. . . Acche Acche Kahani | अच्छे - अच्छे कहानिया हिन्दी में

Acche Acche Kahani | अच्छे - अच्छे कहानिया हिन्दी में

Acche Acche Kahani


Today I am sharing this blog of  Acche Acche Kahani   with all of you, which is quite valuable for every child. These moral stories will help a lot in understanding the society of children, so that they can become a good person. If you like this story, then do share it with other people.


मै आप सभी से नैतिक कहानियों का  यह  ब्लॉग साझा कर रहा हु जो काफी मुल्यवान है, |यह नैतिक कहानिए बच्चों के समाज को समझने मे काफी मदद करेगा ,जिससे वह एक अच्छा इंसान बन सके |अगर आपको यह कहानिया अच्छी लगे तो अन्य लोगों से जरूर साझा करे 


1.चोर चोरी से जाये हेरा फेरी से न जाये - Acche Acche Kahani 


एक जंगल की राह से एक जौहरी गुजर रहा था। देखा उसने राह में। एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चला आ रहा है। चकित हुआ। ये देखकर कि ये कितना मूर्ख है। क्या इसे पता नहीं है कि ये लाखों का हीरा है। और गधे के गले में सजाने के लिए बाँध रखा है। पूछा उसने कुम्हार से। सुनो ये पत्थर जो तुम गधे के गले में बांधे हो। इसके कितने पैसे लोगे ? कुम्हार ने कहा - महाराज ! इसके क्या दाम। पर चलो। आप इसके आठ आने दे दो। हमनें तो ऐसे ही बाँध दिया था कि गधे का गला सूना न लगे। बच्चों के लिए आठ आने की मिठाई गधे की ओर से ल जाएँगे। बच्चे भी खुश हो जायेंगे। और शायद गधा भी कि उसके गले का बोझ कम हो गया है।पर जौहरी तो जौहरी ही था। पक्का बनिया। उसे लोभ पकड़ गया। उसने कहा आठ आने तो थोड़े ज्यादा है। तू इसके चार आने ले ले।

कुम्हार भी थोड़ा झक्की था। वह ज़िद पकड़ गया कि नहीं देने हो तो आठ आने दो। नहीं देने है। तो कम से कम छह आने तो दे ही दो। नहीं तो हम नहीं बेचेंगे। जौहरी ने कहा - पत्थर ही तो है।चार आने कोई कम तो नहीं। उसने सोचा थोड़ी दूर चलने पर आवाज दे देगा। आगे चला गया। लेकिन आधा फरलांग चलने के बाद भी कुम्हार ने उसे आवाज न दी। तब उसे लगा। बात बिगड़ गई। नाहक छोड़ा। छह आने में ही ले लेता। तो ठीक था। जौहरी वापस लौटकर आया। लेकिन तब तक बाजी हाथ से जा चुकी थी। गधा खड़ा आराम कर रहा था। और कुम्हार अपने काम में लगा था।

जौहरी ने पूछा - क्या हुआ ? पत्थर कहां है ? कुम्हार ने हंसते हुए कहा - महाराज एक रूपया मिला है। उस पत्थर का। पूरा आठ आने का फायदा हुआ है। आपको छह आने में बेच देता। तो कितना घाटा होता। और अपने काम में लग गया।

पर जौहरी के तो माथे पर पसीना आ गया। उसका तो दिल बैठा जा रहा था।सोच सोच कर। हाय। लाखों का हीरा। यूं मेरी नादानी की वजह से हाथ से चला गया। उसने कुम्हार से कहा - मूर्ख! तू बिलकुल गधे का गधा ही रहा। जानता है। उसकी कीमत कितनी है। वह लाखों का था। और तूने एक रूपये में बेच दिया। मानो बहुत बड़ा खजाना तेरे हाथ लग गया।

उस कुम्हार ने कहा - हुजूर मैं अगर गधा न होता तो क्या इतना कीमती पत्थर गधे के गले में बाँध कर घूमता ? लेकिन आपके लिए क्या कहूं ? आप तो गधे के भी गधे निकले। आपको तो पता ही था कि लाखों का हीरा है। और आप उस के छह आने देने को तैयार नहीं थे। आप पत्थर की कीमत पर भी लेने को तैयार नहीं हुए।

यदि इन्सान को कोई वस्तु आधे दाम में भी मिले तो भी वो उसके लिए मोल भाव जरुर करेगा। क्योकि लालच हर इन्सान के दिल में होता है। कहते है न - चोर चोरी से जाये, हेरा फेरी से न जाये -। जौहरी ने अपने लालच के कारण अच्छा सौदा गँवा दिया।

धर्म का जिसे पता है उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है। जिन्हें पता नहीं है वे क्षमा के योग्य है। लेकिन जिन्हें पता है उनको क्या कहें ? 


2. धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का - Acche Acche Kahani 


एक बार कक्षा दस की हिंदी शिक्षिका अपने छात्र को मुहावरे सिखा रही थी। तभी कक्षा एक मुहावरे पर आ पहुँची “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का ”, इसका अर्थ किसी भी छात्र को समझ नहीं आ रहा था। इसीलिए अपने छात्र को और अच्छी तरह से समझाने के लिए शिक्षिका ने अपने छात्र को एक कहानी के रूप में उदाहरण देना उचित समझा।

उन्होंने अपने छात्र को कहानी कहना शुरू किया, ” कई साल पहले सज्जनपुर नामक नगर में राजू नाम का लड़का रहता था, वह एक बहुत ही अच्छा क्रिकेटर था। वह इतना अच्छा खिलाड़ी था कि उसमे भारतीय क्रिकेट टीम में होने की क्षमता थी। वह क्रिकेट तो खेलता पर उसे दूसरो के कामों में दखल अन्दाजी करना बहुत पसंद था। उसका मन दृढ़ नहीं था जो दूसरे लोग करते थे वह वही करता था। यह देखकर उसकी माँ ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि यह आदत उसे जीवन में कितनी भारी पड़ सकती है पर वह नहीं समझा। समय बीतता गया और उसका अपने काम के बजाय दूसरो के काम में दखल अन्दाजी करने की आदत ज्यादा हो गयी। जभी उससे क्रिकेट का अभ्यास होता था तभी उसके दूसरे दोस्तों को अलग खेलो का अभ्यास रहता था। उसका मन चंचल होने के कारण वह क्रिकेट के अभ्यास के लिए नहीं जाता था बल्कि दूसरे दोस्तों के साथ अन्य अलग-अलग खेल खेलने जाता था।

उसकी यह आदत उसका आगे बहुत ही भारी पड़ी, कुछ ही दिनों के बाद नगर में ऐलान किया गया नगर में सभी खेलों के लिए एक चयन होगा जिसमे जो भी चुना जाएगा उसे भारत के राष्ट्रीय दल में खेलने को मिल सकता है। सभी यह सुनकर बहुत ही खुश हुए ओर वहीं दिन से सभी अपने खेल में चुनने के लिए जी-जान से मेहनत करने लगे, सभी के पास सिर्फ दो दिन थे। राजू ने भी अपना अभ्यास शुरू किया पर पिछले कुछ दिनों से अपने खेल के अभ्यास में जाने की बजाय दूसरो के खेल के अभ्यास में जाने के कारण उसने अपने शानदार फॉर्म खो दिया था। दो दिन के बाद चयन का समय आया राजू ने खूब कोशिश की पर अभ्यास की कमी के कारण वह अपना शानदार प्रदर्शन नहीं दिखा पाया और उसका चयन नहीं हुआ, वह दूसरे खेलों में भी चयन न हुआ क्योंकि व़े सब खेल उसे सिर्फ थोड़ा आते थे ओर किसी भी खेल में वह माहिर नहीं था। जिसके कारण वह कोई भी खेल में चयन नहीं हुआ और उसके जो सभी दूसरे दोस्त थे उनका कोई न कोई खेल में चयन हो गया क्योंकि वे दिन रात मेहनत करते थे।अंत में राजू को अपने सिर पर हाथ रखकर बैठना पड़ा और वह धोबी के कुत्ते की तरह बन गया जो न घर का होता है न घाट का।”

