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Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya

Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


Today I am sharing this blog of  Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya  with all of you, which is quite valuable for every child. These moral stories will help a lot in understanding the society of children, so that they can become a good person. If you like this story, then do share it with other people.




आज मै आप सभी से नैतिक कहानियों का  यह  ब्लॉग साझा कर रहा हु जो काफी मुल्यवान है, |यह नैतिक कहानिए बच्चों के समाज को समझने मे काफी मदद करेगा ,जिससे वह एक अच्छा इंसान बन सके |अगर आपको यह कहानिया अच्छी लगे तो अन्य लोगों से जरूर साझा करे 




1. शतरंज के खिलाडी -Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya 


Chess players -एक युवक ने किसी मठ के महंत से कहा मैं साधू बनना चाहता हूँ लेकिन एक समस्या ये है कि मुझे कुछ भी नहीं आता केवल एक चीज़ के और वो है शतरंज लेकिन शतरंज से मुक्ति तो नहीं मिलती और एक दूसरी बात जो मैं जानता हूँ वो ये है कि सभी प्रकार के आमोद प्रमोद के साधन जो है वो पाप है । इन दोनों बातों के अलावा मुझे कोई अधिक ज्ञान नहीं ।

इस पर महंत ने उस युवक से कहा ” हाँ वे पाप तो है लेकिन उन से मन भी बहलता है और क्या पता उस मठ को उनसे भी कोई लाभ पहुंचे ।  महंत ने शतरंज की एक बिसात बिछाई और युवक को शतरंज की एक बाजी खेलने को कहा । सब खेल शुरू होने वाला था महंत ने उस युवक को कहा कि देखो ” हम शतरंज की एक बाजी खेलेंगे और अगर मैं हार गया तो मैं इस मठ को हमेशा के लिए छोड़ दूंगा और तुम मेरा स्थान ले लोगे ।”  युवक ने देखा महंत वास्तव में गंभीर था तो युवक के लिए अब ये बाजी जिन्दगी और मौत का सवाल बन गयी थी क्योंकि वो मठ में रहना चाहता था इसलिए उसे ये था कि मैं हार न जाऊ ।

युवक के माथे से दबाव साफ़ जाहिर हो रहा था और उसके माथे से पसीना भी चू रहा था । वंहा मौजूद सही लोगो के लिए अब ये शतरंज का बोर्ड पृथ्वी की धुरी की तरह हो गया था ।  महंत ने खराब शुरुआत की । युवक ने कई कठोर चले चली लेकिन उसने क्षण भर के लिए महंत के चेहरे को देखा  । फिर जानबूझकर खराब खेलने लगा । अचानक ही महंत ने बिसात ठोकर मरकर जमीन पर गिरा दी ।  महंत ने कहा ” तुम्हे जितना सिखाया गया था तुम उस से कंही ज्यादा जानते हो । तुमने अपना पूरा ध्यान जीतने पर लगाया और अपने सपनों के लिए लड़ सकते हो । फिर तुम्हारे भीतर करूंणा जाग उठी और तुमने भले कार्य के लिए त्याग करने का निश्चय कर लिया ।”

महंत के जारी रखते हुए कहा ” तुम्हारा इस मठ में स्वागत है क्योंकि तुम जानते हो कि कैसे अनुशाशन और करुणा में सामजस्य स्थापित किया जा सकता है इसलिए तुम कर सकते हो ।”


2. कैसे कौए हुए काले - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


एक बार की बात है । एक ऋषि ने एक कौवे को अमृत की तलाश में भेजा लेकिन कौवे को ये चेतावनी भी दी कि केवल अमृत के बारे में पता करना है उसे पीना नहीं है अन्यथा तुम इसका कुफल भोगोगे । कौवे ने हामी भर दी और उसके बाद सफेद कौवे ने ऋषि से विदा ली ।

एक साल के कठोर परिश्रम के बाद कौवे को आखिर अमृत के बारे में पता चल गया । वह इसे पीने की लालसा रोक नहीं पाया और इसे पी लिया जबकि ऋषि ने उसे कठोरता से उसे नहीं पीने के लिए पाबंद किया था । सो उसने ऐसा कर ऋषि को दिया अपना वचन तोड़ दिया ।

पीने के बाद उसे पछतावा हुआ और उसने वापिस आकर ऋषि को पूरी बात बताई तो ऋषि ये सुनते ही आवेश में आ गये और कौवे को शाप दे दिया और कहा क्योंकि तुमने अपनी अपवित्र चोंच से अमृत की पवित्रता को नष्ट किया है इसलिए आज के बाद पूरी मानवजाति तुमसे घृणा करेगी और सारे पंछियों में केवल तुम होंगे जो सबसे नफरत भरी नजरो से देखे जायेंगे । किसी अशुभ पक्षी की तरह पूरी मानवजाति हमेशा तुम्हारी निंदा करेगी ।

और चूँकि अमृत का पान किया है इसलिए तुम्हारी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होगी । कोई बीमारी भी नहीं होगी और तुम्हे वृद्धावस्था भी नहीं आएगी । भाद्रपद के महीने के सोलह दिन तुम्हे पितरो का प्रतीक मानकर आदर दिया जायेगा । तुम्हारी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होगी इतना कहकर ऋषि ने अपने कमंडल के काले पानी में उसे डुबो दिया । काले रंग का बनकर कौवा उड़ गया तभी से कौवा काले रंग के हो गये ।

 

हालाँकि ये कहानियां लोककथाओं के रूप में प्रचलित है लेकिन फिर भी मेने अक्सर कई लेखो और मान्यताओं में किसी एक के किये कर्मो की सजा उसकी पूरी जाति को भुगतनी पड़ी हो ऐसा देखा है लेकिन मेरे विचार ये केवल काल्पनिक लेख ही होंगे क्योंकि आधुनिक युग की परिभाषा में जन्हा लोग तर्क करने की क्षमता रखते है किसी भी धारणा का अँधा अनुकरण करने से पहले ये सब पहले के जमाने में लोगो को कुछ शिक्षाओं को उनके मानसिक स्तर पर समझाने का ये प्रयास ही रहा होगा । ऐसा हम मान सकते है ।


3. एक रुपया - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


एक महात्मा भ्रमण करते हुए किसी नगर से होकर जा रहे थे ।  मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला । महात्मा तो वैरागी और संतोष से भरे व्यक्ति थे भला एक रूपये का क्या करते इसलिए उन्होंने यह रुपया किसी दरिद्र को देने का विचार किया कई दिन की तलाश के बाद भी उन्हें कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला ।

