. . . Kisan ki kahaniyan |किसान की कहानियां

Kisan ki kahaniyan |किसान की कहानियां

Kisan ki kahaniyan.                                                   
Kisan ki kahaniyan
                                                                          1.किसान और उसके चार बेटे - ।  (Kisan ki kahaniyan)                                                                                                                    एक बार एक गरीब किसान था। उसके चार बेटे थे, लेकिन चारों निकम्मे और कामचोर थे। किसान उनकी इस आदत से बहुत चिंतित रहता था।
किसान के पास बस एक बंजर जमीन का टुकड़ा था। बड़ी मशक्कत से वो दूसरे किसानो के खेत में मेहनत करके रोजी का इंतजाम करता था।
एक बार किसान बहुत बीमार हो गया उसने मरने से पहले अपने बेटों से कहा कि मैंने अपनी जमीन में कुछ सोने की अशर्फियाँ गाड़ रखी हैं, मेरे मरने के बाद तुम उसे निकाल कर आपस में बाँट लेना।
पिता के मरने के बाद गड़ा धन निकालने के लिए चारों भाईयो ने बंजर जमीन को खोदना शुरू कर दिया। काफी खोदने के बाद भी जब कुछ ना निकला तो चारों पिता को कोसते घर की ओर बढ़ने लगे।
गाँव का मुखिया यह सब देख रहा था। चारों को वापिस जाता देख,
मुखिया ने कहा- जब खोद ही दिया है तो बीज भी डाल दो, तुम्हारी इतनी मेहनत का कुछ तो परिणाम मिले! उन चारों ने बेमन से खोदी हुई जमीन में गेहूँ के बीज डाल दिये।
कुछ ही दिनों में वहां गेहूँ की फसल लह लहाने लगी। फसल को बेचकर चारों को अच्छा खासा धन प्राप्त हो गया। फसल से धन पाकर चारों के चेहरे खिल उठे।
भाईयों को खुश देखकर मुखिया उनके पास आया और बोला- “बेटा तुम चारों ने कठिन परिश्रम किया, और उसी का परिणाम है कि आज इस बंजर जमीन को तुम चारों ने उपजाऊ बना दिया।
मुखिया ने फिर कहा- तुम्हारे पिताजी तुम चारों को यही बात समझाना चाहते थे कि मेहनत करने से कठिन से कठिन कार्य में सफलता हासिल की जा सकती है।
इसीलिए उन्होने जमीन में धन गड़ा होने की बात तुम लोगों से कही। वास्तव में असली धन यह तुम्हारा परिश्रम है जिससे तुम जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हो”।
शिक्षा/Moral:- इस शिक्षाप्रद कहानी से यही पता चलता है कि सफलता पाने का एकमात्र मार्ग है मेहनत । हो सकता है कि तुम पहले प्रयास में कामयाब ना भी हो लेकिन कभी प्रयास करना कभी मत छोड़े. कुछ लोगों को थोड़े प्रयास से सफलता मिल जातो है और कुछ ;लोगों को थोड़ी ज्यादा मेहनत करने से लेकिन अगर प्रयास पूरे दिल से किया जाए तो देर सबेर सफलता मिलता तो निश्चित है| ।                                                                                                          3.किसान और दो घडें -।     (Kisan ki kahaniyan)                                                                        एक गाँव में एक किसान रहता था। वह रोज सुबह-सुबह उठकर दूर झरनें से साफ पानी लेने जाया करता था। इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाया करता था। जिन्हें वह एक डण्डे में बाँधकर अपने कन्धे पर दोनों तरफ लटका कर लाया करता था।
उनमें से एक घड़ा कहीं से थोड़ा-सा फूटा था और दूसरा एकदम सही। इसी वजह से रोज़ घर पहुँचते-पहुँचते किसान के पास डेढ़ घड़ा ही पानी बच पाता था। ऐसा होना नई बात नहीं थी इसको दो साल बीत चुके थे। सही घड़े को इस बात का बहुत घमण्ड था, उसे लगता था कि वह पूरा का पूरा पानी घर पहुँचता है और उसके अन्दर कोई भी कमी नहीं है। वहीं दूसरी तरफ फूटा हुआ घड़ा इस बात से बहुत शर्मिंदा रहता था कि वह आधा पानी ही घर पहुँचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है।