इसी तरह इस कहानी के माध्यम से सभी बच्चों को इस मुहावरे का मतलब पता चल गया। शिक्षिका को अपने छात्रों को एक ही सन्देश पहुँचाना था कि व़े जीवन में जो कुछ भी करे सिर्फ उसी में ध्यान दे और दूसरो से विचिलित न हो वरना वह धोबी के कुत्ते की तरह बन जाएगे जो न घर का न घाट का होता है।


3. जो कुआँ खोदता है वही गिरता है - Acche Acche Kahani 


एक बादशाह के महल की चहारदीवारी के अन्दर एक वजीर और एक कारिंदा रहता था। वजीर और कारिंदे के पुत्र में गहरी दोस्ती थी। हम उम्र होने के कारण दोनों एक साथ पढ़ते, खेलते थे। वजीर के कहने पर कारिंदे का लड़का उसके सब काम कर देता था। वह वजीर को चाचा कहकर पुकारता था। बादशाह कारिंदे के पुत्र को बहुत प्रेम करता था। बादशाह के कोई संतान नहीं थी। इसलिए वे कारिंदे के पुत्र को अपने पुत्र के समान ही समझते थे। बादशाह ने उसे महल और दरबार में आने-जाने की पूरी छूट दे रखी थी। कारिंदे के पुत्र के प्रति बादशाह का प्रेम देखकर वजीर को बहुत ईर्ष्या होती थी। वजीर चाहता था कि बादशाह केवल उसके पुत्र को ही प्रेम करें। यदि बादशाह ने उसके पुत्र को गोद ले लिया तो बादशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ही राजगद्दी पर बैठेगा। वजीर की इच्छा के विपरीत बादशाह का प्रेम कारिंदे के पुत्र के प्रति बढ़ता ही गया। बादशाह वजीर के पुत्र को जरा भी पसंद नहीं करते थे। इसलिए वजीर कारिंदे और उसके पुत्र से मन-ही-मन ईर्ष्या करने लगा।

वजीर ने कारिंदे के पुत्र को मारने का निश्चय किया। वजीर ने कारिंदे के पुत्र को रुमाल और पैसे देकर गोश्त लाने के लिए कहा। वजीर ने कारिंदे के पुत्र को अच्छी तरह समझाया कि गोश्त बाजार में गली के नुक्कड़ वाली दुकान से ही लाना। कारिंदे का बेटा रुमाल और पैसे लेकर बाजार की ओर चल दिया। उसने देखा कि उसका मित्र वजीर का बेटा भी वहाँ पर खेल रहा है। वजीर के लड़के ने कारिंदे के पुत्र से कहा कि तुम मेरा दांव खेलो, मैं जाकर गोश्त ले आऊँगा। कारिंदे के पुत्र ने उसे पैसे और रुमाल देकर दुकान का पता बता दिया। इस प्रकार वजीर का पुत्र गोश्त लेने चला गया और कारिंदे का पुत्र दांव खेलने लगा। वजीर के पुत्र ने दुकानदार को पैसे और रुमाल देकर कहा कि इसमें गोश्त बाँध दो। कसाई ने रुमाल में बने हुए निशान को पहचान लिया। इस रुमाल को वजीर ने कसाई को दिखाते हुए कहा था कि जो लड़का इस रुमाल को लेकर गोश्त लेने आए तुम उसे मौत के घाट उतार देना। कारिंदे के पुत्र को मारने के लिए वजीर ने कसाई को पैसे भी दिए थे। कसाई ने अन्दर भट्ठी जलाकर सारी तैयारी पहले ही कर ली थी।

कसाई ने रुमाल और पैसे लेकर उस लड़के को वहाँ बैठने के लिए कहा और स्वयं अन्दर गोश्त लेने चला गया। तभी वहाँ पर लड़का भी चला गया। कसाई ने तुरंत उस लड़के को उठाकर जलती हुई भट्ठी में झोंक दिया। कारिंदे का पुत्र अपना दांव खेलकर अपने घर जा रहा था कि उसे रास्ते में वजीर मिल गया। कारिंदे के पुत्र ने पूछा―‘चाचा, भैया गोश्त ले आया?’ इतना सुनकर वजीर के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। तभी कारिंदे के पुत्र ने कहा ―'चाचा भैया ने मुझसे रुमाल और पैसे ले लिए थे और कहा कि तुम मेरा दांव खेल लो, मैं गोश्त लेकर घर चला जाऊँगा। मैंने भैया को दुकान का पता भी बता दिया था।' वजीर की आँखों के आगे अँधेरा छा गया और उसके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। अपने पुत्र को याद करता हुआ वजीर अपने घर चला गया। वजीर कह रहा था कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है उसमें स्वयं गिरता है।

Moral  :- इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए। साभार:- 'कहावतों की कहानियाँ'


4. कानून सबके के लिए बराबर है - Acche Acche Kahani 


शहंशाह बहुत न्यायप्रिय शासक थे। उन्होंने अपने महल के प्रवेशद्वार पर एक घंटा लगवा दिया था। जिसको भी शिकायत हो वह उस घंटे को बजा सकता था ताकि शहंशाह आवाज को सुनकर न्याय कर सकें। उनके राज्य में गरीब-अमीर, छोटे-बड़े सबसे साथ न्याय किया जाता था। शहंशाह की दृष्टि में कानून सबके लिए बराबर था। शहंशाह अपराधी को दंड और निर्दोष को क्षमा करके सबके साथ न्याय करते थे। कई लोग न्याय के लिए शहंशाह के दरबार में अपनी शिकायतें लेकर आते थे।

शहंशाह की पत्नी नूरजहाँ एक दिन धनुर्विद्या का अभ्यास कर रही थी। नूरजहाँ ने कुछ चुने हुए निशानों पर ही तीर चलाए। अभ्यास करते-करते एक तीर नूरजहाँ ने हवा में चलाते हुए नदी की तरफ चला दिया जो वहीँ कहीं गिर पड़ा। इसके बाद नूरजहाँ अपने महल लौट आई।

कुछ देर में महल के प्रवेशद्वार पर लगा हुआ घंटा जोर-जोर से बजने लगा। पहरेदार ने देखा कि एक धोबन सिसकियाँ लेकर रो रही थी। उसके पास जमीन पर एक मृत शरीर रखा था और उसके हाथ में खून से सना हुआ तीर था। पहरेदार उस धोबन को शहंशाह के पास ले गया। धोबन शहंशाह को सलाम करके इंसाफ की दुहाई देने लगी। उसने शहंशाह को तीर दिखाते हुए कहा ― 'हुजूर, इस तीर से किसी ने मेरे पति को मार डाला है, मुझे विधवा और मेरे बच्चों को अनाथ बना दिया है। अब मेरी और मेरे बच्चों की परवरिश कौन करेगा।' शहंशाह ने उस तीर को उठाकर देखा तो उस पर शाही मुहर लगी थी। शहंशाह समझ गए कि निश्चय ही इस दुःखद घटना को अंजाम किसी महल के ही व्यक्ति ने दिया है। उन्होंने पहरेदार को आदेश दिया ―जिस दिन यह घटना हुई उस दिन धनुर्विद्या का अभ्यास कौन कर रहा था ? राजा का आदेश पाकर पहरेदार महल में गया और सच्चाई जानकार कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला ― 'हुजूर, उस दिन बेगम साहिबा धनुर्विद्या का अभ्यास कर रही थीं।' शहंशाह ने तुरंत नूरजहाँ को दरबार में बुलाया। जैसे ही

नूरजहाँ दरबार में हाजिर हुई तो शहंशाह ने अपनी कमरबंद से छुरा निकालकर धोबन को देते हुए कहा ―'तुम नूरजहाँ की वजह से ही विधवा हुई हो, इसलिए तुम इस छुरे से मुझे मार कर नूरजहाँ को विधवा कर दो। ऐसा करने से तुम्हें न्याय जरुर मिलेगा।' शहंशाह का न्याय सुनकर धोबन बहुत लज्जित हुई और बोली ― 'हुजूर, आपकी हत्या करने से मेरा पति जीवित नहीं होगा। फिर मैं आपके जैसे न्यायप्रिय शहंशाह की हत्या करने का पाप कैसे कर सकती हूँ।' धोबन की बात सुनकर शहंशाह बहुत खुश हुए और राजकीय कोष से उसे आर्थिक सहायता प्रदान की। धोबन आर्थिक सहायता लेकर शहंशाह को धन्यवाद देती अपने घर चली गई।