एक दिन वो अपने दैनिक क्रियाकर्म के लिए सुबह सुबह उठते है तो  क्या देखते है एक राजा अपनी सेना को लेकर दूसरे राज्य पर आक्रमण के लिए उनके आश्रम के सामने से सेना सहित जा रहा है । ऋषि बाहर को आये तो उन्हें देखकर राजा ने अपनी सेना को रुकने का आदेश दिया और खुद आशीर्वाद के लिए ऋषि के पास आकर बोले महात्मन मैं दूसरे राज्य को जीतने के लिए जा रहा हूँ ताकि मेरा राज्य विस्तार हो सके । इसलिए मुझे विजयी होने का आशीर्वाद प्रदान करें ।

इस पर ऋषि ने काफी देर सोचा और सोचने के बाद वो एक रुपया राजा की हथेली में रख दिया । यह देखकर राजा हेरान और नाराज दोनों हुए लेकिन उन्हें इसके पीछे का प्रयोजन काफी देर तक सोचने के बाद भी समझ नहीं आया ।  तो राजा ने महात्मा से इसका कारण पूछा तो महात्मा ने राजा को सहज भाव से जवाब दिया कि राजन कई दिनों पहले मुझे ये एक रुपया आश्रम आते समय मार्ग में मिला था तो मुझे लगा किसी दरिद्र को इसे दे देना चाहिए क्योंकि किसी वैरागी के पास इसके होने का कोई औचित्य नहीं है । बहुत खोजने के बाद भी मुझे कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला लेकिन आज तुम्हे देखकर ये ख्याल आया कि तुमसे दरिद्र तो कोई है ही नहीं इस राज्य में जो सब कुछ होने के बाद भी किसी दूसरे बड़े राज्य के लिए भी लालसा रखता है । यही एक कारण है कि मैंने तुम्हे ये एक रुपया दिया है ।

राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने युद्ध का विचार भी त्याग दिया ।



4. नागरिक का फर्ज - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


एक बार की बात है चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस अपने चेलो के साथ एक पहाड़ी से गुजर रहे थे । थोड़ी दूर चलने के बाद वो एक जगह अचानक रुक गये और कन्फ्यूशियस बोले ” कंही कोई रो रहा है ” वो आवाज को लक्ष्य करके उस और बढ़ने लगे । शिष्य भी पीछे हो लिए एक जगह उन्होंने देखा कि एक स्त्री रो रही है ।

कन्फ्यूशियस ने उसके रोने का कारण पूछा तो स्त्री ने कहा इसी स्थान पर उसके पुत्र को चीते ने मार डाला । इस पर कन्फ्यूशियस ने उस स्त्री से कहा तो तुम तो यंहा अकेली हो न तुम्हारा बाकि का परिवार कंहा है ? इस पर स्त्री ने जवाब दिया हमारा पूरा परिवार इसी पहाड़ी पर रहता था लेकिन अभी थोड़े दिन पहले ही मेरे पति और ससुर को भी इसी चीते ने मार दिया था । अब मेरा पुत्र और मैं यंहा रहते थे और आज चीते ने मेरे पुत्र को भी मार दिया ।

इस पर कन्फ्यूशियस हैरान हुए और बोले कि अगर ऐसा है तो तुम इस खतरनाक जगह को छोड़ क्यों नहीं देती । इस पर स्त्री ने कहा ” इसलिए नहीं छोडती क्योंकि कम से कम यंहा किसी अत्याचारी का शासन तो नहीं है ।” और चीते का अंत तो किसी न किसी दिन हो ही जायेगा ।

इस पर कन्फ्यूशियस ने अपने शिष्यों से कहा निश्चित ही यह स्त्री करूँणा और सहानुभूति की पात्र है लेकिन फिर भी एक महत्वपूरण सत्य से इसने हमे अवगत करवाया है कि एक बुरे शासक के राज्य में रहने से अच्छा है किसी जंगल या पहाड़ी पर ही रह लिया जाये । जबकि मैं तो कहूँगा एक समुचित व्यवस्था यह है कि जनता को चाहिए कि ऐसे बुरे शासक का जनता पूर्ण विरोध करें और सत्ताधारी को सुधरने के लिए मजबूर करे और हर एक नागरिक इसे अपना फर्ज़ समझे ।


5. चार मित्र - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                    एक गाँव में चार मित्र रहते थे। उनमें से तीन बहुत ही विद्वान थे। पर वे व्यावहारिक ज्ञान की दृटि से एकदम कोरे थे। 
चोथा मित्र पढ़ा-लिखा तो कम था, पर वह व्यावहारिक ज्ञान में माहिर था। 

                    एक बार चारों मित्र अपना-अपना भाग्य आजमाने राजधानी की ओर चल पड़े़। रास्ते में एक जंगल आया।
वहाँ उन्हें एक पेड़ के नीचे कुछ हड्डियाँ दिखाई दी। उनमें से एक व्यक्ति ने उन हड्डियों का निरक्षण करते हुए कहा, ये हड्डियाँ किसी शेर की हैं। इन हड्डियों को एकत्र कर मैं अपनी विद्या से मरे हुए शेर का कंकाल तैयार कर सकता हूँ।

                   दूसरे विद्वान ने कहा, मैं अपने ज्ञान के बल से उस कंकाल पर मांस चढ़ा कर एवं रक्त से भरकर उसे खाल से ढक सकता हूँ।
तीसरे विद्वान ने कहा, मैं अपनी विद्या से इस निर्जीव प्राणी को जीवित कर सकता हूँ।

                   व्यावहारिक ज्ञान में माहिर चैथे मित्र को अपने तीनों मित्रों की बातें सुनकर बड़ा आश्र्चय हुआ। उसने अपने विद्वान मित्रों को सावधान करते हुए कहा, मित्रो, शेर को जीवित करना खतरे से खाली नहीं होगा।

                   यह सुनकर पहले विद्वान ने कहा, अरे, यह तो मूर्ख है! इस बेवकूफ को हमारे ज्ञान से ईष्र्या हो रही है।
दोनो विद्वान मित्रों ने भी उसका समर्थन किया। यह देखकर वह समझदार व्यक्ति दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया। तीनों विद्वान मित्रों ने अपने-अपने ज्ञान का प्रयोग करना शुरू कर दिया।
पहले विद्वान ने सारी हड्डियाँ एकत्र कर उसका कंकाल तैयार किया। दूसरे विद्वान ने कंकाल पर मांस चढ़ाकर वे रक्त से भरकर उसे खाल से ढ़क दिया। 

                  तीसरे ने अपनी विद्या का प्रयोग कर उस निर्जीव शेर में जान डाल दी। जान आते ही शेर दहाड़ता हुआ खड़ा हो गया और तीनोंपर टूट पड़ा। तीनों विद्वान वहीं ढेर हो गए।
व्यावहारिक ज्ञान एवं सूझबझ के कारण चोैथे मित्र की जान बच गई।

