रशिक्षण लिया करते थे .प्रशिक्षण, गाँव के ही एक बुजुर्ग दिया करते थे ; जो अपने समय में इस कला के महारथी माने जाते थे . आदरपूर्वक सब उन्हें बाबा-बाबा कह कर पुकारा करते थे .

बाबा कुछ महीनो से युवाओं के एक समूह को पेड़ों पर तेजी से चढ़ने-उतरने की बारीकियां सिखा रहे थे और आज उनके प्रशिक्षण का आखिरी दिन था 

बाबा बोले , ” आज आपके प्रशिक्षण का आखिरी दिन है , मैं चाहता हूँ , आप सब एक -एक बार इस चिकने और लम्बे पेड़ पर तेजी से चढ़ – उतर कर दिखाएँ .”

सभी युवक अपना कौशल दिखाने के लिए तैयार हो गए .

पहले युवक ने तेजी से पेड़ पर चढ़ना शुरू किया और देखते -देखते पेड़ की सबसे ऊँची शाखा पर पहुँच गया . फिर उसने उतरना शुरू किया , और जब वो लगभग आधा उतर आया तो बाबा बोले , “सावधान , ज़रा संभल कर। … आराम से उतरो …क़ोइ जल्दबाजी नहीं….”

युवक सावधानी पूर्वक नीचे उतर आया 

इसी तरह बाकी के युवक भी पेड़ पर चढ़े और उतरे , और हर बार बाबा ने आधा उतर आने के बाद ही उन्हें सावधान रहने को कहा .

यह बात युवकों को कुछ अजीब लगी , और उन्ही में से एक ने पुछा , ” बाबा , हमें आपकी एक बात समझ में नहीं आई , पेड़ का सबसे कठिन हिस्सा तो एकदम ऊपर वाला था , जहाँ पे चढ़ना और उतरना दोनों ही बहुत कठिन था , आपने तब हमें सावधान होने के लिए नहीं कहा , पर जब हम पेड़ का आधा हिस्सा उतर आये और बाकी हिस्सा उतरना बिलकुल आसान था तभी आपने हमें सावधान होने के निर्देश क्यों दिए ? “

बाबा गंभीर होते हुए बोले , ““ बेटे ! यह तो हम सब जानते हैं कि ऊपर का हिस्सा सबसे कठिन होता है , इसलिए वहां पर हम सब खुद ही सतर्क हो जाते हैं और पूरी सावधानी बरतते हैं. लेकिन जब हम अपने लक्ष्य के समीप पहुँचने लगते हैं तो वह हमें बहुत ही सरल लगने लगता है…. हम जोश में होते हैं और अति आत्मविश्वास से भर जाते हैं और इसी समय सबसे अधिक गलती होने की सम्भावना होती है . यही कारण है कि मैंने तुम लोगों को आधा पेड़ उतर आने के बाद सावधान किया ताकि तुम अपनी मंजिल के निकट आकर कोई गलती न कर बैठो ! “

युवक बाबा की बात समझ गए, आज उन्हें एक बहुत बड़ी सीख मिल चुकी थी .

मित्रों, सफल होने के लिए लक्ष्य निर्धारित करना बहुत ही जरूरी है, और ये भी बहुत ज़रूरी है कि जब हम अपने लक्ष्य को हासिल करने के करीब पहुँच जाएँ, मंजिल को सामने पायें तो कोई जल्दबाजी न करें और पूरे धैर्य के साथ अपना कदम आगे बढ़ाएं. बहुत से लोग लक्ष्य के निकट पहुंच कर अपना धैर्य खो देते हैं और गलतियां कर बैठते हैं जिस कारण वे अपने लक्ष्य से चूक जाते हैं. इसलिए लक्ष्य के आखिरी पड़ाव पर पहुँच कर भी किसी तरह की असावधानी मत बरतिए और लक्ष्य प्राप्त कर के ही दम लीजिये .