एक दिन की बात है वह बहुत दुःखी और उदास था जब परेशानी हद से बढ़ गई तो उसने फैसला किया कि वह किसान से माफी माँगेगा। किसान से बोला “मैं बहुत शर्मिंदा हूँ, मैं आपसे माफी माँगना चाहता हूँ” तो किसान ने पूछा “भाई तुम किस बात से शर्मिंदा हो” छोटे घड़े ने दुःखी होते हुए कहा “शायद आप नहीं जानते हैं, मैं एक जगह से फुटा हुआ हूँ।
पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी पहुँचाना चाहिए था मैं सिर्फ उसका आधा ही पहुँचा पाया हूँ। मेरे अन्दर यह बहुत बड़ी कमी है। इस वजह से आपकी मेहनत बर्बाद होती रही हैं। किसान को घड़े की बात सुनकर बहुत दुख हुआ और बोला इतना परेशान होना भी ठीक नहीं है।
चलो तुम्हारी उदासी दूर करते हैं, एक काम करना कल जब तुम रास्ते से लौटो तो अपने टपकते पानी पर दुख करने के बजाय उस रास्ते में खिले हुए फूलों को देखना कितने खुशबूदार, कितने खूबसूरत, कितने प्यारे और साथ ही पास में छोटे-छोटे पौधे देखना।
घड़े ने किसान की बातें मनाने का फैसला किया। रास्ते भर सुन्दर फूलों का देखता हुआ आया। ऐसा करने से उसकी उदासी थोड़ा कम हुई, पर घर पहुँचते-पहुँचते उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था। वह फिर से मायूस हो गया और किसान से क्षमा माँगने लगा।
किसान बोला “शायद तुमने रास्ते पर ध्यान नहीं दिया। रास्ते में जितने भी फूल थे, बस तुम्हारी तरफ ही थे।
सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं थे। जानते हो ऐसा क्यों, क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था, मैंने उसका लाभ उठाया। मैंने तुम्हारी तरफ वाले रास्ते पर रंग बिरंगे फूलों के बीज बो दिये थे। तुम थोड़ा-थोड़ा करके सींचते रहें और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया।
आज तुम्हारी ही वजह से मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ,  अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ। तुम ही सोचो अगर तुम जैसे हो ऐसे ना होते तो भला क्या मैं यह सब कुछ कर पाता है।
शिक्षा/Moral:- दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है पर यही वो कमियाँ हैं जो हमें अनोखा बनाती हैं, हमें इंसान बनाती है। उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को जैसा है वैसे ही स्वीकार करना चाहिए। उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए और जब हम ऐसा करेंगे तो फूटा घड़ा भी अच्छे घड़े से मूल्यवान हो जाएगा।                                                                                                                                                                                 4.आलसी बेटा व बूढ़ा किसान -। (Kisan ki kahaniyan)                         
Kisan ki kahaniyan
                                                                                              बहुत समय पहले किसी गांव में एक बूढा किसान रहा करता था| जो दिन भर बहुत मेहनत करके अपने खेतों में काम किया करता था फिर भी उसका गुजारा बड़ी मुश्किल से चल पाता था... किसान का एक जवान बेटा भी था जिसका नाम अंकित था|
किसान चाहता था... कि अंकित भी घर की जिम्मेदारी लें और कुछ काम करें ताकि घर चलाने में कुछ मदद हो सके, लेकिन अंकित अपनी ही धुन में लगा रहता था.. और आलस के मारे कोई भी काम नहीं करना चाहता था.. पिता की मदद करना तो दूर की बात वह दिन भर बिस्तर में पड़ा रहता था.. या फिर अपने पिता के कमाए हुए पैसों को अपने दोस्तों और अय्याशी में उड़ाया करता था ....