शिक्षा -ज्ञान का अव्यावहारिक उपयोग बड़ा ही खतरनाक होता है। 


6. चंचल मन - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


ये मन भी कितना चंचल है| प्रकाश की गति से भी तेज, बहुत तेज चलता है| या ये कहूँ कि दौड़ता है | इसकी चंचलता का क्या बखान करूँ, ये इस पल में तो मेरे साथ होता है और कहीं पलक झपकते ही, ये हजारों कोसों दूर किसी समुंदर में गोते लगाती मछलियों के साथ तैरता नज़र आता है| मैं कई बार इसे समझा बुझाकर वापस लेकर आती हूँ |

फिर भी मुझे बस यह एक झलक दिखाकर दोबारा धोका देकर निकल जाता है, फिर कहीं किसी दूसरी दुनिया की सैर करने के लिए| कभी ये आकाश में उड़ते परिंदे के साथ हवा के साथ अठखेलियां करता है, तो कभी हिमालय सी ऊंची पर्वत की चोटी पर खड़े होकर मुझे जीभ चिडाता नज़र आता है, कभी नेता के साथ खुद को किसी मंच पर भाषण देता हुआ गर्व महसूस करता है, तो कभी किसी फ़िल्मी कलाकार के साथ तस्वीर लेने के लिए उत्साहित होता नज़र आता है| वाकई यह मन कितना चंचल है | मना करते करते भी ना जाने कहाँ कहाँ चला जाता है|

बस इसी तरह दौड़ता हुआ आज यह मन एक छोटे से घर में जा पंहुचा | मैंने इस बार भी मना किया था इसे कि दूसरों के घरो में नहीं झाँका करते, पर इसने क्या आज तक मेरी सुनी थी जो ये आज सुनने वाला था | ये तो चल पड़ा था रोज की तरह अपने सुनहरे सफ़र की तलाश में, इसी चाह में कि शायद आज उसे इस घर से किसी के चूल्हे पर पकी मक्के की रोटी की सोंधी सी खुशुबू आ जाये|

पर ये क्या था आज तो ये दौड़ता हुआ सा मन अचानक इतना विचलित कैसे हो गया, क्यों दौड़ता दौड़ता ये अचानक थम सा गया| मैंने तो इसे आज इसे अभी वापस अपनी दुनिया में आने को टोका भी न था| न ही मैंने इसे इसकी गति को विराम लगाने का कोई आदेश दिया था| फिर क्या हुआ? अचानक इतना मायूस क्यों नज़र आने लगा?

ओह ! तो आज इसने जीवन की सच्चाई देख ली| शायद ये उस घर में रुक गया जिसमें एक छोटा सा बच्चा भूख से तिलमिलाता हुआ अपनी माँ की गोद में आकर बैठा है| उसकी माँ चाहती तो है कि वो एक पल में अपने दिल के टुकड़े को दूध का कटोरा लाकर कहीं से दे दे | लेकिन दूध तो क्या एक चावल का दाना भी तो न था उसके पास| ये मन आज गलत पते पर आ गया था शायद, मक्के की रोटी की सोंधी खुसबू सूंघने को|

उसे क्या पता था कि यहाँ मक्के की रोटी तो क्या एक मक्का का दाना भी न था। कुछ पल माँ ने अपने लाडले को समझाया और देखो माँ तो माँ होती है| उसकी प्यारी बातें उस भूख से लड़ते बच्चे को सब भूला देती हैं | एक पल तो ये सोचता है कि ऐसा क्या था जो अब ये रोता नहीं ? क्यों भूख से बिलखता नहीं? उसने उस नन्हे से बालक के मन को भी टटोलने का प्रयास किया |

पर ये क्या? ये तो इससे भी कहीं तेज गति से दौड़ रहा था | भला मेरा मन इस नन्हे बालक के मन से कहाँ कोई प्रतियोगिता जीत सकता था| ये तो परियो से बातें कर रहा था, तो कही सौरमंडल के चारों ओर चक्कर लगा लगाकर अपने दोस्तों को चिड़ा रहा था| अरे ये क्या ये तो उन टिम टिम करते हुए तारों से बातें भी करने लगा है.| और इसके मन की गति का तो कोई तोड़ ही नहीं है |

एक पलक झपकते ही ये तो अन्तरिक्ष से सीधे समुंदर की गहराइयों तक भी पहुँच जाता है| देखो तो कैसे यह उस पांच पैर वाली अद्भुत मछली से आँख मिचोली खेलने लगा है | कितना खुश है ये तो | मेरे मन में हीनता की भावना आने लगी कि ये तो मुझसे भी ऊंची छलांगे लगाता है| ये तो मुझसे भी चोटी छोटी पर चढ़ जाता है|

लेकिन तभी अचानक ये क्या? इस नादान का मन तो किसी के घर में जाकर रुक गया | जहाँ इसके घर की तरह ही एक मिटटी का चूल्हा है| एक माँ है | और एक बेटा भी | यहाँ सब कुछ अपना सा है पर बस एक अन्तर है | यहाँ वो मिटटी के चूल्हे पर सिकती हुई मक्के की रोटी की सोंधी-सोंधी खुसबू आती है| और इस नन्हे से बालक का मन फिर से शांत, उदास और मायूस हो जाता है | और फिर मेरे मन का भी| अब इसका भी दौड़ने का मन नहीं करता, अब कही भी नहीं करता |


7. जानें समय का महत्व - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


जिंदगी में अभिलाषाएं, इच्छायें बहुत हैं। किन्तु इच्छायें साकार करने के लिए समय अनुकूल नहीं है , प्रतिकूल है ऐसा सभी के विचार होते है। समय का अभाव जीवन के कई स्तर पर हम महसूस करते हैं , तथा समय को पहचान नहीं पाते हैं।

प्रायः जीवन के क्षण में कई बार हम समय को महसूस करते हैं , आप सभी को कुछ बिन्दु के माध्यम से समय की पहचान करता हूँ। जिसके जरिये आप उस पल की याद कर पाएँगे, जिस क्षण आपने समय को अपने पास से गुजरते हुए देखा। लेकिन आप उस समय का उपयोग नहीं कर सके।

१. परिणाम में 1 अंक कम आ जाने से छात्र को समय का महत्व पता चल जाता है , ओर सोचता कि काश अच्छी मेहनत कर ली होती तो, आगे में बढ़ जाता।

२ यदि आप क्रिकेट देख रहे हैं, उसी समय नेट बंद हो जाये कुछ क्षण के लिए तो कोहली का छक्का भी मिस हो सकता हैं।

३ ट्रैफ़िक सिग्नल में खड़े हो जाने से व्यक्ति को सेकंड भी याद आ जाता है।

४ छात्र के 1 मिनट लेट हो जाने से उसकी स्कूल बस भी छूट जाती है।

५ आपके 1 मिनट लेट हो जाने से थिएटर का हाउस फुल हो जाता है, उस क्षण आप सोचते की काश 1 मिनट पहले आ जाता।