7. राजा की परीक्षा - Hindi Moral Stories For Class 8


आज संत कबीर दास की जयंती है। शुभकामनाएं।

इस शुभ अवसर पर हम आपके साथ उनके जीवन का एक प्रेरक प्रसंग आपके साथ साझा कर रहे हैं।

राजा की परीक्षा 

सादा-जीवन और उच्च विचार रखने वाले कबीर दास की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी और बनारस के राजा बीर सिंह भी कबीर दास जी के भक्तों में से एक थे। जब कभी कबीरदास राजा से मिलने जाते तो राजा स्वयं कबीर दास जी के चरणों में बैठ जाते और उन्हें राज-गद्दी पर बैठा देते।एक दिन कबीर दास ने सोचा की बीर सिंह की परीक्षा ली जाए कि क्या वो सचमुच इतने बड़े भक्त हैं जितना कि उनके व्यवहार से नज़र आता है या यह दिखावा मात्र है।

अगले ही दिन वे बनारस के बाज़ारों में एक मोची और एक महिला भक्त , जो कि पहले वेश्या थी के साथ राम नाम जपते निकल पड़े। और साथ ही उन्होंने अपने हाथ में दो बोतलें पकड़ लीं जिसमे रंगीन पानी था पर देखने से शराब प्रतीत होता था।

कबीर दास के ऐसा करने से उनके शत्रुओं को उनपर ऊँगली उठाने का मौका मिल गया , शहर भर में उनका विरोध होने लगा और उनके शारब की बोतलें हाथ में लिए एक मोची और वेश्या के साथ इस तरह शहर में घूमने की खबर राजा तक भी पहुंची।

कुछ समय बाद कबीर दास जी योजना अनुसार राज-दरबार पहुंचे ; उनके इस व्यवहार से राजा पहले से ही मन ही मन क्षुब्ध थे। और इस बार उन्हें देखकर वे अपनी गद्दी से नहीं उठे।

कबीर तुरंत समझ गए कि राजा भी आम लोगों की तरह ही हैं ; उन्होंने तुरंत ही दोनों बोतलें जमीन पर पटक दीं।

उन्हें ऐसा करते देख राजा ने सोचा , ” एक शराबी कभी भी इस तरह से शराब की बोतल नहीं फेंक सकता , ज़रूर बोतलों में कुछ और है ??”

राजा तुरंत उठा और कबीर दास जी के साथ आये मोची को किनारे कर उससे पुछा , ” ये सब क्या है ?”

मोची बोला, ” अरे महाराज , आपको नहीं पता , जगन्नाथ मंदिर में आग लगी हुई है और संत कबीर दास इन बोतलों में भरे पानी से वो आग बुझा रहे हैं….”

राजा ने इस घटना का दिन और समय नोट कर लिया और बाद में इस बात की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक दूत जगन्नाथ मंदिर भेजा।

मंदिर के आस-पास रहने वाले लोगों ने इस बात की पुष्टि कि उसी दिन और समय में मंदिर में आग लगी थी , जिसे बुझा दिया गया था। जब राजा को इस सच्चाई का पता चला तो उन्हें अपने व्यवहार पर पछतावा हुआ और संत कबीर दास में उनका विश्वास और भी दृढ हो गया। 


8. सबसे बड़ा पुण्य - Hindi Moral Stories For Class 8


क राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- “ महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.”

राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया.

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.”

उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए.

कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी.

राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !”

राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है ? ”

देव महाराज ने बहीखाता खोला , और ये क्या , पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ ?

देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है. परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं.

देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”

अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे .


9. मैं ऐसा क्यों हूँ ? - Hindi Moral Stories For Class 8


पट्टू तोता बड़ा उदास बैठा था .

माँ ने पुछा , ” क्या हुआ बेटा तुम इतने उदास क्यों हो ?”

” मैं अपनी इस अटपटी चोंच से नफरत करता हूँ !!”, पट्टू लगभग रोते हुए बोला .

“तुम अपनी चोंच से नफरत क्यों करते हो ?? इतनी सुन्दर तो है !”, माँ ने समझाने की कोशिश की .

“नहीं , बाकी सभी पक्षियों की चोंच कहीं अच्छी है …. बिरजू बाज , कालू कौवा , कल्कि कोयल … सभी की चोंच मुझसे अच्छी है…. पर मैं ऐसा क्यों हूँ ?”, पट्टू उदास बैठ गया .

माँ कुछ देर शांति से बैठ गयी , उसे भी लगा कि शायद पट्टू सही कह रहा है , पट्टू को समझाएं तो कैसे …। तभी उसे सूझा कि क्यों ना पट्टू को ज्ञानी काका के पास भेजा जाए , जो पूरे जंगल में सबसे समझदार तोते के रूप में जाने जाते थे 

माँ ने तुरंत ही पट्टू को काका के पास भेज दिया .