धोबन के जाने के बाद नूरजहाँ ने शहंशाह से कहा ―'आपने तो सचमुच बहुत खतरा मोल ले लिया था। यदि वह महिला आपके आदेश का पालन कर देती तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता।' शहंशाह ने कहा ―'यदि मैं मर जाता तो उस महिला को इन्साफ मिल जाता। एक बात अवश्य याद रखना, कानून सबके लिए बराबर है।'

Moral ― इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा नहीं है बल्कि सब बराबर हैं।


5. बुरे का अंत बुरा - Acche Acche Kahani 


किसी जंगल में चार चोर रहते थे। वे चारों मिलकर चोरी करते और जो भी सामान उनके हाथ लगता उसे आपस में बराबर-बराबर बाँट लेते थे। वैसे तो वे चारों एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रकट करते थे, किन्तु मन-ही-मन एक-दूसरे से ईर्ष्या करते थे। वे चारों अपने मन में यही सोचते थे कि यदि किसी दिन मोटा माल मिल जाए तो वह अपने साथियों को मारकर सारा माल हड़प लेगा। चारों चोर मौके की तलाश में थे। किन्तु उन्हें ऐसा मौका अभी तक नहीं मिला था। चारों चोर बहुत ही दुष्ट और स्वार्थी प्रवृत्ति के थे।

एक रात चारों चोर चोरी की इच्छा में इधर-उधर घूम रहे थे। उन्होंने एक सेठ के घर में सेंध लगाई और घर के अन्दर घुसकर सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात, रूपया-पैसा सब कुछ लूटकर भाग गए। चारों चोर पुलिस से बचने के लिए दो दिन तक जंगल में भूखे-प्यासे भटकते रहे।

सेठ ने चोरी की शिकायत पुलिस में दर्ज करा दी थी। सेठ की पुलिस विभाग में भी अच्छी जान-पहचान थी। चोरों को पकड़ने के लिए शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस फैली हुई थी। जंगल से निकलना चोरों के लिए खतरे से खाली नहीं था। चोरों की इच्छा थी कि अभी वे कुछ दिन जंगल में छिपे रहें।

धीरे-धीरे चोरों के पास खाने-पीने का सामान समाप्त हो गया। कुछ दिन तक तो उन्होंने भूख बर्दाश्त की, लेकिन जब भूख बर्दाश्त करना असंभव हो गया तो उन्होंने शहर से खाना मंगवाने का निश्चय कर लिया।

आपस में सलाह करके दो चोर शहर चले गए ताकि वहाँ की स्थिति का पता लगा सकें और अपने साथियों के लिए भोजन भी ले आएँ। उन्होंने शहर जाकर भरपेट खाना खाया और खूब शराब पी। उसके बाद उन्होंने योजना बनाई कि वे अपने दोनों साथियों को मारकर सारा माल खुद हड़प लेंगे।

दोनों ने योजना को अंजाम देने के लिए खाने में जहर मिला दिया और जंगल की ओर लौटने लगे। दोनों चोर अपने-अपने मन में यही सोच रहे थे कि खाना खाकर जब वे दोनों मर जाएंगे तो मैं इसे भी मार दूँगा और सारा माल हड़प कर अमीर बन जाऊँगा।

उधर जंगल में उन दोनों चोरों ने खाना लेने गए हुए साथियों को मारने की योजना बना ली। वे भी उन्हें मारकर सारा धन हड़प लेना चाहते थे।

जब दोनों चोर शहर से खाना लेकर आए तो जंगल में ठहरे हुए चोरों ने अपने साथियों पर हमला कर दिया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। अपने साथियों की हत्या करके वे दोनों चोर आराम से खाना खाने बैठ गए। खाने में पहले से जहर मिला होने के कारण वे दोनों भी तड़प-तड़प कर मर गए। इसलिए कहते हैं कि बुरे का अंत हमेशा बुरा ही होता है।

Moral :- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को बुरे काम नहीं करने चाहिए क्योंकि बुरे का अंत बुरा ही होता है।


6. जिस की लाठी उस की भैंस -Acche Acche Kahani 


तो कहानी कुछ यों है कि एक ब्राह्मण को कहीं से यजमानी में एक भैंस मिली। उसे लेकर वह घर की ओर रवाना हुआ। सुनसान रास्ते में वह पैदल ही चला जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसके हाथ में मोटा डण्डा था और शरीर से भी वो अच्छा तगड़ा था। उसने ब्राह्मण को देखते ही कहा – “क्यों ब्राह्मण देवता, खूब दक्षिणा मिली लगती है, पर यह भैंस तो मेरे साथ जाएगी।“

ब्राह्मण ने झट कहा- “क्यों भाई?”

चोर बोला- “क्यों क्या? जो कह दिया सो करो। भैंस छोड़ कर चुपचाप यहाँ से चलते बनो, वरना लाठी देखी है, तुम्हारी खोपड़ी के टुकड़े- टुकड़े कर दूँगा।”

अब तो ब्राह्मण का गला सूख गया। हालाँकि शारीरिक बल में वह चोर से कम नहीं था। पर खाली हाथ वह करे भी तो क्या करे? विपरीत समय में बुद्धिबल काम आया। ब्राह्मण बोला- “ठीक है भाई, भैंस भले ही ले लो, पर ब्राह्मण की चीज यों छीन लेने से तुम्हें पाप लगेगा। बदले में कुछ देकर भैंस लेते तो पाप से बच जाते।”

चोर बोला- “यहाँ मेरे पास देने को धरा क्या है?” ब्राह्मण ने झट कहा- “और कुछ न सही, लाठी देकर भैंस का बदला कर लो।”

चोर ने खुश हो कर लाठी ब्राह्मण को पकडा दी और भैंस पर दोंनो हाथ रख कर खड़ा हो गया। तभी ब्राह्मण कड़क कर बोला- “चल हट भैंस के पास से, नहीं तो अभी खोपड़ी दो होती है।”

चोर ने पूछा-“ क्यों?”

ब्राह्मण बोला-“ क्यों क्या ? जिस की लाठी उस की भैंस।”

चोर को अपनी बेवकूफी समझ आ गयी और उसने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी। किसी ने सच ही कहा है कि जिसमें अक्ल है, उसमें ताकत है।

तो अब समझे कि यह कहावत यहीं से शुरू हुई, जिस की लाठी उस की भैंस।


7. सेर पर सवा सेर - Acche Acche Kahani 


एक बार अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए बहुत सारे खरगोश एक स्थान पर इकट्ठा हुए। एक खरगोश ने कहा-'हम सभी जीवों से अधिक सुन्दर हैं। हमें खूंखार जानवर, पशु-पक्षियों से हमेशा अपनी जान का खतरा बना रहता है। हमसे कोई भी नहीं डरता लेकिन हम सबसे डरते हैं। मनुष्य भी हमारा मांस खाने में कभी नहीं हिचकिचाते।हमें अपने जीवन का पल-पल खतरा बना रहता है।'

दूसरे खरगोश ने कहा-'हाथी तो हमारा मांस नहीं खाते, लेकिन उनका शरीर इतना बड़ा है कि सैकडों खरगोश भाई हाथी के पैरों के नीचे कुचल कर मर जाते हैं।

तीसरे खरगोश ने कहा-'भाइयो,इस संसार में केवल शक्तिशाली ही जीवित रह सकते हैं। हम जैसे दुर्बल

और छोटे जीवों का इस संसार में रहना बहुत मुश्किल है। मेरे विचार से तो हमारी समस्या का कोई समाधान नहीं है।'

सभी खरगोशों के निराशापूर्ण शब्द सुनकर एक बूढ़ा अनुभवी खरगोश बोला-'मैंने अपनी समस्या का हल खोज लिया है,जो हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकता है। हम सबको एक साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेनी चाहिए। मौत को गले लगाकर हम सारे दुःखों से मुक्ति पा सकते हैं।

बूढ़े खरगोश की बात सभी खरगोशों को बहुत पसंद आई। वे सब इकट्ठा होकर आत्महत्या करने के लिए एक नदी के किनारे चले गए। सभी खरगोशों में आत्महत्या करने की इतनी जल्दी थी कि वे सब आपस में झगड़ा करने लगे। खरगोशों को लड़ता देखकर नदी के किनारे बैठे सभी मेंढक बुरी तरह डर गए और जल्दी से पानी में कूद गए।