६ परीक्षा के समय आप सोचते हैं कि काश 5 मिनट मिल जाये तो पूरा पेपर हो जाये।

७ पेनल्टी या ब्याज का भुगतान करने पर आपको 1 दिन का भी महत्व पता चल जाता है।

८. फसल के नष्ट हो जाने से किसान को 1 सीजन का महत्त्व पता चलता है।

९ सेंसेक्स के प्रति क्षण चेंज के कारण , व्यक्ति के निर्णय परिवर्तित हो जाते हैं।

१० खिलाड़ी के मिनी सेकंड ध्यान हटने से जीत हार में परिवर्तित हो जाती है।

ऊपर दर्शाये गये बिंदु तो सिर्फ कुछ ही उदहारण हैं, जो कि जीवन में उपहार स्वरूप आते -जाते हैं, फिर भी व्यक्ति समय को सही तरीके से उपयोग नहीं करता। एवं सदैव विचारों की श्रृंखला में सोचता रहता है कि ये कार्य या पढ़ाई बाद में कर लेता हूँ।

इसी प्रकार समय निरंतर अपनी गति से निकल जाता है, और हम विचार ही करते रहते हैं। समय छात्र जीवन में एक चुनौती है इसे स्वीकारना एवं उपयोग करना ही जीवन का लक्ष्य है इसलिए छात्र कैसे महसूस करे अपने समय को उनका बहुमूल्य क्षण कहाँ चला जाता है इसके लिए में एक तालिका प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप तालिका को भर के अपने कीमती समय को जाने कि आपका कीमती समय कहा बर्बाद हो रहा।

तालिका में आप देख रहे हैं कि 24 घण्टे में से 7 घण्टे सोंए , 7 घण्टे स्कूल , 2 घण्टे कोचिंग , 2 घण्टे सेल्फ स्टडी , डेली नीड में 2 घण्टे लगे। दिन भर के 24 में से अपने जब तालिका भरी तब पाया कि आप सिर्फ 20 घंटे ही सही उपयोग कर पाये। और 4 घण्टे का सही उपयोग नहीं किया, जिसका हिसाब भी याद नहीं आ रहा।

सर्वप्रथम में छात्रों से निवेदन करता हूँ कि आप इस तालिका को भरें, फिर प्रत्येक सप्ताह आंकलन करें कि एक सप्ताह में कितना समय बर्बाद हो रहा। माना कि एक सप्ताह में कुल 25 घण्टे बर्बाद हुए। यदि आप इसे सही उपयोग करते तो क्या कर सकते थे ये प्रश्न अपने मन से पूछे और दृढं संकल्प करें की नेक्स्ट सप्ताह से बर्बाद समय को कम करना है। इस प्रकार छात्र अपने जीवन में समय पर कन्ट्रोल कर सकते हैं ओर धीरे -धीरे प्रत्येक क्षण को बर्बाद होने से बचा सकते हे।

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8. संतोष का धन - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


पंडित श्री रामनाथ शहर के बाहर अपनी पत्नी के साथ रहते थे | एक जब वो अपने विद्यार्थिओं को पढ़ाने के लिए जा रहे थे तो उनकी पत्नी ने उनसे सवाल किया ” कि आज घर में खाना कैसे बनेगा क्योंकि घर में केवल मात्र एक मुठी चावल भर ही है ?” पंडित जी ने पत्नी की और एक नजर से देखा फिर बिना किसी जवाब के वो घर से चल दिए |

शाम को वो जब वापिस लौट कर आये तो भोजन के समय थाली में कुछ उबले हुई चावल और पत्तियां देखी | यह देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा ” भद्रे ये स्वादिष्ट शाक जो है वो किस चीज़ से बना है ??”  मेने जब सुबह आपके जाते समय आपसे भोजन के विषय में पूछा था तो आपकी दृष्टि इमली के पेड़ की तरफ गयी थी | मैंने उसी के पतों से यह शाक बनाया है | पंडित जी ने बड़ी निश्चितता के साथ कहा अगर इमली के पत्तो का शाक इतना स्वादिष्ट होता है फिर तो हमे चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है अब तो हमे भोजन की कोई चिंता ही नहीं रही |

जब नगर के राजा को पंडित जी की गरीबी का पता चला तो राजा ने पंडित को नगर में आकर रहने का प्रस्ताव दिया किन्तु पंडित ने मना कर दिया | तो राजा हैरान हो गया और स्वयं जाकर उनकी कुटिया में उनसे मिलकर इसका कारण जानने की इच्छा हुई | राजा उनकी कुटिया में गया तो राजा ने काफी देर इधर उधर की बाते की लेकिन वो असमंजस में था कि अपनी बात किस तरह से पूछे लेकिन फिर उसने हिम्मत कर पंडित जी से पूछ ही लिया कि आपको किसी चीज़ का कोई अभाव तो नहीं है न ??

पंडित जी हसकर बोले यह तो मेरी पत्नी ही जाने इस पर राजा पत्नी की और आमुख हुए और उनसे वही सवाल किया तो पंडित जी की पत्नी ने जवाब दिया कि अभी मुझे किसी भी तरीके का अभाव नहीं है क्योंकि मेरे पहनने के वस्त्र इतने नहीं फटे कि वो पहने न जा सकते और पानी का मटका भी तनिक नहीं फूटा कि उसमे पानी नहीं आ सके और इसके बाद मेरे हाथों की चूडिया जब तक है मुझे किसी चीज़ का क्या अभाव हो सकता है ?? और फिर सीमित  साधनों में भी संतोष की अनुभूति हो तो जीवन आनंदमय हो जाता है |

राजा बड़ी श्रद्धा से उस देवी के सामने झुक गये |



9. ए बी सी डी : रोचक जानकारी क्या आप जानते हैं - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya



A B C D के बारे में आश्चर्यजनक जानकारियाँ, Interesting Facts जो आप नहीं जानते होंगे। ऐसी ही कुछ शानदार तथ्य Amazing Facts इस पोस्ट में लिखे गए हैं।

* 1 से 99 तक की स्पेलिंग में कहीं भी a, b, c, d का उपयोग नहीं होता है।

* d का प्रयोग पहली बार ‘Hundred’ में होता है।

* 1 से 999 तक की स्पेलिंग में कही भी a, b, c का उपयोग नहीं होता है।

* a का प्रयोग पहली बार ‘Thousand’ में होता है।

* 1 से 999,999,999 तक की स्पेलिंग में कही भी b, c का उपयोग नहीं होता है।

* b का प्रयोग पहली बार ‘Billion’ में होता है।

* c का प्रयोग इंग्लिश काउंटिंग में कहीं भी नहीं होता….।



10. साहूकार का बटुआ - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                   एक बार एक ग्रामीण साहूकार का बटुआ खो गया। उसने घोषणा की कि जो भी उसका बटुआ लौटाएगा, उसे सौ रूपए का इनाम दिया जाएगा। बटुआ एक गरीब किसान के हाथ लगा था। उसमें एक हजार रूपए थे। किसान बहुत ईमानदार था। उसने साहूकार के पास जाकर बटुआ उसे लौटा दिया।