ज्ञानी काका जंगल के बीचो -बीच एक बहुत पुराने पेड़ की शाखा पर रहते थे।

पट्टू उनके समक्ष जाकर बैठ गया और पुछा , ” काका , मेरी एक समस्या है !”

“प्यारे बच्चे तुम्हे क्या दिक्कत है , बताओ मुझे “, काका बोले .

पट्टू बताने लगा ,” मुझे मेरी चोंच पसंद नहीं है , ये कितनी अटपटी सी लगती है। ….. बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती … वहीँ मेरे दोस्त , बिरजू बाज , कालू कौवा , कल्कि कोयल … सभी की चोंच किनती सुन्दर है !”

काका बोले , ” सो तो है , उनकी चोंचें तो अच्छी हैं …. खैर ! तुम ये बताओ कि क्या तुम्हे खाने में केचुए और कीड़े -मकौड़े पसंद हैं ??”

” छी … ऐसी बेकार चीजें तो मैं कभी न खाऊं … “, पट्टू ने झट से जवाब दिया .

“अच्छा छोड़ो , क्या तुम्हे मछलियाँ खिलाईं जाएं ….?”, काका ने पुछा .

” या फिर तुम्हे खरगोश और चूहे परोसे जाएं ..”

“वैक्क्क …. काका कैसी बातें कर रहे हैं आप ? मैं एक तोता हूँ … मैं ये सब खाने के लिए नहीं बना हूँ …”, पट्टू नाराज़ होते हुए बोला .”

“बिलकुल सही “, काका बोले , ” यही तो मैं तुम्हे समझाना चाहता था …. ईश्वर ने तुम्हे कुछ अलग तरीके से बनाया है …, जो तुम पसंद करते हो , वो तुम्हारे दोस्तों को पसंद नहीं आएगा , और जो तुम्हारे दोस्त पसंद करते हैं वो तुम्हे नहीं भायेगा . सोचो अगर तुम्हारी चोंच जैसी है वैसी नहीं होती तो क्या तुम अपनी फेवरेट ब्राजीलियन अखरोट खा पाते … नहीं न !!… इसलिए अपना जीवन ये सोचने में ना लगाओ कि दुसरे के पास क्या है – क्या नहीं , बस ये जानो कि तुम जिन गुणों के साथ पैदा हुए हो उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग कैसे किया जा सकता है और उसे अधिक से अधिक कैसे विकसित किया जा सकता है !”

पट्टू काका की बात समझ चुका था , वह ख़ुशी – ख़ुशी अपनी माँ के पास वापस लौट गया .

पट्टू तोते की तरह ही बहुत से लोग अक्सर अपने positive points को count कर के खुश होने की बजाये दूसरों की योग्यताएं और उपलब्धियां देखकर comparison में लग जाते हैं. Friends, दूसरों को देख कर कुछ सीखना और कुछ कर गुजरने के लिए inspire होना तो ठीक है पर बेकार के कंपैरिजन कर किसी से ईर्ष्या करना हमें disappoint ही करता है. हमें इस बात को समझना चाहिए कि हम सब अपने आप में unique हैं और हमारे पास जो abilities और qualities हैं उन्ही का प्रयोग कर के हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं l  



10. नारद की समस्या - Hindi Moral Stories For Class 8


एक बार देवर्षि नारद अपने पिता ब्रम्हा जी के सामने “नारायण-नारायण” का जप करते हुए उपस्थित हुए और पूज्य पिताजी को दंडवत प्रणाम किया । नारद जी को सामने देख ब्रम्हा जी ने पुछा, “नारद! आज कैसे आना हुआ ? तुम्हारे मुख के भाव कुछ कह रहे हैं! कोई विशेष प्रयोजन है अथवा कोई नई समस्या ?”