तभी बूढ़े खरगोश ने अपने साथियों को नदी में कूदने से रोक लिया और उन्हें समझाते हुए कहा-'भाइयो,हमें हिम्मत से काम लेना चाहिए और आत्महत्या का विचार छोड़कर अपने मन में जीने की इच्छा जाग्रत करनी चाहिए।हमें उन जीवों के बारे में भी सोचना चाहिए जो हमसे भी कमजोर हैं। हम से कमजोर जीव हमसे डरते हैं। इस संसार में हर प्राणी अपने से बड़े और शक्तिशाली से डरता है। इसीलिए तो कहते हैं कि सेर पर सवा सेर।'

Moral  - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि स्वयं को कभी भी कमजोर नहीं समझना चाहिए।


8. घमंडी का सिर नीचा - Acche Acche Kahani 


एक जंगल में बाँस का पेड़ और एक जामुन का पेड़ पास-पास थे। जामुन का पेड़ बाँस के पेड़ की अपेक्षा बहुत मजबूत था। बाँस का पेड़ बहुत पतला होने के साथ-साथ बहुत लचीला भी था। हवा का रुख जिस ओर होता बाँस का पेड़ उसी दिशा में झुक जाता था।

एक बार जामुन के पेड़ ने बाँस के पेड़ का उपहास करते हुए कहा―‛तुम तो हवा की आज्ञा का हमेशा ही पालन करते हो। हवा की गति और दिशा के अनुसार ही हमेशा हिलते-डुलते हो। मेरी तरह शान से सीधे क्यों नहीं खड़े होत? तुम भी हवा से कह दो कि उसकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते। तुम अपनी शक्ति का परिचय हवा को दो। इस संसार में बलवानों का ही चारों ओर बोलबाला है।’

बाँस के पेड़ को जामुन के पेड़ की बातें अच्छी नहीं लगीं लेकिन बाँस का पेड़ कुछ भी नहीं बोला और चुपचाप खड़ा रहा। यह देखकर जामुन का पेड़ क्रोधितहोकर बोला―‘तुम मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देते?’

बाँस के पेड़ ने कहा―‘तुम मेरी अपेक्षा मजबूत हो। मैं बहुत कमजोर हूँ। लेकिन मैं तुम्हे एक सलाह देता हूँ कि तेज हवा तुम्हारे लिए भी नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। यदि हवा की गति तेज हो तो हमें उसका सम्मान करना चाहिए। वरना कभी-कभी पछताना पड़ सकता है।’

जामुन के पेड़ को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। वह बाँस के पेड़ से क्रोधित होकर बोला―‘तेज हवा भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मेरी इस बात को हमेशा याद रखना।’

धीरे-धीरे चलती हुई हवा ने बाँस के पेड़ और जामुन के पेड़ के बीच होने वाली सभी बातों को सुन लिया। हवा तेज गति से जामुन के पेड़ से टकराकर आगे निकल गई। थोड़ी देर बाद हवा ने अपने अन्दर कुछ शक्ति और समेटी और अपने को और भी गतिशील बना लिया। अब हवा एक तूफान के रूप में परिवर्तित हो गई। उस तेज हवा के टकराने से बाँस का पेड़ लगभग पूरा झुक गया। वही हवा अब जामुन के पेड़ से दोबारा जाकर टकरा गई लेकिन जामुन के पेड़ पर उस तेज हवा का कोई भी असर नहीं हुआ। वह उसी प्रकार पूर्ववत् खड़ा रहा।

कुछ देर बाद तूफानी हवा ने जामुन के पेड़ कीजड़ों पर जोर से प्रहार करके उन्हें कमजोर कर दिया। तूफानी हवाओं को जामुन के पेड़ की शाखाओं ने रोकने की भरपूर कोशिश की, लेकिन तेज हवाओं ने जामुन के पेड़ की शाखाओं को पीछे धकेल दिया। तेज हवाओं के कारण जामुन के पेड़ का संतुलन खो गया और जड़ों ने कमजोर होकर अपना स्थान छोड़ दिया। कुछ ही देर में वह जामुन का पेड़ जमीन पर गिर पड़ा।

जामुन के पेड़ को धराशायी देखकर बाँस का पेड़ बहुत दुःखी हुआ। बाँस का पेड़ सोचने लगा―‘यदि जामुन के पेड़ ने मेरी बात मानकर हवा का सम्मान किया होता तो आज उसका अंत नहीं होता। यह जामुन का पेड़ तो घमंडी था। शायद इसे नहीं मालूम था कि घमंडी का सिर हमेशा नीचा ही होता है।’

Moral ― इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि घमंड ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। घमंडी व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है। इसलिए मनुष्य को कभी घमंड नहीं करना चाहिए।


9. जैसा करोगे वैसा भरोगे - Acche Acche Kahani 


एक बुढ़िया थी। उसका एक ही बेटा था। वह हमेशा यही सपने देखती थी कि उसके बेटे का विवाह होगा तो बेटा और बहू दोनों मिलकर उसकी बहुत सेवा करेंगे और उसे घर का भी काम नहीं करना पड़ेगा। धीरे-धीरे वह दादी बन जाएगी और उसका घर स्वर्ग बन जाएगा।

आखिर वह दिन भी आ गया जब बुढ़िया के बेटे का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। वह दादी भी बन गई लेकिन संयोग से उसका कोई भी सपना पूरा नहीं हुआ। बुढ़िया का बेटा तो सुबह काम पर चला जाता और पोता स्कूल चला जाता, तब बहू उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती। बहू बुढ़िया से घर में झाड़ू लगवाती, झूठे बर्तन साफ़ करवाती और टूटे-फूटे बर्तनों में उसे भोजन देती।

शुरू में तो बहू अपने पति और बेटे के पीछे ही बुढ़िया से झगड़ती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने पति के सामने भी बुढ़िया का अपमान करने लगी। एक दिन टूटे बर्तनों में बुढ़िया को भोजन करते देखकर उसके बेटे को बहुत दुःख हुआ। उसने अपनी माँ का पक्ष लेते हुए अपनी पत्नी को बहुत डांटा। पति-पत्नी दोनों में बहुत कहा-सुनी हो गई। धीरे-धीरे बुढ़िया के बेटे ने भी पत्नी का विरोध करना छोड़ दिया।

धीरे-धीरे पोता बड़ा होने लगा तो वह अपनी माँ का विरोध करने लगा। वह अपनी दादी से बहुत प्यार करता था। अपनी दादी पर माँ द्वारा किए गए अत्याचारों को देखकर उसे बहुत दुःख होता था। उसे अपनी दादी से हमदर्दी और सहानुभूति थी। अपनी माँ के डर से वह दादी की कुछ भी मदद नहीं करता था। धीरे-धीरे पोता बड़ा हो गया और उसका विवाह भी हो गया।

पोते की नई बहू छिप-छिपकर अपनी दादी-सास पर होते अत्याचारों को चुपचाप देखती रहती थी। लेकिन पतोहू को बुढ़ापे में दादी-सास से काम करवाना जरा भी अच्छा नहीं लगता था। जब कभी पतोहू बुढ़िया की काम करने में मदद करती तो उसकी सास उसे खूब डांटती। पतोहू जब कभी दादी-सास को रोते हुए देखती तो उसे बहुत दुःख होता था।

एक बार बुढ़िया बीमार पड़ गई और परलोक सिधार गई। अब बुढ़िया की बहू पतोहू से ही घर का सारा काम कराती और उसके साथ अभद्र व्यवहार करती। जब पतोहू ने देखा कि उसकी सास दादी-सास की तरह ही उस पर भी अत्याचार कर रही है तो उसने बदला लेने की ठान ली। वह भी अपनी सास से वैसा व्यवहार करने लगी जैसा व्यवहार उसकी सास अपनी सास से करती थी। अब तो पतोहू अपनी सास को फूटी थाली में भोजन देने लगी। यह देखकर उसके पति और ससुर ने बहुत विरोध किया।