                  साहूकार ने बटुआ खोलकर पैसे गिने। उसमे पूरे एक हजार रूपये थे। अब किसान को इनाम के सौ रूपए देने मे साहूकार आगापीछा करने लगा। उसने किसान से कहा, "वाह! तू तो बड़ा होशियार निकला! इनाम की रकम तूने पहले ही निकाल ली।"

                   यह सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया। उसने साहूकार से पूछा, "सेठजी, आप कहना क्या चाहते हैं?"

                   साहूकार ने कहा, "मैं क्या कह रहा हूँ, तुम अच्छी तरह जानते हो। इस बटुए में ग्यारह सौ रूपए थे। पर अब इसमें केवल एक हजार रूपये ही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि इनाम के सौ रूपए तुमने इसमें से पहले ही निकाल लिये हैं।"

                   किसान ने कहा, "मैंने तुम्हारे बटुए में से एक पैसा भी नहीं निकाला है। चलो, सरपंच के पास चलते हैं, वहीं फैसला हो जाएगा।"

                   फिर वे दोनों सरपंच के पास गए। सरपंच ने उन दोनों की बातें सुनीं। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि साहूकार बेईमानी कर रहा है।

सरपंच ने साहूकार से कहा, "आपको पूरा यकीन है कि बटुए में ग्यारह सौ रूपए थे?"
साहूकार ने कहा, "हाँ हाँ, मुझे पूरा यकीन है।"
सरपंच ने जवाब दिया, "तो फिर यह बटुआ आपका नहीं है।"
और सरपंच ने बटुआ उस गरीब किसान को दे दिया।

शिक्षा -झूठ बोलने की भारी सजा भुगतनी पड़ती है। 




11.एकता का बल - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                  एक किसान था। उसके पाँच बेटे थे। सभी बलवान और मेहनती थे। पर वे हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। किसान यह देख कर बहुत चिंतित रहा करता था। वह चाहता था कि उसके बेटे आपस में लड़ाई-झगड़ा न करें और मेलजोल से रहें। किसान ने अपने बेटों को बहुत समझाया और डाँटा-फटकारा भी, पर उनपर इसका कोई असर नहीं हुआ।

                  किसान को हमेशा यही चिंता सताती रहती कि वह अपने बेटों में एकता कैसे कायम करे! एक दिन उसे अपनी समस्या का एक उपाय सूझा। उसने अपने पाँचों बेटों को बुलाया। उन्हें लकडि़यों का एक गट्ठर दिखाकर उसने पूछाँ, "क्या तुममें से कोई इस गट्ठर को खोले बिना तोड़ सकता है?"

                  किसान के पाँचों बेटे बारी-बारी से आगे आए। उन्होंने खूब ताकत लगाई। पर उनमें से कोई भी लकडि़यों का गट्ठर तोड़ नही सका।
फिर किसान ने गट्ठर खोलकर लकडि़यों को अलग-अलग कर दिया। उसने अपने बेटों को एक-एक लकड़ी देकर उसे तोड़ने के लिए कहा। सभी लड़कों ने बहुत आसानी से अपनी-अपनी लकडी तोड़ डाली।

                  किसान ने कहा,"देखा! एक-एक लकड़ी को तोड़ना कितना आसान होता है। इन्हीं लकडि़यों को एक साथ गट्ठर में बाँध देने पर ये कितनी मजबूत हो जाती हैं। इसी तरह तुम लोग मिल-जुल कर एक साथ रहोगे, तो मजबूत बनोगे और लड़ झगड़कर अलग-अलग हो जाओगे, तो कमजोर बनोगे।"

Moral -एकता में ही शक्ति है, फूट में ही है विनाश।



12. हँसमुख सरदार - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                    बहुत दिनों की बात है। एक बहादुर सरदार था। उसने अनेक लड़ाइयाँ लड़ी थीं और उनमें अपनी असाधारण वीरता का परिचय दिया था। वह एक मँजा हुआ तलवारबाज और कलाबाज घुड़सवार था। इतना ही नहीं, वह दिल का भी बहुत उदार था। वह सदा गरीबों और जरूरतमंद लोगों की सहायता किया करता था। असहाय लोगों की रक्षा करना वह अपना कर्तव्य समझता था। लोग उसे सच्चे दिल से प्यार करते थे। वे उसकी अच्छाइयों का गुणगान करते और उसका बहुत सम्मान करते थे। 

                   पर इस सरदार के बारे में एक रहस्य की बात थी, जो किसी को मालूम नहीं थी। यहाँ तक की उसके घनिष्ठ मित्रों तक को भी इसका पता नहीं था। सरदार बिल्कुल गंजा था। अपने गंजेपन को छिपाने के लिए वह बालों की टोपी पहना करता था। यह टोपी उसके सिर पर इस प्रकार बैठ जाती थी कि उसके गंजेपन के बारे में किसी को रंचमात्र भी शंका नहीं होती थी।
एक बार सरदार अपने कुछ मित्रों के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। वे अपने घोड़ों को सरपट दौड़ाते जा रहे थे कि तभी अकस्मात बड़े जोरो की आँधी आई और सरदार की बालों की टोपी उड़कर दूर जा गिरी। सरदार के गंजेपन का रहस्य खुल गया।

                   सरदार के मित्र उसकी गंजी खोपड़ी देखकर दंग रह गए। उन्हें सपने में भी यह ख्याल नहीं था कि उनका हँसमुख सरदार गंजा है। वे ठठाकर हँस पड़े। उन्होंने कहा, "वाह, आपका सिर तो अंडे़ की तरह सफाचट है। आप हमेशा अपने आप को जवान साबित करते रहे और हमें बेवकूफ बनाते रहे!"