 नारद जी ने उत्तर देते हुए कहा, “ पिताश्री ऐसा कोई विशेष प्रयोजन तो नहीं है, कई दिनों से एक प्रश्न मन में खटक रहा है । आज आपसे इसका उत्तर जानने के लिए उपस्थित हुआ हूँ । ”

“तो फिर विलम्ब कैसा? मन की शंकाओं का समाधान शीघ्रता से कर लेना ही ठीक रहता है! इसलिए निः संकोच अपना प्रश्न पूछो!” – ब्रम्हाजी ने कहा ।

“पिताश्री आप सारे सृष्टि के परमपिता है, देवता और दानव आप की ही संतान हैं । भक्ति और ज्ञान में देवता श्रेष्ठ हैं तो शक्ति तथा तपाचरण में दानव श्रेष्ठ हैं! परन्तु मैं इसी प्रश्न में उलझा हुआ हूँ कि इन दोनों में कौन अधिक श्रेष्ठ है। और आपने देवों को स्वर्ग और दानवों को पाताल लोक में जगह दी ऐसा क्यों? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए मैं आपकी शरण में आया हूँ” – नारद ने ब्रम्हाजी से अपना प्रश्न बताते हुए कहा ।

नारद का प्रश्न सुन ब्रम्हदेव बोले, नारद इस प्रश्न का उत्तर देना तो कठिन है और इसका उत्तर मैं नहीं दे पाऊँगा क्योंकि देव और दानव दोनों ही मेरे पुत्र हैं एवं अपने ही दो पुत्रों की तुलना अपने ही मुख से करना उचित नहीं होगा! लेकिन फिर भी तुम्हारे प्रश्न का उत्तर ढूंढने में मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ । तुम आज ही देवों और दानवों दोनों को मेरी और से भोजन का निमंत्रण भेजो । कल ही हम उनके लिए भोज का आयोजन करेंगे । और कल ही तुम्हे तुम्हारे प्रश्न कि देव क्यों स्वर्ग-लोक में हैं तथा दानव पाताल-लोक में ; का उत्तर भी मिल जायेगा!

नारद तत्काल ही असुरों और देवों को निमंत्रण दे आये।

दुसरे दिन दानव ब्रम्ह-लोक में भोजन का आनंद लेने के लिए पहुँच गए और उन्होंने पहले पहुँचने के कारण भोजन की पहली शुरूआत खुद से करने के लिए ब्रम्हा जी से आग्रह किया ।

भोजन की थालियाँ परोसी गई, दानव भोजन करने के लिए बैठे, वे भोजन शुरू करने ही वाले थे कि ब्रम्हा जी हाथ में कुछ लकड़ियाँ लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुए और उन्होंने कहा, “आज के भोजन की एक छोटी-सी शर्त है मैं यहाँ उपस्थित हर एक अतिथि के दोनों हाथों में इस प्रकार से लकड़ी बांधूंगा कि वो कोहनी से मुड़ नहीं पाए और इसी स्थिति में सभी को भोजन करना होगा । ”

कुछ देर बाद सभी असुरों के हाथों में लकड़ियाँ बंध चुकीं थीं। अब असुरों ने खाना शुरू किया , पर ऐसी स्थिति में कोई कैसे खा सकता था। कोई असुर सीधे थाली में मुँह डालकर खाने का प्रयास करने लगा तो कोई भोजन को हवा में उछालकर मुँह में डालने का प्रयत्न करने लगा । दानवों की ऐसी स्थिति देखकर नारद जी अपनी हंसी नहीं रोक पाए !

अपने सारे प्रयास विफल होते देख दानव बिना खाए ही उठ गए और क्रोधित होते हुए बोले, “हमारी यही दशा ही करनी थी तो हमें भोजन पर बुलाया ही क्यों? कुछ देर पश्चात् देव भी यहाँ पहुँचने वाले हैं ऐसी ही लकड़ियाँ आप उनके हाथों में भी बांधियेगा ताकि हम भी उनकी दुर्दशा का आनदं ले सकें…. ”

कुछ देर पश्चात् देव भी वहाँ पहुँच गए और अब देव भोजन के लिए बैठे, देवों के भोजन मंत्र पढ़ते ही ब्रम्हा जी ने सभी के हाथों में लकड़ियाँ बाँधी और भोजन की शर्त भी रखी ।

हाथों में लकड़ियाँ बंधने पर भी देव शांत रहे , वे समझ चुके थे कि खुद अपने हाथ से भोजन करना संभव नहीं है अतः वे थोड़ा आगे खिसक गए और थाली से अन्न उठा सामने वाले को खिलाकर भोजन आरम्भ किया । बड़े ही स्नेह के साथ वे एक दूसरे को खिला रहे थे, और भोजन का आनंद ले रहे थे, उन्होंने भोजन का भरपूर स्वाद लिया साथ ही दूसरों के प्रति अपना स्नेह, और सम्मान जाहिर किया ।