किसान को यह बात बहुत बुरी लगती थी कि अंकित मेहनत से कमाए हुए पैसों का मोल नहीं समझता है.. और फिजूल खर्च करता रहता है किसान ने अंकित को कई बार समझाने की कोशिश भी की थी|
1 दिन किसान ने अंकित को कहा-  "बेटा अंकित अब मैं बूढ़ा हो चुका हूं अब यह बूढ़ा शरीर पहले की तरह मेहनत नहीं कर पाता  और तू भी तो अब बच्चा नहीं रहा बेटा तू भी कहीं काम देख ले जिससे घर चल सके कब तक यह फिजूलखर्ची करके बाप के पैसे यूं ही दोस्तों पर उड़ाता रहेगा"|
अंकित को पिता की यह बात अच्छी नहीं लगी और वह पिता से बोला- " क्या पिताजी जरा से पैसों के लिए आप मुझे खरी-खोटी सुनाते रहते हो इतने पैसे मैं जब चाहे आपको लौटा सकता हूं" |
अब किसान समझ गया कि अंकित को डांटने या समझाने का कोई फायदा नहीं |
किसान ने अब एक तरकीब सोची उसने अगली सुबह अंकित को अपने पास बुलाया और कहा अंकित मे खेतों में जा रहा हूं मेरे लौटने तक तूने काम करके कुछ पैसे नहीं कमाए तो इस घर के दरवाजे तेरे लिए बंद हो जाएंगे|
इतना कहकर किसान खेतों की तरफ चल दिया. किसान के जाते ही अंकित सोचनेेे लग गया कि वह पैसे कहां से लाएगा क्योंकि उसे काम के नाम से ही नफरत थी अब उसने एक आसान रास्ता ढूंढा और किसी तरह अपनी मां को मनवा कर मां से कुछ पैसे ले लिए...
जब किसान खेतों से काम करके घर लौटा तो अंकित ने वह पैसे किसान को दिखाएं किसान ने बहुत दुनिया देखी  थी. उसेे पता चल गया कि उसने वह पैसे अपनी मां सेे मांगे है उसनेे अंकित से पैसे लिए और उन्हें एक कुएं मैं फेंक दिया अगले दिन किसान ने अपनी पत्नी को मायके भेज दिया.
और फिर अगले दिन फिर किसान ने अंकित को कहा कि वह शाम तक पैसे कमा कर नहीं लाया तो वह उसे घर से निकाल देगा ऐसा कहकर किसान खेतों में चला गया और फिर अंकित सोचने लगा कि वहां पैसे कहां से लाएगा अबकी बार उसने अपनी बहन से पैसे ले लिए जब उसका पिता घर लौटा.
उसने अपने पिता को पैसे दिखाएं तो किसान समझ गया कि उसने यहां पैसे अपनी बहन से लिए हैं किसान ने वह पैसे लेकर उन्हें दोबारा कुएं में फेंक दिया और अगले दिन किसान ने अपनी बेटी को अपने एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया.
और अगले दिन फिर किसान ने अंकित को कहा कि वह मेरे घर लौटने तक कुछ पैसे कमा कर नहीं लाया तो वह उसे घर से निकाल देगा.
अंकित अपने जानने वालों और दोस्तों से पैसे मांगे तो उन्होंने साफ साफ मना कर दिया अब अंकित के पास कोई चारा नहीं था.
उसने मन मार कर किसी तरह दिन भर काम किया और पैसे लेकर घर लोटा जहां पहले से ही उसका पिता इंतजार कर रहा था |
जब अंकित ने उन पैसों को अपने पिता को दिए तो किसान दोबारा उन पैसों को कुएं में डालने के लिए आगे बढ़ा तो....