पतोहू ने अपने ससुर और पति से कहा-' मेरी दादी-सास जितनी मेहनती और सीधी थी जब माताजी उन्हें फूटी थाली में भोजन देती थीं तब तुम कुछ क्यों नहीं बोले। उन पर होने वाले अत्याचारों को तुम दोनों चुपचाप देखते रहे। तब क्या तुम्हारे मुख पर ताला पड़ गया था। यदि किसी ने माताजी की पैरवी की तो मुझ से बुरा कोई न होगा।'

पतोहू की बातें सुनकर उसका पति और ससुर कुछ नहीं बोले। उन्होंने भी उसका विरोध करना छोड़ दिया। ससुर को अपनी पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार देखकर  बहुत गुस्सा भी आता था। जब ससुर पतोहू को डाँटने लगे तो वह उनके साथ भी अभद्र व्यवहार करने लगी। सास-ससुर अकेले में बैठकर अपने सुख-दुःख की बातें करते और यही सोचते थे कि जैसा करोगे वैसा भरोगे।

Moral  :- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सबके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए क्योंकि जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करेंगे वैसा ही व्यवहार दूसरे लोग हमारे साथ करेंगे।


10. विनाश काले विपरीत बुद्धि - Acche Acche Kahani 


पाण्डवों के वन जाने के बाद नगर में अनेक अपशकुन हुए। उसके बाद नारदजी वहां आए और उन्होंने कौरवों से कहा कि आज से ठीक चौदह वर्ष बाद पाण्डवों के द्वारा कुरुवंश का नाश हो जाएगा. (कुछ ).... द्रोणाचार्य की बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा गुरुजी का कहना ठीक है। तुम पाण्डवों को लौटा लाओ। यदि वे लौटकर न आवें तो उनका शस्त्र, सेवक और रथ साथ में दे दो ताकि पाण्डव वन में सुखी रहे। यह कहकर वे एकान्त में चले गए। उन्हें चिन्ता सताने लगी उनकी सांसे चलने लगी। उसी समय संजय ने कहा आपने पाण्डवों का राजपाठ छिन लिया अब आप शोक क्यों मना रहे हैं? संजय ने धृतराष्ट्र से कहा पांडवों से वैर करके भी भला किसी को सुख मिल सकता है। अब यह निश्चित है कि कुल का नाश होगा ही, निरीह प्रजा भी न बचेगी।

सभी ने आपके पुत्रों को बहुत रोका पर नहीं रोक पाए। विनाशकाल समीप आ जाने पर बुद्धि खराब हो जाती है। अन्याय भी न्याय के समान दिखने लगती है। वह बात दिल में बैठ जाती है कि मनुष्य अनर्थ को स्वार्थ और स्वार्थ को अनर्थ देखने लगता है तथा मर मिटता है। काल डंडा मारकर किसी का सिर नहीं तोड़ता। उसका बल इतना ही है कि वह बुद्धि को विपरित करके भले को बुरा व बुरे को भला दिखलाने लगता है। धृतराष्ट्र ने कहा मैं भी तो यही कहता हूं।

द्रोपदी की दृष्टि से सारी पृथ्वी भस्म हो सकती है। हमारे पुत्रों में तो रख ही क्या है? उस समय धर्मचारिणी द्र्रोपदी को सभा में अपमानित होते देख सभी कुरुवंश की स्त्रियां गांधारी के पास आकर करुणकुंदन करने लगी। ब्राहण हमारे विरोधी हो गए। वे शाम को हवन नहीं करते हैं। मुझे तो पहले ही विदुर ने कहा था कि द्रोपदी के अपमान के कारण ही भरतवंश का नाश होगा। बहुत समझा बुझाकर विदुर ने हमारे कल्याण के लिए अंत में यह सम्मति दी कि आप सबके भले के लिए पाण्डवों से संधि कर लीजिए। संजय विदुर की बात धर्मसम्मत तो थी लेकिन मैंने पुत्र के मोह में पड़कर उसकी प्रसन्नता के लिए उनकी इस बात की उपेक्षा कर दी।


11. तिरिया से राज छिपे न छिपाए - Acche Acche Kahani 


किसी गाँव में एक पति-पत्नी बड़े प्रेम से रहते थे। दोनों को एक-दूसरे पर पूरा-पूरा विश्वास था। पत्नी के प्रेम के कारण पति अपने घरवालों से अलग हो गया था। पति यह जानता था कि उसके माता-पिता बहुत सीधे हैं लेकिन फिर भी वह अपनी पत्नी के लिए उनसे लड़ता था। वह हमेशा ही अपनी पत्नी का पक्ष लेता था। विशेष बात को भी वह माता-पिता, भाई-बहन को न बताकर सिर्फ अपनी पत्नी को ही बताता था।

एक दिन वह घूमता हुआ गाँव के काका के पास गया। काका बहुत ही अनुभवी व्यक्ति थे। उसने काका से अपनी पत्नी की प्रशंसा की। उसने काका को बताया कि ‛बड़े-से-बड़े राज भी वह अपनी पत्नी से नहीं छिपाता, वह पूरे घर को शक की नज़र से देख सकता है लेकिन अपनी पत्नी पर कभी शक नहीं करेगा।’

उसके चुप होने के बाद काका ने कहा―‘देखो बेटा, अपनी पत्नी पर जरुरत से ज्यादा विश्वास करना 

ठीक नहीं है। पहले अपनी पत्नी की परीक्षा लेकर देखो फिर तुम्हें पता चलेगा कि वह कितनी राज की बात छिपा सकती है। कभी-कभी सच्चा प्रेम करने वाली स्त्रियाँ भी नासमझी में अपने पति की भलाई करने के चक्कर में उनका अहित कर बैठती हैं।’

काका की बात सुनकर वह व्याकुल हो गया और उसने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने का निश्चय कर लिया। उसने काका की सलाह से एक योजना भी बना ली। 

एक दिन वह अंगोछे में कटा हुआ तरबूज लेकर आया। उसमें से लाल बुँदे टपक रही थीं। उसने अपनी पत्नी से कहा―‛ आज मैंने एक आदमी का सिर काट दिया। इस बात को राज ही रखना। यदि गाँव में यह बात किसी को पता चल गई तो पुलिस मुझे पकड़कर ले जाएगी और मुझे फाँसी की सजा मिलेगी।’

उसने अपनी पत्नी से फावड़ा माँगा और घर के पीछे एक पेड़ अंगोछे में लिपटे हुए तरबूज को गड्ढा खोदकर जल्दी से दबा दिया और ऊपर से मिट्टी डालकर जगह को समतल बना दिया।

उसकी पत्नी इस घटना के बाद परेशान रहने लगी। उसने अपने पति से कुछ नहीं कहा लेकिन उसे अन्दर-ही-अन्दर बहुत घुटन महसूस हो रही थी। वह अपने मन के बोझ को किसी से कहकर हल्का करना चाहती थी। दुःखी हो कर उसने यह बात अपनी पड़ोसन को बता दी। उसने पड़ोसन को कसम दी कि वह इस बात को किसी को न बताए वरना उसके पति को फाँसी हो जाएगी।

उस महिला ने यह बात अपनी पड़ोसन को बता दी। यह बात एक ने दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को, तीसरे ने चौथे को बता दी। इस प्रकार यह बात पूरे गाँव में फैलते-फैलते पुलिस-थाने में भी पहुँच गई।

दूसरे दिन दरोगा साहब कुछ सिपाहियों को लेकर उसके घर पहुँच गए। दरोगा ने उसकी पत्नी से पूछा―‘जल्दी बताओ कि तुम्हारे पति ने सिर कहाँ पर दबाया है? यदि तुमने सच-सच नहीं बताया तो तुम्हें फाँसी लग जाएगी।’

दरोगा की डांट सुन कर उसकी पत्नी डर गई वह स्थान दिखा दिया जहाँ पर उसके पति ने गड्ढा खोदकर कुछ दबाया था। पुलिस ने उस स्थान को खोदकर अंगोछे में लिपटा हुआ तरबूज निकाल लिया।

वहाँ पर काका भी उपस्थित थे। उन्होंने पुलिस को बता दिया कि इसने अपनी पत्नी की परीक्षा लेने के लिए ही यह नाटक किया था। इसके बाद सब लोग अपने-अपने घर चले गए। काकाजी ने कहा कि तिरिया से राज छिपे न छिपाए।