यह कल्पना हमे क्यों नहीं सूझी इसी विचार के साथ दानव बहुत दुखी होने लगे । नारद जी यह देखकर मुस्कुरा रहे थे । नारद जी ने ब्रम्हा जी से कहा, “पिताश्री आपकी लीला अगाध है । युक्ति, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग स्वार्थ हेतु करने की अपेक्षा परमार्थ के लिए करने वाले का जीवन ही श्रेष्ठ होता है । दूसरों की भलाई में ही अपनी भलाई है यह आपने सप्रमाण दिखा दिया और मुझे अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया है । ब्रम्हा जी को सबने प्रणाम किया और वहाँ से विदा ली ।

मित्रों, हमें यह जीवन सिर्फ अपने ही स्वार्थ के लिए नहीं मिला है, यदि हम इसका उपयोग परोपकार के कार्यों के लिए करते हैं तो निश्चित रूप से हमें इसी जीवन में स्वर्ग की प्राप्ति होगी । यदि हम दूसरों को प्यार और स्नेह देंगे तो बदले में हमे भी वही मिलेगा । यदि हम अपने सामर्थ्य के अनुसार हमारे समाज के लिए एक छोटा-सा योगदान भी दे सकें तो यह अपने आपमें एक बहुत बड़ी उपलब्धि के बराबर है !



11. शेर और लकड़बग्घे - Hindi Moral Stories For Class 8


शेरा नाम का एक शेर बहुत परेशान था ।

वो एक नौजवान शेर था जिसने अभी -अभी शिकार करना शुरू किया था । पर अनुभव न होने के कारण वो अभी तक एक भी शिकार नहीं कर पाया था । हर एक असफल प्रयास के बाद वो उदास हो जाता , और ऊपर से आस -पास घूम रहे लकड़बघ्घे भी उसकी खिल्ली उड़ा कर खूब मजे लेते ।

ये बात शेरा की माँ , जो दल के सबसे सफल शिकारियों में से थी को अच्छी तरह से समझ आ रही थी । एक रात माँ ने शेरा को बुलाया और बोली ,” तुम परेशान मत हो , हम सभी इस दौर से गुजरे हैं , एक समय था जब मैं छोटे से छोटा शिकार भी नहीं कर पाती थी और तब ये लकड़बग्घे मुझपर बहुत हँसते थे । तब मैंने ये सीखा , “ अगर तुम हार मान लेते हो और शिकार करना छोड़ देते हो तो जीत लकड़बग्घों की होती है । लेकिन अगर तुम प्रयास करते रहते हो और खुद में सुधार लाते रहते हो … सीखते रहते हो तो एक दिन तुम महान शिकारी बन जाते हो और फिर ये लकड़बग्घे कभी तुम पर नहीं हंस पाते ।”

समय बीतता गया और कुछ ही महीनो में शेरा एक शानदार शिकारी बन कर उभरा , और एक दिन उन्ही लकड़बग्घों में से एक उसके हाथ लग गया ।

“ म्म्म् मुझे मत मारना … मुझे माफ़ कर दो जाने; मुझे जाने दो ”, लकड़बग्घा गिड़गिड़ाया।

“ मैं तुम्हे नहीं मारूंगा , बस मैं तुम्हे और तुम्हारे जैसे आलोचकों को एक सन्देश देना चाहता हूँ । तुम्हारा खिल्ली उड़ाना मुझे नहीं रोक पाया , उसने बस मुझे और उत्तेजित किया कि मैं एक अच्छा शिकारी बनूँ … खिल्ली उड़ाने से तुम्हे कुछ नहीं मिला पर आज मैं इस जंगल पर राज करता हूँ । जाओ मैं तुम्हारी जान बख्शता हूँ … जाओ बता दो अपने धूर्त साथियों को कि कल वे जिसका मजाक उड़ाते थे आज वही उनका राजा है ।”

Friends, इस दुनिया में आपकी कमियां गिनाने वालों की कमी नहीं है, आपको ऐसे तमाम critics मिला जायेंगे जो आपकी काबिलियत , आपकी skills और कुछ कर पाने की ability पर doubt करेंगे , आपका मजाक उड़ाएंगे । अगर आप इन आलोचकों के डर से पीछे हट जाते हैं तो आप उन्हें जीतने देते हैं लेकिन अगर आप डटे रहते हैं , बार -बार प्रयास करते रहते हैं , खुद में improvement लाते रहते हैं तो एक दिन आप जीत जाते हैं ।