                   "हाँ, मैं हमेशा अपना गंजापन छिपाने का प्रयास करता रहा। पर मुझे मालूम था कि एक दिन मेरा यह राज खुलकर रहेगा। जब मेरे अपने बालों ने मेरा साथ नहीं दिया तो दूसरों के बाल मेरे सिरपर सदा के लिए कैसे रह सकते हैं?" यह कहकर सरदार हो, हो करता हुआ खिलखिलाकर हँस पड़ा।

                     जब सरदार के मित्रों ने देखा कि वह स्वयं अपने आपपर हँस रहा है, तो वे उस पर हँसने के कारण बहुत शर्मिंदा हुए। उन्होंने सरदार से कहा, "सरदार, आप वाकई बहुत दिलदार हैं।"

Moral -जो अपने पर हँस सकता है, वह कभी हँसी का पात्र नहीं बन सकता।



13.बाजीराव पेशवा और किसान - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


               बाजीराव पेशवा मराठा-सेना के प्रधान सेनापति थे। एक बार वे अनेक लड़ाइयों मे विजय हासिल करके अपनी सेना सहित राजधानी लौट रहे थे। रास्ते में उन्होंने मालवा में अपनी सेना का पड़ाव डाला। बहुत दूर से चलते-चलते आ रहे उनके सैनिक थककर चूर हो गए थे। वे भूख-प्यास से व्याकुल थे और उनके पास खाने के लिए पर्याप्त सामग्री भी नहीं थी।
बाजीराव ने अपने एक सरदार को बुलाकर आदेश दिया, तुम अपने साथ सौ सैनिकों को लेकर जाओ और किसी खेत से फसल कटवाकर छावनी में ले आओ।

              सरदार सेना की एक टुकड़ी लेकर गाँव की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे एक किसान दिखाई दिया। सरदार ने उससे कहा, देखो, तुम मुझे इस इलाके के सबसे बड़े खेतपर ले चलो। किसान उन्हें एक बहुत बड़े खेत के पास ले गया। सरदार ने सैनिकों को आदेश दिया, सारी फसल काट लो और अपने-अपने बोरों में भर लो।

             यह सुनकर किसान चकरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, महाराज, आप इस खेत की फसल न काटें। मैं आपको एक दूसरे खेतपर ले चलता हूँ। उस खेत की फसल पककर एकदम तैयार है।

             सरदार और उसके सैनिक किसान के साथ दूसरे खेत की ओर चल पड़े। यह खेत वहाँ से कुछ मीलों की दूरी पर और बहुत छोटा था। किसान ने कहा, महाराज, आपको जितनी फसल चाहिए, इस खेत से कटवा लीजिए।

              सरदार को किसान की इस हरकत पर बहुत गुस्सा आया। उसने किसान से पूछा, यह खेत तो बहुत छोटा हैं। फिर तुम हमें वहाँ से इतनी दूर क्यों ले आए?
किसान ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया, महाराज, नाराज मत होइए। वह खेत मेरा नहीं था। यह खेत मेरा है। इसीलिए मैं आपको यहाँ ले आया।

              किसान के जवाब से सरदार का गुस्सा ठंड़ा हो गया। वह अनाज कटवाए बिना ही पेशवा के पास पहुँचा। उसने यह बात पेशवा को बताई। पेशवा को अपनी गलती का एहसास हो गया। वे सरदार के साथ स्वयं किसान के खेत पर गए। उन्होंने किसान को उसकी फसल के बदले ढेर सारी अशरफियाँ दीं और फसल कटवाकर छावनी पर ले आए।

Moral  -नम्रता का परिणाम हमेशा अच्छा होता है।



14. चतुर बीरबल - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                        एक दिन अमीर आदमी बीरबल के पास आया। उसने बीरबल से कहा, "मेरे यहाँ सात नौकर हैं। उनमे से किसी ने मोतियो से भरा मेरा बटुआ चुरा लिया है। कृपया आप मेरी मदद कीजिए। और उस चोर को खोज निकालिए।"

                       बीरबल उस अमीर के घर गए। उन्होने सातो नौकरो को एक कमरे मे बुलाकर कहा, "देखो! मेरे पास सात जादुई छडि़याँ है। इस समय इन सभी छडि़यो की लम्बाई समान है। मैं तुममे से हर एक को एक एक छड़ी देता हूँ। तुममे से जिसने चोरी की होगी उसकी छड़ी बढ़ जाएगी।" 

                       जिस नौकर ने बटुआ चुराया था वह बीरबल की बात सुनकर बहुत भयभीत हो गया। उसने सोचा! "मैं अपनी छड़ी काटकर एक इंच छोटी कर देता हूँ। तो बच जाऊँगा!" अंत में उसने अपनी छड़ी काटकर एक इंच छोटी कर दी अगले दिन बीरबल ने एक एक कर सातो नौकरो की छडि़याँ देखी। उनमे से एक की छड़ी एक इंच छोटी थी बीरबल उसकी ओर उगँली से इशारा करते हुए बोले, ये रहा चोर! यह सुनते ही उस नौकर ने अपना अपराध स्वीकार किया उसने मोतियों से भरा बटुआ अपने मालिक को लौटा दिया। फिर उसे जेल भेज दिया गया।गया।



15. सम्राट और बूढ़ा आदमी - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                      जापान के एक सम्राट के पास बीस सुंदर फूलदानियों का एक दुर्लभ संग्रह था। सम्राट को अपने इस निराले संग्रह पर बड़ा अभिमान था। एक बार सम्राट के एक सरदार से अकस्मात एक फूलदानी टूट गई इससे सम्राट को बहुत गुस्सा आया उसने सरदार को फाँसी का आदेश दे दिया। पर एक बूढ़े ब्यक्ति को इस बात का पता चला वह सम्राट के दरबार में हाजिर हुआ। और बोला, "मै टूटी हुई फूलदानी जोड़ लेता हूँ मै उसे इस तरह जोड़ दूगाँ कि वह पहले जैसी दिखाई देगी।" बूढ़े की बात सुनकर सम्राट बड़ा खुश हुआ। उसने बूढ़े को बची हुई फूलदानियो को दिखाते हुए कहा, "ये कुल उन्नीस फूलदानियाँ है। टूटी हुई फूलदानी इसी समूह की है। अगर तुमने टूटी हुई फूलदानी जोड़ दी तो मैं तुम्हे मुँह माँगा इनाम दूँगा।" सम्राट की बात सुनते हुए बूढ़े ने लाठी उठाई और तड़ातड़ सभी फूलदानियाँ तोड़ दी। 

                      यह देखकर सम्राट गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, "बेवकूफ तूने यह क्या किया। बूढ़े आदमी ने सहजभाव से उत्तर दिया। महाराज मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। इनमे से हर फूलदानी के पीछे एक आदमी की जान जानेवाली थी। मगर आप केवल एक आदमी की जान ले सकते हैं। सिर्फ मेरी!"