12. देखना है ऊँट किस करवट बैठता है - Acche Acche Kahani 


एक गाँव में सप्ताह में एक बार हाट लगती थी। दाल, सब्जी, अनाज, कपड़े यानि घर-गृहस्थी का सारा सामान उस हाट में मिल जाता था। आस-पास के गाँवों से भी लोग उस हाट से सामान खरीदने आते थे। दुकानदार हाट में बेचने के लिए अपना सामान बैलगाड़ी, ऊँट,खच्चर पर लादकर लाते थे। छोटे-छोटे दुकानदार तो सामान को सिर पर ही रख लाते थे। उस गाँव में कुंजड़ा और कुम्हार भी रहते थे। वे दोनों भी अपना सामान हाट में ले जाकर बेचते थे। कुंजड़ा हाट में सब्जी और फल बेचता था और कुम्हार को हाट में सामान ले जाने का भाड़ा बहुत देना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें मुनाफा बहुत कम होता था।

उसी गाँव में एक ऊँट वाला भी रहता था। कुंजड़ा और कुम्हार ने सोचा कि वे अपना सामान हाट में ऊँट पर लादकर ले जाएँगे और भाड़ा आधा-आधा चुका देंगे। ऐसा करने से दोनों को ही फायदा होगा। जैसे ही हाट का दिन आया तो कुंजड़े ने ऊँट की पीठ पर एक ओर अपनी सब्जियाँ और फल लाद दिए तो दूसरी ओर कुम्हार ने अपने मिट्टी के बर्तन लाद दिए। दोनों ऊँट के साथ-साथ चलने लगे। ऊँट वाला भी रस्सी पकड़कर आगे-आगे चल रहा था। थोड़ी दूर चलने पर ऊँट ने अपनी गर्दन घुमाई तो उसे सब्जियों के पत्ते लटकते हुए दिखाई दिए। ऊँट की डोरी लम्बी होने के कारण उसने गर्दन पीछे करके सब्जियों के पत्ते खा लिये।

कुंजड़े को यह देखकर बहुत दुःख हुआ। कुछ ही देर में ऊँट ने जब दोबारा गर्दन पीछे करके सब्जियों के पत्ते खाए तो कुंजड़े ने ऊँट वाले से कहा―‘भैया, ऊँट सब्जियाँ खा रहा है। इसकी डोरी खींचकर रखो। वरना यह सारी सब्जियाँ खराब कर देगा।’ ऊँट वाले ने कुंजड़े की बात मानकर रस्सी खींचकर पकड़ ली। लेकिन ऊँट अपनी आदत से बाज नहीं आया और बार-बार पीछे गर्दन करके सब्जियों को खाता रहा। कुंजड़े का नुकसान होता देखकर कुम्हार को बहुत मजा आ रहा था। कुम्हार तो कुंजड़े का मजाक बनाने लगा। कुंजड़ा अपने मन में सोचने लगा कि हाट पहुँचते-पहुँचते सब्जियों का भार कम हो जाएगा।

सब्जियों का भार कम होते देखकर कुम्हार हँसने लगा। तब कुंजड़े ने कहा―‘देखना है ऊँट किस करवट बैठता है?’ धीरे-धीरे सब्जियों का भार कम हो गया तो बर्तनों का झुकाव नीचे की ओर अधिक हो गया। कुम्हार को देखकर चिंता होने लगी। कुम्हार यह सोचने लगा कि देखना है कि ऊँट किस करवट बैठता है। जब ऊँट हाट में पहुँच गया तो कुंजड़े और कुम्हार ने अपना सामान लगाने के स्थान पर ऊँट को बैठा दिया। बर्तनों का भार अधिक होने के कारण ऊँट उसी करवट से बैठ गया। बेचारे कुम्हार के सारे बर्तन टूट गए। कुंजड़े ने कुम्हार का नुकसान होते देखकर कहा―‘देखना है, ऊँट किस करवट बैठता है?’

Moral :- दूसरों का नुकसान होते देखकर खुश नहीं होना चाहिए।



13. बिल्ली के गले में घंटी - Acche Acche Kahani 


एक बहुत बड़े घर में सैकड़ों चूहे रहते थे। वे चारों ओर उछल - कूद करते हुए अपना पेट आराम से भर लेते थे और फिर जब उन्हें खतरा दिखाई देता तो बिल में जाकर छिप जाते थे। एक दिन उस घर में न जाने कहाँ से एक बिल्ली आ गई। बिल्ली की नज़र जैसे ही चूहों पर पड़ी तो उसके मुँह में पानी आ गया। बिल्ली ने उन चूहों को खाने के विचार से उसी घर में अपना डेरा डाल दिया। बिल्ली को जब कभी भूख लगती तो वह अँधेरे स्थान में छिप जाती और जैसे ही चूहा बिल से बाहर आता तो उसे मारकर खा जाती। अब तो बिल्ली रोज चूहों का भोजन करने लगी। इस प्रकार वह कुछ ही दिनों में मोटी - ताजी हो गई।

बिल्ली के आ जाने से चूहे दुःखी हो गए। धीरे - धीरे चूहों की संख्या कम होती देख वे भयभीत हो गए। चूहों के मन में बिल्ली का डर बैठ गया। बिल्ली से बचने का कोई उपाय खोजने के लिए सभी चूहों ने मिलकर एक सभा का आयोजन किया। सभा में सभी चूहों ने अपने - अपने विचार प्रस्तुत किए, लेकिन कोई भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका। सभी चूहों में निराशा फैल गई।

तब एक बूढ़ा चूहा अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला  -   भाइयो सुनो, मैं तुम्हें एक सुझाव देता हूँ, जिस पर अमल करके हमारी समस्या का हल निकल सकता है। यदि हमें कहीं से एक घंटी और धागा मिल जाए तो हम घंटी को बिल्ली के गले में बाँध देंगे। जब बिल्ली चलेगी तो उसके गले में बँधी हुई घंटी भी बजने लगेगी। घंटी की आवाज़ हमारे लिए खतरे का संकेत होगी। हम घंटी की आवाज़ सुनते ही सावधान हो जाएँगे और अपने - अपने बिल में जाकर छिप जाएंगे।

बूढ़े चूहे का यह सुझाव सुनकर सभी चूहे ख़ुशी से झूम उठे और अपनी ख़ुशी प्रकट करने के लिए वे नाचने  -  गाने लगे। चूहों का विचार था कि अब उन्हें बिल्ली से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी और वे फिर से निडर होकर घूम सकेंगे।

तभी एक अनुभवी चूहे ने कहा  -  चुप रहो, तुम सब मुर्ख हो। तुम इस तरह तरह खुशियाँ मना रहे हो, जैसे तुमने कोई युद्ध जीत लिया हो। क्या तुमने सोचा है कि बिल्ली के गले में जब तक घंटी नहीं बंधेगी तब तक हमें बिल्ली से मुक्ति नहीं मिल सकती।

अनुभवी चूहे की बात सुनकर सारे चूहे मुँह लटकाकर बैठ गए। उनके पास अनुभवी चूहे के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। तभी उन्हें बिल्ली के आने की आहट सुनाई दी और सारे चूहे डरकर अपने - अपने बिलों में घुस गए।

Moral   -   इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि योजनाएँ बनाने से किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान करने के लिए उन योजनाओं पर अमल करना आवश्यक है।



14. किस्सा हूर और लंगूर का - Acche Acche Kahani 


आप जितने भी जोड़े देखते होंगे उनमें से 95 प्रतिशत बेमेल ही मिलेंगे। पता नहीं क्या जादू है कि हमेशा हूर लंगूर के हाथों ही आ फँसती है। हमारे हाथ में भी आखिरकार एक हूर लग ही गई थी, आज से छत्तीस साल पहले।

जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम।अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे।न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था “आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक”। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं किआगे नाथ न पीछे पगहा। किसी केतीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थेहम।बसअपने काम से काम रखते थे। हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं किआप भला तो जग भला।

पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमेंअक्ल का अंधापाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमेंअंधों में काना राजासमझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।

बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। “अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ” वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है।

इतना होने पर भी जब उसे लगा किदिल्ली अभी दूर हैतो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों मेंआग और घी का मेलहो गया। आखिरएक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी “ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना” के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था किअकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमेंसावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे किबिन माँगे मोती मिले माँगे मिले ना भीख।

अबअपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको।अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया किलंगूर के हाथ में हूरफँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं। कई बार पछतावा भी होता है परअब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।


15. सांच को आंच नहीं - Acche Acche Kahani 


किसी नगर में एक जुलाहा रहता था। वह बहुत बढ़िया कम्बल तैयार करता था। कत्तिनों से अच्छी ऊन खरीदता और भक्ति के गीत गाते हुए आनंद से कम्बल बुनता। वह सच्चा था, इसलिए उसका धंधा भी सच्चा था, रत्तीभर भी कहीं खोट-कसर नहीं थी।

एक दिन उसने एक साहूकार को दो कम्बल दिए। साहूकार ने दो दिन बाद उनका पैसा ले जाने को कहा। साहूकार दिखाने को तो धरम-करम करता था, माथे पर तिलक लगाता था, लेकिन मन उसका मैला था। वह अपना रोजगार छल-कपट से चलाता था।

दो दिन बाद जब जुलाहा अपना पैसा लेने आया तो साहूकार ने कहा - "मेरे यहां आग लग गई और उसमें दोनों कम्बल जल गए अब मैं पैसे क्यों दूं?"