इसलिए life में आने वाले critics से कभी मुंह मत मोड़िये , उनका सामना कीजिये , उन्हें कुछ भला -बुरा मत कहिये बस चुपचाप अपने लक्ष्य का पीछा करते रहिये और एक दिन सफलता प्राप्त करके दिखाइए … यही उनके लिए आपका सबसे बड़ा जवाब होगा।


12. इलेक्ट्रिक शॉक - Hindi Moral Stories For Class 8


Friends, मैं Mechanical Engineer हूँ और एक private company में जॉब करता हूँ . ये कुछ वर्ष पहले की बात है , मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ बहुत सारे electrical panels हैं जिन पर काम करते समय electric shock लगने की समस्या से हम परेशान थे। कितनी भी सावधानी से काम करो, कई बार current शरीर में सिहरन पैदा कर ही देता था . इसके लिए जब brain storming की गयी तो कई सुझावों में से एक सुझावये आया कि panels के side में insulating mat रखी जाएँ जिससे आदमी उस पर खड़ा होकर काम करेगा और current लगने की समस्या नहीं रहेगी। ये उपाय सस्ता भी था और इसको तुरन्त implement किया जा सकता था। इसलिए इस सुझाव को तुरन्त मान लिया गया और सभी panels के पास mat लाकर रख दी गयीं . अब इससे current लगने की समस्या तो खत्म हो गयी लेकिन थोड़े ही दिनों में एक दूसरी समस्या आ गयी।

चूँकि plant की ये जगह open area में थी तो यहाँ से वो mat चोरी होने लगीं। अब किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था कि इस नई समस्या का क्या इलाज़ करें। इस एक काम के लिए 24 घंटे security बैठाना मंहगा सौदा था। तभी एक worker आया और उसने एक बड़ा ही सरल सा उपाय सुझा दिया। उसने कहा साहब आप तो इस mat को यहाँ रखकर इसके 3-4 टुकड़े कर दो। फिर ये टुकड़े किसी के काम के नहीं रहेंगे, हमें तो यहाँ खड़े होकर काम ही करना है, वो हम कर लेंगे। और वाकई में इसके बाद कोई भी mat चोरी नहीं हुआ और इस समस्या का बहुत आसान सा समाधान निकल गया। 



13. बंद मुट्ठी – खुली मुट्ठी -Hindi Moral Stories For Class 8 


एक आदमी के दो पुत्र थे राम और श्याम। दोनों थे तो सगे भाई पर एक दुसरे के बिलकुल विपरीत , जहाँ राम बहुत कंजूस था वहीँ श्याम को फिजूलखर्ची की आदत थी। दोनों की पत्नियां भी उनकी इस आदत से परेशान थीं।

घरवालों ने दोनों को समझाने के बहुत प्रयास किये पर ना राम अपनी कंजूसी छोड़ता और ना ही श्याम अपनी फिजूलखर्ची से बाज आता।

एक बार गाँव के करीब ही एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। वृद्ध पिता ने सोचा क्यों न उन्ही से इस समस्या का समाधान पूछा जाए और अगले ही दिन वे महात्मा जी के पास पहुंचे।

महात्मा जी ने ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनी और अगले दिन दोनों पुत्रों को लेकर आने को कहा।

पिताजी तय समय पर पुत्रों को लेकर पहुँच गए।

महत्मा जी ने पुत्रों के सामने अपनी बंद मुट्ठीयां घुमाते हुए कहा, ” बातओ यदि मेरा हाथ हमेशा के लिए ऐसा ही हो जाए तो कैसा लगेगा ?”

पुत्र बोले , “ऐसे में तो ऐसा लगेगा जैसे कि आपको कोढ़ हो। “

“अच्छा अगर मेरे हाथ हमेशा के लिए ऐसे हो जाएं तो कैसा लगेगा ?”, महत्मा जी ने अपनी फैली हथेलियाँ दिखाते हुए पुछा।

“जी , तब भी यही लगेगा कि आपको कोढ़ है। “,पुत्र बोले।

तब महात्मा जी गंभीरता से बोले , ” पुत्रों यही तो मैं तुम्हे समझाना चाहता हूँ , हमेशा अपनी मुट्ठी बंद रखना यानि कंजूसी दिखाना या हमेशा अपनी हथेली खुली रखना यानि फिजूलखर्ची करना एक तरह का कोढ़ ही तो है।हमेशा मुट्ठी बंद रखने वाला धनवान होते हुए भी निर्धन ही रहता है और हमेशा मुट्ठी खुली रखने वाला चाहे जितना भी धनवान हो उसे निर्धन बनते समय नहीं लगता। सही व्यवहार है कि कभी मुट्ठी बंद रहे तो कभी खुली तभी जीवन का संतुलन बना रहता है। “

पुत्र महात्मा जी की बात समझ चुके थे। अब उन्होंने मन ही मन सोच-समझ कर ही खर्च करने का निश्चय किया.  