                    बूढ़े आदमी की चतुराई और हिम्मत देखकर सम्राट प्रसन्न हो गया। उसने बूढ़े आदमी और अपने सरदार दोनो को माफ कर दिया।

Moral : - बुराई से लड़ने के लिए एक ही साहसी व्यक्ति काफी होता है।



16. भेडि़या और बाँसुरी - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


               एक भेडि़या था। एक बार वह भेड़ों के झुंड़ से एक मेमने को उठा लाया। उसे लेकर वह जंगल की ओर जा रहा था कि मेमने ने कहा,” भेडि़ए चाचा, मैं जानता हूँ कि आप मुझे खा जाओगे। पर मुझे खाने से पहले क्या आप मेरी आखिरी इच्छा पूरी करोगे?“ 
क्या है तेरी आखिरी इच्छा? भेडि़ए ने पूछा।

                मेमने ने कहा, चाचा, मुझे पता है, आप बाँसुरी बहुत अच्छी बजाते हो। मुझे बाँसुरी की धुन बहुत अच्छी लगती है। इसलिए मुझे मारने के पहले कृपा करके बाँसुरी की धुन तो सुना दो!
भेडि़या बैठ गया और उसने बाँसुरी बजाना शुरु कर दिया। थोडी़ देर के बाद जब भेडि़ए ने बाँसुरी बजाना बंद किया तो मेमने ने उसकी तारीफ करते हुए कहा, वाह! वाह! बहुत सुंदर! चाचा आप तो उस गड़रिए से भी अच्छी बाँसुरी बजाते हो। इतनी सुरीली बाँसुरी कोई भी नहीं बजा सकता। चाचा, एक बार फिर बजाओ न!

                 मेमने की बातें सुनकर भेडि़या फूलकर कुप्पा हो गया। इस बार वह और जोश में आकर पहले की अपेक्षा ज्यादा ऊँचे सुर में बाँसुरी बजाने लगा। 
इस बार बाँसुरी के स्वर गड़रिए और उसके शिकारी कुत्तों के कानों में पड़े। गड़रिया अपने शिकारी कुत्तों के साथ दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा। शिकारी कुत्तों नें भेडि़ए को धर दबोचा और उसका काम तमाम कर दिया। मेंमना भागता हुआ भेड़ों के झुंड़ में जा मिला।

Moral -धीरज और सूझबूझ से ही हम संकट को पार कर सकते हैं।



17. बिल्ली और लोमड़ी - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


             एक बार एक बिल्ली और एक लोमड़ी शिकारी कुत्तों के बारे में चर्चा कर रही थीं। 
मुझे तो इन शिकारी कुत्तों से नफरत हो गयी है। लोमड़ी ने कहा।श्
मुझे भी, बिल्ली बोली। मानती हूँ कि ये बहुत तेज दौड़ते है, लोमड़ी नें कहा, पर मुझे पकड़ पाना इनके बस की बात नहीं। मैं इन कुत्तों से बचकर दूर निकल जाने के कई तरीके जानती हूँ।
कौन-कौन से तरीके जानती हो तुम? बिल्ली ने पूछा। 
कई तरीके हैं, शेखी बघारते हुए लोमड़ी ने कहा, कभी मैं काँटेदार झाडि़यों में से होकर दौड़ती हूँ। कभी घनी झाडि़यों में छिप जाती हूँ। कभी किसी माँद में घुस जाती हूँ। इन कुत्तों से बचनें के अनेक तरीको में से ये तो कुछ ही हैं।

               मेरे पास तो सिर्फ एक ही अच्छा तरीका हैं, बिल्ली ने कहा।
ओह! बहुत दुःख की बात है। केवल एक ही तरीका? खैर, मुझे भी तो बताओ वह तरीका? लोमड़ी ने कहा।
बताना क्या है, अब मैं उस तरीके पर अमल करनें जा रही हूँ। उधर देखो, शिकारी कुत्ते दौड़ते हुए आ रहे हैं। यह कहते हुए बिल्ली कूदकर एक पेड़ पर चढ़ गई। अब कुत्ते उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे।

               शिकारी कुत्तों ने लोमडी़ का पीछा करना शुरु कर दिया। वह कुत्तों से बचने के लिए एक-एक कर कई तरीके आजमाती रही।फिर भी वह उनसे बच नहीं सकी। अंत में शिकारी कुत्तों ने उसे धर दबोचा और मार ड़ाला। 

                बिल्ली लोमड़ी पर तरस खाती हुई मन-ही-मन बोली, ओह बेचारी लोमड़ी मारी गई। इसकी अनेक तरकीबों की अपेक्षा, मेरी एक ही तरकीब कितनी अच्छी रही!

Moral  -अनेक तरकीबे आजमानें की बजाय एक ही सधी हुई तरकीब पर भरोसा करना चाहिए।



18.पहाड़ और चूहा - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


               एक बार पहाड़ और चूहे में बहस छिड़ गई। दोनों अपनी-अपनी बहादुरी की ड़ींग हाँकने लगे।
पहाड़ ने कहा, "तुम बहुत ही असहाय और तुच्छ प्राणी हो!"
चूहे ने जवाब दिया, मुझे पता है, मैं तुम्हारे जितना बड़ा नहीं हूँ। पर एक बात है तुम भी तो मेरे जितने छोटे नहीं हो।
पहाड़ ने कहा, "इससे क्या हुआ? बड़े कद के बड़े फायदे हैं। मैं आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को भी रोक सकता हूँ।"
चूहे़ ने कहा, "तुम आकाश के बादलों को जरुर रोक सकते हो। पर मैं अपनें नन्हे-नन्हे दाँतों से तुम्हारी जड़ में बड़े-बड़े बिल खोद ड़ालता हूँ। लेकिन तुम मुझे रोक नहीं सकते। बोलो, क्या रोक सकते हो?

              नन्हे चूहे़ ने अपनी चतुराई से पहाड़ का मुँह बंद कर दिया।

Moral  -छोटा हो या बड़ा, अपनी-अपनी जगह सब महत्वपूर्ण होते हैं।



19. बदसूरत ऊँट - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                    एक ऊँट था। दूसरों की निंदा करने की उसकी बुरी आदत थी। वह हमेशा दूसरे जानवरों व चिडि़यों की शक्ल-सूरत की खिल्ली उड़ाता रहता था। उसके मुँह से कभी किसी जानवर की तारीफ नही निकलती थी।

                   गाय से वह कहता, "जरा अपनी शक्ल तो देखो! कितनी बदसूरत हो तुम! हड्डियो का ढ़ाँचा मात्र है तुम्हारा शरीर। लगता है तुम्हारी हड्डियाँ खाल फाड़कर किसी भी क्षण बाहर निकल आएँगी।"
भैंस से वह कहता, "तुमनें तो विधाता के साथ जरुर कोई शैतानी की होगी! तभी तो उसने तुझे काली-कलूटी बनाया है। तुम्हारे टेढ़े-मेढ़े सींग तुम्हें और भी बद्सूरत बना देते है।"