जुलाहा बोला - "यह नहीं हो सकता मेरा धंधा सच्चाई पर चलता है और सच में कभी आग नहीं लग सकती।

जुलाहे के कंधे पर एक कम्बल पड़ा था उसे सामने करते हुए उसने कहा - "यह लो, लगाओ इसमें आग।"

साहूकार बोला - "मेरे यहां कम्बलों के पास मिट्टी का तेल रखा था। कम्बल उसमें भीग गए थे। इस लिए जल गए।

जुलाहे ने कहा - "तो इसे भी मिट्टी के तेल में भिगो लो।"

काफी लोग वहां इकट्ठे हो गए। सबके सामने कम्बल को मिट्टी के तेल में भिगोकर आग लगा दी गई। लोगों ने देखा कि तेल जल गया, लेकिन कम्बल जैसा था वैसा बना रहा।

जुलाहे ने कहा - "याद रखो सांच को आंच नहीं।"

साहूकार ने लज्जा से सिर झुका लिया और जुलाहे के पैसे चुका दिए।

सच ही कहा गया है कि जिसके साथ सच होता है उसका साथ तो भगवान भी नहीं छोड़ता। 



16. करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान - Acche Acche Kahani 


एकलव्य एक नीची जाति का बालक था। वह अपने माता-पिता के साथ जंगल में रहता था। वह प्रतिदिन चारे की खोज में अपने पिता के साथ जंगल में जाता था। एकलव्य के पिता खंजर से शिकार करते थे। एकलव्य भी खंजर से अभ्यास करने के लिए जंगल में जाते थे। एकलव्य के लिए यह एक कठिन काम था। पत्थरों से छोटे-छोटे जीवों पर निशाना साधना एकलव्य को बहुत आसान काम लगा। एकलव्य गुलेल द्वारा भी पक्षियों पर वार करता था।

एक दिन एकलव्य हस्तिनापुर से गुजर रहा था उसने देखा कि कुछ युवक धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। एकलव्य खड़े होकर उन युवकों को अभ्यास करते हुए देखने लगा।

एकलव्य ने सोचा कि यदि मैं भी धनुर्विद्या में निपुण हो जाऊं तो कितना अच्छा हो। परन्तु समस्या तो यह थी कि उसे धनुर्विद्या सिखाए कौन?

एकलव्य क्षत्रिय नहीं था इसलिए उसे धनुर्विद्या सीखने का कोई अधिकार नहीं था। उस समय धनुर्विद्या और युद्ध-कौशल सीखने का अधिकार क्षत्रियों और उच्च जाति के लोगों को ही था। एकलव्य को बहुत दुःख हुआ। वह अपनी किस्मत को कोसता हुआ अपने घर आ गया। एकलव्य धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त करना चाहता था। उसकी निशानेबाजी बहुत अच्छी थी। उसने एक खरगोश पर निशाना साधकर उसको एक ही वार में ढेर कर दिया था। उसने गुलेल के एक ही वार में कबूतर के जोड़े को ढेर कर दिया था।

एकलव्य अपने मन में सोचने लगा कि यदि मैं धनुर्विद्या में निपुण हो जाऊँ तो मैं हिरण आदि पशुओं को आसानी से शिकार बना सकता हूँ। धनुर्विद्या की शिक्षा ग्रहण करने में सचमुच ही मेरी जाति बाधक है।

एकलव्य जब भी हस्तिनापुर जाता तभी धनुर्विद्या सीखते हुए युवकों को बड़े ही ध्यान से देखता। एकलव्य ने शीघ्र ही धनुष बनाना सीख लिया और धीरे-धीरे कुछ बाण भी इकट्ठे कर लिए।

उस समय गुरु द्रोणाचार्य धनुर्विद्या के सर्वश्रेष्ठ आचार्य थे। एकलव्य ने स्वयं से कहा–' मैं गुरु द्रोणाचार्य का शिष्य हूँ।' एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाकर एक पेड़ के नीचे रख दी। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति को प्रणाम करके धनुर्विद्या का अभ्यास करना प्रारंभ कर दिया। धनुर्विद्या सीखना एक अत्यंत कठिन काम था। एकलव्य ने हार नहीं मानी और वह रोज कठिन अध्यास करने लगा। निरंतर प्रयास करते- करते एकलव्य की धनुर्विद्या में काफी सुधार आता चला गया।

अपने परिश्रम और प्रयास से एक दिन एकलव्य धनुष विद्या में निपुण हो गया। एकलव्य लक्ष्य पर परछाईं देखकर ही निशाना साध लेता था। पशु-पक्षियों की आवाज़ सुनकर ही एकलव्य उन पर सटीक निशाना लगा लेता था। धीरे-धीरे एकलव्य अर्जुन के समान ही श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया। उसने अपनी मेहनत और लगन से यह सिद्ध कर दिया कि 'करत-करत अध्यास के जड़मति होत सुजान' अर्थात् 'लगातार अध्यास करने से प्रतिभा निखरती है।'

Moral :- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मेहनत, लगन और अभ्यास से मनुष्य किसी भी कला में निपुणता प्राप्त कर सकता है।



17. एक चुप सौ सुख -Acche Acche Kahani 


एक जमीदार था, एक उसकी घर वाली थी। घर मे दो जने ही थे। जमीदार खेत मे काम करता था और उसकी पत्नी घर का काम करती थी। पति-पत्नी दोनों ही गरम स्वभाव के थे। थोड़ी थोड़ी बात पर दोनों मे ठन जाती थी। कभी कभी तो घरवाली का बना बनाया खाना भी बेकार हो जाता था। एक दिन घरवाली अपनी रिश्तेदारी मे गई। वहां उसे एक बुजुर्ग औरत मिली। बातों बातों मे जमींदार की घरवाली ने बुजुर्ग औरत को बताया कि मेरे घरवाले का मिजाज बहुत चिड़चिड़ा है वे जब तब मेरे से लड़ते ही रहते हैं। कभी कभी इससे हमारी बनी बनाई रसोई बेकार चली जाती है। बुजुर्ग महिला ने कहा यह कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो हर घर मे होता रहता है। मेरे पास इस की एक अचूक दवा है। जब भी कभी तेरा घरवाला तेरे साथ लड़े, तब तुम उस दवा को अपने मुंह मे रख लेना, इस से तुम्हारा घरवाला अपने आप चुप हो जाएगा। बुजुर्ग महिला अपने अन्दर गई, एक शीशी भर कर ले आई और उसे दे दी।