14. क्या सचमुच आत्मा होती है? -Hindi Moral Stories For Class 8 


आध्यात्मिक हिंदी कहानी 

प्रातः काल का समय था। गुरुकुल में हर दिन की भांति गुरूजी अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। आज का विषय था- “आत्मा”

आत्मा के बारे में बताते हुए गुरु जी ने गीता का यह श्लोक बोला –

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||

अर्थात: आत्मा को न शस्त्र छेद सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल उसे गला सकता है और न हवा उसे सुखा सकती है। इस आत्मा का कभी भी विनाश नहीं हो सकता है, यह अविनाशी है।

यह सुनकर एक शिष्य को जिज्ञासा हुई, वह बोला, “किन्तु गुरुवर यह कैसे संभव है? यदि आत्मा का अस्तित्व है, वो अविनाशी है, तो भला वो इस नाशवान शरीर में कैसे वास करती है और वो हमें दिखाई क्यों नहीं देती? क्या सचमुच आत्मा होती है?”

गुरु जी मुस्कुराए और बोले, पुत्र आज तुम रसोईघर से एक कटोरा दूध ले लेना और उसे सुरक्षित अपने कमरे में रख देना। और कल इसी समय वह कटोरा लेकर यहाँ उपस्थित हो जाना।

अगले दिन शिष्य कटोरा लेकर उपस्थित हो गया।

गुरु जी ने पूछा, “ क्या दूध आज भी पीने योग्य है?”

शिष्य बोला, “नहीं गुरूजी, यह तो कल रात ही फट गया था….लेकिन इसका मेरे प्रश्न से क्या लेना-देना?”

गुरु जी शिष्य की बात काटते हुए बोले, “ आज भी तुम रसोई में जाना और एक कटोरा दही ले लेना, और कल इसी समय कटोरा लेकर यहाँ उपस्थित हो जाना।

अगले दिन शिष्य सही समय पर उपस्थित हो गया।

गुरु जी ने पूछा, “ क्या दही आज भी उपभोग हेतु ठीक है ?”

शिष्य बोला, “जी हाँ गुरूजी ये अभी भी ठीक है।”

“अच्छा ठीक है कल तुम फिर इसे लेकर यहाँ आना।”, गुरूजी ने आदेश दिया।

अगले दिन जब गुरु जी ने शिष्य से दही के बारे में पूछा तो उसने बताया कि दही में खटास आ चुकी थी और वह कुछ खराब लग रही है।

इसपर गुरूजी ने कटोरा एक तरफ रखते हुए कहा, “ कोई बात नहीं, आज तुम रसोई से एक कटोरा घी लेकर जाना और उसे तब लेकर आना जब वो खराब हो जाए!”

दिन बीतते गए पर घी खराब नहीं हुआ और शिष्य रोज खाली हाथ ही गुरु के समक्ष उपस्थित होता रहा।

फिर एक दिन शिष्य से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिए, “गुरुवर मैंने बहुत दिनों पहले आपसे पश्न किया था कि -“ यदि आत्मा का अस्तित्व है, वो अविनाशी है, तो भला वो वो इस नाशवान शरीर में कैसे वास करती है और व हमें दिखाई क्यों नहीं देती? क्या सचमुच आत्मा होती है?”, पर उसका उत्तर देने की बजाये आपने मुझे दूध, दही, घी में उलझा दिया। क्या आपके पास इसका कोई उत्तर नहीं है?”