                  हाथी को चिढ़ाता हुआ वह कहता, "तुम तो सभी जानवरों में कार्टून जैसे दिखते हो। विधाता ने मजाक के क्षणो में तुम्हे बनाया होगा। तुम्हारे शरीर के अंगों में किसी प्रकार का संतुलन नहीं है। तुम्हारा शरीर कितना विशाल है और पूँछ कितनी छोटी! तुम्हारी आँखें कितनी छोटी हैं और कान इतने बड़े सूप जैसे। तुम्हारी सूँड़, पैर और शरीर के अन्य अंगों के बारे में तो मैं बस चुप रहूँ, यही ठीक रहेगा।"
तोते से वह कहता, "तुम्हारी टेढ़ी और लाल रंग की चोंच बनाकर विधाता ने वाकई तुम्हारे साथ मजाक किया है।"

                  इस तरह ऊँट हमेशा हर जानवर की खिल्ली उडा़ता रहता था। 

                 एक बार ऊँट की मुलाकात एक लोमड़ी से हो गई। वह बड़ी ही मुँहफट थी और किसी को भी खरी बात सुनानें से नही हिचकती थी। ऊँट उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलना शुरु करे, इसके पहले ही लोमड़ी नें कहा, "अरे ऊँट, तू लोगों के बारे में उल्टी-सीधी बातें करने की अपनी गंदी आदत छोड़ दे। जरा अपनी शक्ल-सूरत तो देख। तुम्हारा लंबा चेहरा, पत्थर जैसी तुम्हारी आँखें, पीले-पीले गंदे दाँत, टेढ़े-मेढ़े भद्दे पैर और तुम्हारी पीठ पर यह भद्दा सा कूबड़। सभी जानवरों में सबसे बदसूरत तू ही है। दूसरे जानवरो में तो एक-दो खामियाँ है। पर तुम में तो बस खामियाँ ही खामियाँ हैं।" 
लोमड़ी की खरी-खरी बात सुनकर ऊँट का सिर शर्म से झुक गया। वह चुपचाप वहाँ से खिसक गया।

Moral  -दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने के पहले अपनी कमियों पर नजर ड़ालिए।



20. खरगोश और उसके मित्र - Bachchon Ki Nayi Hindi Kahaniya


                      एक खरगोश था। उसके अनेक मित्र थे। वह हमेशा अपने मित्रों से मिलता और उनके साथ गपशप भी करता। हौके-मौके वह उनकी मद्द भी करता। मगर एक दिन खरगोश खुद संकट में पड़ गया। कुछ शिकारी कुत्ते उसका पीछा करने लगे। यह देखकर खरगोश जान बचाने के लिए सरपट भागने लगा।

                      भागते-भागते खरगोश का दम फूलने लगा। वह थककर चूर हो गया। मौका देखकर वह एक घनी झाड़ी में घुस गया और वहीं छिपकर बैठ गया। पर उसे यह ड़र सता रहा था कि कुत्ते किसी भी क्षण वहाँ आ पहुँचेंगे और सूँघते-सूँघते उसे ढूँढ़ निकालेंगे। वह समझ गया कि यदि समय पर उसका कोई मित्र न पहुँच सका, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।
तभी उसकी नजर अपने मित्र घोड़े पर पड़ी। वह रास्ते पर तेजी से दौड़ता हुआ जा रहा था।

                       खरगोश नें घोड़े को बुलाया तो घोड़ा रुक गया। उसने घोड़े से प्रार्थना की, "घोड़े भाई, कुछ शिकारी कुत्ते मेरे पीछे पड़े हुए हैं। कृपया मुझे अपनी पीठ पर बिठा लो और कहीं दूर ले चलो। अन्यथा ये शिकारी कुत्ते मुझे मार ड़ालेगे।
घोड़े नें कहा, "प्यारे भाई! मैं तुम्हारी मद्द तो जरुर करता, पर इस समय मैं बहुत जल्दी में हूँ। वह देखो तुम्हारा मित्र बैल इधर ही आ रहा है। तुम उससे कहो। वह जरुर तुम्हारी मद्द करेगा।" यह कहकर घोड़ा तेजी से सरपट दौड़ता हुआ चला गया।

                       खरगोश ने बैल से प्रार्थना की, "बैल दादा, कुछ शिकारी कुत्ते मेरा पीछा कर रहे हैं। कृपया आप मुझे अपनी पीठ पर बिठा ले और कहीं दूर ले चले। नहीं तो कुत्ते मुझे मार ड़ालेंगें।"
बैल ने जवाब दिया,"भाई खरगोश! मैं तुम्हारी मद्द जरुर करता। पर इस समय मेरे कुछ दोस्त बड़ी बेचैनी से मेरा इंतजार कर रहे होंगे। इसलिए मुझे वहाँ जल्दी पहुँचना है। देखो, तुम्हारा मित्र बकरा इधर ही आ रहा है। उससे कहो, वह जरुर तुम्हारी मद्द करेगा। यह कहकर बैल भी चला गया।"

                     खरगोश ने बकरे से विनती की, "बकरे चाचा, कुछ शिकारी कुत्ते मेरा पीछा कर रहे हैं। तुम मुझें अपनी पीठ पर बिठाकर कहीं दूर ले चलो, तो मेरे प्राण बच जाएँगे। वरना वे मुझे मार ड़ालेंगे।"
बकरे ने कहा, "बेटा, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर दूर तो ले जाऊँ, पर मेरी पीठ खुरदरी है। उस पर बैठने से तुम्हारे कोमल शरीर को बहूत तकलीफ होगी। मगर चिंता न करो। देखो, तुम्हारी दोस्त भेड़ इधर ही आ रही है। उससे कहोगे तो वह जरुर तुम्हारी मद्द करेगी।" यह कहकर बकरा भी चलता बना।

                     खरगोश ने भेड़ से भी मद्द की याचना की, पर उसने भी खरगोश से बहाना करके अपना पिंड़ छुड़ा लिया।
इस तरह खरगोश के अनेक पुराने मित्र वहाँ से गुजरे। खरगोश ने सभी से मद्द करने की प्रार्थना की, पर किसी ने उसकी मद्द नहीं की। सभी कोई न कोई बहाना कर चलते बने। खरगोश के सभी मित्रो ने उसे उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। 

                     खरगोश ने मन-ही-मन कहा, अच्छे दिनों में मेरे अनेक मित्र थे। पर आज संकट के समय कोई मित्र काम नहीं आया। मेरे सभी मित्र केवल अच्छे दिन के ही साथी थे।
थोड़ी देर में शिकारी कुत्ते आ पहुँचे। उन्होंने बेचारे खरगोश को मार ड़ाला। अफसोस की बात है कि इतने सारे मित्र होते हुए भी खरगोश बेमौत मारा गया।

Moral -स्वार्थी मित्र पर विश्वास करने से सर्वनाश ही होता है।


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