जमीदार की घरवाली ने घर आ कर दवा की परीक्षा करनी शुरू कर दी जब भी जमीदार उस से लड़ता था वह दवा मुंह मे रख लेती थी। इस से काफी असर दिखाई दिया। जमीदार का लड़ना काफी कम हो गया था। यह देख कर वह काफी खुश हुई। वह ख़ुशी-ख़ुशी बुजुर्ग महिला के पास गई और कहा आप की दवाई तो कारगर सिद्ध हुई है, आप ने इस मे क्या क्या डाला है जरा बता देना, मे इसे घर मे ही बना लूँगी। बार बार आना जाना मुश्किल हो जाता है। इसपर बुजुर्ग महिला ने जवाब दिया की जो शीशी मैंने तुम्हे दी थी उस मे शुद्ध जल के सिवाय कुछ भी नहीं था। तुम्हारी समस्या का हल तो तुम्हारे चुप रहने से हुई है। जब तुम दवा यानि की पानी को मुंह मे भर लेती थी तो तुम बोल नहीं सकती थी और तुम्हारी चुप्पी को देख कर तुम्हारे घरवाले का भी क्रोध शांत हो जाता था। इसी को "एक चुप सौ सुख" कहते हैं। बुजुर्ग महिला ने जमीदार की घरवाली को सीख दी की इस दवा को कभी भूलना मत और अगर किसी को जरूरत पड़े तो आगे भी लेते रहना। जमीदार की घरवाली ने बुजुर्ग महिला की बात को गांठ बांध लिया और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापिस आ गई। 



18. लेना एक न देना दो - Acche Acche Kahani 


एक पोखर के पास एक मोर और कछुआ साथ साथ रहते थे। मोर पेड़ पर रहता और दाना चुग्गा खा कर प्रसन्न रहता। उसका मित्र कछुआ पोखर में रहता और बीच बीच में पोखर से बाहर निकल कर मोर के साथ देर तक बातें करता। एक बार उस स्थान पर एक बहेलिया आया और उसने मोर को अपने जाल में फंसा लिया। वह मोर को बेचने के लिये हाट की ओर ले जाने लगा। इस पर मोर ने बहेलिये से बड़े कातर स्वर में कहा, “तुम मुझे जहां चाहे मर्जी ले जाओ। लेकिन, जाने से पहले मैं पोखर में रहने वाले अपने मित्र कछुए से मिलना चाहता हूँ। फिर तो उससे कभी मुलाक़ात होने से रही। बहेलिया राजी हो गया।

मोर को बंदी हालत में देख कर कछुआ बहुत दुखी हुआ। उसने बहेलिये से कहा, “यदि तुम मेरे मित्र मोर को छोड़ दो तो मैं तुम्हें एक कीमती उपहार दूंगा। बहेलिया मान गया। कछुए ने तालाब में एक डुबकी लगाई और मुंह में एक कीमती हीरा ले कर बाहर आ गया। बहेलिये ने हीरे को देखा तो उसके एवज में उसने मोर को छोड़ दिया।

उधर हीरा ले कर बहेलिया चल गया तो कछुए ने मोर को कहीं दूर जा कर छुप जाने की सलाह दी। मित्र की बात मान कर मोर दूर चला गया। रास्ते में बहेलिये को लालच आ गया। उसके मन में विचार आया कि उसे कछुए से मोर की रिहाई के बदले में एक नहीं दो हीरे लेने चाहिये थे। यह ख़याल आते ही वह कछुए से मिलने पोखर पर आया। उसने कछुए से कहा कि मुझे मोर की रिहाई के बदले एक की जगह दो हीरे चाहिये थे।

उसकी बात सुन कर कछुआ समझ गया कि उसके मन में लालच आ गया है। सो, कछुए ने बहेलिये से कहा, “ठीक है, मैं तुम्हें इसके साथ का दूसरा हीरा ला देता हूँ, जरा मुझे पहला वाला हीरा दे दो। बहेलिये ने कछुए को हीरा दे दिया। कछुए ने हीरा लिया और पोखर में चला गया और बहुत देर तक वापिस नहीं आया। यह प्रसंग सभी को मालूम हो गया और सब कहने लगे कि बहेलिये को एक हीरा वापिस नहीं देना चाहिये था और न ही कछुए को दो हीरे देने थे। तभी से यह कहावत मशहूर हो गई: लेना एक न देना दो। 




19. इक्के दुक्के का अल्ला बेली - Acche Acche Kahani 


दिल्ली से कोई दस मील दूर फरीदाबाद शहर के रास्ते में एक नाला था। बहुत पहले वहां घना जंगल था। एक बुढ़िया वहां बैठ कर मुसाफिरों से भीख माँगा करती। उसके बेटे पास के नाले के किनारे छुपे रहते। वे लूट पाट का काम करते। जब कोई इक्का दुक्का मुसाफिर उधर से निकलता, तो बुढ़िया उन्हें यह कह कर आगाह कर देती कि “इक्के दुक्के का अल्ला बेली।”यह सुन कर उसके बेटे नाले से लगे छुपने वाले स्थान से बाहर आते और यात्रियों को लूट लेते।

जब वहां से निकलने वाले यात्री समूह में होते तो बुढ़िया चिल्ला कर बोलती, “जमात में करामात है”।

यह सुनते ही बुढ़िया के बच्चे समझ जाते कि इतने आदमियों के सामने जाना खतरे से खाली नहीं है। अतः वे वहीँ बैठे रहते। कई दिनों तक उन लोगों का यह काम चलता रहा और गुजारा होता रहा। आखिर कब तक ऐसा चलता। एक दिन उनका भांडा फूट गया और वे लोग गिरफ्तार कर लिये गये। लेकिन सारे इलाके में उनकी लूट-पाट के किस्से लोगों में मशहूर हो चुके थे। बुढ़िया द्वारा बेटों को दिया जाने वाला संदेश “इक्के-दुक्के का अल्ला बेली” तो कहावत के रूप में सारे अंचल में प्रचलित हो गया।



20.बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे - Acche Acche Kahani 


बचपन में बाबा एक कहावत कहते थे, "बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?" हम ने कहा, "बाबा ! यह कौन बड़ी बात है ? बिल्ली पकड़ कर आप लाइए घंटी तो हमबाँधहीदेंगे!!" तब बाबा ने हमें इस कहाबतका किस्सा सुनाया। आप भी पहले यह किस्सा सुन लीजिये!

हमारे गाँव मे एक थे धनपत चौधरी! उनका एक बड़ा-साखलिहान था। उस में अनाज-पानी तो जो था सो था ही, ढेरो चूहे भरे हुए थे। खलिहान मेंकटाई-खुटाई के मौसम ही लोग-बाग़ जाते थे वरना वहाँ चूहाराज ही था। चूहे दिन-रातधमा-चोकड़ी करते रहते थे। धनपत बाबू ने एक मोटी बिल्ली पाल रखी थी। वह बिल्लीदिन-दोपहर कभी भी चुपके से खलिहान में घुस जाती थी और झट से एक चूहे खा जाती थी।

एकदिन चूहों ने एक बड़ी बैठक बुलाई। उसमें बुज़ुर्ग चूहों द्वारा यह कहा गया कि हम लोग इतने चूहे हैं औरबिल्लीएक… फिर भी कमबख्त जब चाहती है तबहम लोगों को अपना शिकार बना लेती है... कुछ तो उपाय करना पड़ेगा। मसला तो बहुतगंभीर था। सो बहुत देर तक विचार विमर्श के बाद बूढ़ा चूहा बोला, "देखो बिल्ली से हम लोग लड़ तो नहीं सकते लेकिन बुद्धि लगा के बच सकते हैं। क्यूँ न बिल्ली के गले मेंएक घंटी बाँध दी जाए ? इस तरह से जब बिल्ली इधर आयेगी घंटी की आवाज़ सुन कर हम लोगछुप जायेंगे।"

अरे शाब्बाश....!!!! सारे चूहे इस बात पर उछल पड़े।लगा उन्हें सुरक्षा कवच मिल गया हो। लेकिन चूहों का सरदार बोला, 'आईडिया तो सॉलिड है परबिल्ली के गले मे घंटी बांधेगा कौन ?'

बूढा चूहा तो सबसे पहले पीछे हट गया। जवान भी औरबच्चे भी ! कौन पहले जाए मौत के मुंह में ? कौन घंटी बांधे ? थे तो सबचूहे... ! सो रोज अपनी नियति पर मरते रहे। समझे... !

Moral -  इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है ऐसी योजना से कोई लाभ नहीं जिसे लागू न किया जा सके !

Also Read - 

👨   Summury - 

 If you liked this post of Acche Acche Kahani  , then do share it with others. To read more such post, please follow us.

अगर आपको Acche Acche Kahani  की यह पोस्ट अच्छी  लगी तो , इसे दूसरों के साथ  साझा  जरूर करे | इस तरह के पोस्ट को आगे और पढ़ने के लिए  फॉलो हमे जरूर करे |


Post a Comment

0 Comments