इस बार गुरूजी गंभीर होते हुए बोले, “ वत्स मैं ये सब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने के लिए ही तो कर रहा था- देखो दूध, दही और घी सब दूध का ही हिस्सा हैं…लेकिन दूध एक दिन में खराब हो जाता है..दही दो-तीन दिनों में लेकिन शुद्ध घी कभी खराब नहीं होता। ”

इसी प्रकार आत्मा इस नाशवान शरीर में होते हुए भी ऐसी है कि उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

“ठीक है गुरु जी, मान लिया कि आत्मा अविनाशी है लेकिन हमें घी तो दिखयी देता है पर आत्मा नहीं दिखती?”

“शिष्य!”, गुरु जी बोले, “ घी अपने आप ही तो नहीं दिखता न? पहले दूध में जामन डाल कर दही में बदलना पड़ता है, फिर दही को मथ कर उसे मक्खन में बदला जाता है, फिर कहीं जाकर जब मक्खन को सही तापमान पर घंटों पिघलाया जाता है तब जाकर घी बनता है!

हर इंसान आत्मा का दर्शन यानी आत्म-दर्शन कर सकता है, लेकिन उसके लिए पहले इस दूध रुपी शरीर को भजन रूपी जामन से पवित्र बनाना पड़ता है उसके बाद कर्म की मथनी से इस शरीर को दीन-दुखियों की सेवा में मथना होता है और फिर सालों तक साधना व तपस्या की आंच पर इसे तपाना होता है…तब जाकर आत्म-दर्शन संभव हो पाता है!

शिष्य गुरु जी की बात अच्छी तरह से समझ चुका था, आज उसकी जिज्ञासा शांत हो गयी थी, उसने गुरु के चरण-स्पर्श किये और आत्म-दर्शन के मार्ग पर आगे बढ़ गया! 



15. किसकी हैं गंगा-यमुना ? - Hindi Moral Stories For Class 8


गांधी जी का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणा का स्रोत है। आज के इस प्रसंग से भी हमें उनके ” सादा जीवन उच्च विचार” के दर्शन का पता चलता है।

बात इलाहाबाद की है, उन दिनों वहां कांग्रेस का अधिवेषन चल रहा था । सुबह का समय था , गांधी जी ; नेहरू जी एवं अन्य स्वयं सेवकों के साथ बातें करते -करते हाथ -मुंह धो रहे थे ।

गांधी जी ने कुल्ला करने के लिए जितना पानी लिया था वो खत्म हो गया और उन्हें दोबारा पानी लेना पड़ा । इस बात से गांधी जी थोड़ा खिन्न हो गए ।

गांधी जी के चेहरे के भाव बदलते देख नेहरू जी ने पुछा , ” क्या हुआ , आप कुछ परेशान दिख रहे हैं ?”

बाकी स्वयंसेवक भी गांधी जी की तरफ देखने लगे ।

गांधी जी बोले , ” मैंने जितना पानी लिया था वो खत्म हो गया और मुझे दोबारा पानी लेना पड़ रहा है , ये पानी की बर्वादी ही तो है !!!”

नेहरू जी मुस्कुराये और बोले -” बापू , आप इलाहाबाद में हैं , यहाँ त्रिवेणी संगम है , यहाँ गंगा-यमुना बहती हैं , कोई मरुस्थल थोड़े ही है कि पानी की कमी हो , आप थोड़ा पानी अधिक भी प्रयोग कर लेंगे तो क्या फरक पड़ता है ? “

गाँधीजी ने तब कहा- ” किसकी हैं गंगा-यमुना ? ये सिर्फ मेरे लिए ही तो नहीं बहतीं , उनके जल पर तो सभी का समान अधिकार है ?हर किसी को ये बात अच्छी तरह से समझनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनो का दुरूपयोग करना ठीक नहीं है , कोई चीज कितनी ही प्रचुरता में मौजूद हो पर हमें उसे आवश्यकतानुसार ही खर्च करना चाहिए ।

और दूसरा , यदि हम किसी चीज की अधिक उपलब्धता के नाते उसका दुरूपयोग करते हैं तो हमारी आदत बिगड़ जाती है , और हम बाकी मामलों में भी वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं ।”

नेहरू जी और बाकी लोग भी गांधी जी की बात समझ चुके थे ।

मित्रों , गांधी जी की सोच कितनी प्रबल थी , इसे आज और भी अच्छी तरह से समझा जा सकता है । आज मनुष्य प्रकृति से हुए खिलवाड़ का खामियाजा भुगत रहा है , ऐसे में हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम प्राकृतिक संसाधनो का सही उपयोग करें और एक बेहतर विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें ।


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👨   Summury - 

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