यह देखकर अंकित को गुस्सा आ गया और उसने अपने पिता से कहा कि यह पैसे मैने पूरे दिन अपना खून पसीना एक करके इतनी मेहनत मशक्कत करके कमाएें हैं और आप इन्हें कुएं में फेंक कर बर्बाद करना चाहते हो|
यह सुनकर किसान मुस्कुराते हुए बोला बेटा-  यह दुख मुझे भी होता था जब तुम मेरी मेहनत की कमाई को अपने दोस्तों के साथ अय्याशी कर के पैसों को बर्बाद करता था| आज तूने मेहनत से पैसे कमाए तो तू समझा है कि मेहनत से कमाए हुए पैसों का मोल क्या होता है मैं तुझे बस यही समझाना चाहता था बेटा अब यह बात कभी मत भूलना|
यह कहकर के किसान ने अपने बेटे को गले लगा लिया अंकित को अपनी गलती समझ आ गई थी और उसने अपने घर का बोझ अपने सर पर ले लिया और फिर किसान को कभी खेतों में जाने का मौका नहीं दिया|।                                                                                                               5. चतुर किसान - ।     (Kisan ki kahaniyan)                                                                                                                                  एक बार एक किसान एक बकरी, घास का एक गट्ठर और एक शेर को लिए नदी के किनारे खड़ा था।
उसे नाव से नदी पार करनी थी लेकिन नाव बहुत छोटी थी वह सारे सामान समेत एक बार में पार नहीं कर सकता था।
किसान ने कुछ तरकीब सोची। वह अगर शेर को पहले ले जाकर नदी पार छोड़ आता है तो इधर बकरी घास खा जाएगी और अगर घास को पहले नदी पार ले जाता है तो शेर बकरी खा जाएगा।
अंत में उसे एक समाधान सूझ गया। उसने पहले बकरी को साथ में लिया और नाव में बैठकर नदी के पार छोड़ आया।
इसके बाद दूसरे चक्कर में उसने शेर को नदी पार छोड़ दिया लेकिन लौटते समय बकरी को फिर से साथ ले आया।
इस बार वह बकरी को इसी तरफ छोड़कर घास के गट्ठर को दूसरी और शेर के पास छोड़ आया।
इसके बाद वह फिर से नाव लेकर आया और बकरी को भी ले गया।
इस प्रकार उसने नदी पार कर ली और उसे कोई हानि भी नहीं हुई।                                                                                                                                                          6.भाग्य  अपना अपना - ।   (Kisan ki kahaniyan)                                                                                                                               एक किसान था। उसके पास एक बकरा और दो बैल थे। बैलों से वह खेत जोतने का काम लेता। दोनों बैल दिन भर कड़ी मेहनत करके खेतों की जुताई करते थे।
इसके उल्टे बकरे के लिए कोई काम तो था नहीं। वह दिन भर इधर-उधर घूमकर हरी-हरी घास चरता रहता। खा पीकर वह काफी मोटा तगड़ा हो गया था।
यह देखकर बैल सोचते कि इस बकरे के मजे हैं। कुछ करता-धरता तो है नहीं और सारा दिन इधर-उधर घूमकर खाता रहता है।
इधर, बकरा बैलों की हालत देखता तो उसे भी बड़ा दुख होता कि बेचारे सारा दिन हल में जुते रहते हैं और मालिक है कि इनकी ओर पूरी तरह ध्यान नहीं देता। वह बैलों को कुछ सलाह देना चाहता था, जिससे इनका कुछ भला हो।
एक दिन दोनों बैल खेत जोत रहे थे। बकरा भी वहीं खेतों के पास घास चर रहा था। दोनों बैलों को खेत जोतने में काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। वे दोनों हांफ रहे थे।
यह देखकर बकरा मूर्खतापूर्ण स्वर में बोला-”भाइयो, तुम दोनों को दिन भर खेतों में कड़ी मेहनत करते देखकर मुझे बहुत दुख होता है। परंतु किया क्या जा सकता है, यह तो भाग्य का खेल है। मुझे देखो, मेरे पास दिन भर चरने के अलावा कोई काम नहीं है।
दिन भर मैं इधर-उधर मैदानों में चरता रहता हूं। किसान की पत्नी खुद खेतों में जाती है और मेरे लिए हरी पत्तियां और घास लेकर आती है। तुम दोनों तो मुझसे ईर्ष्या करते होगे।“
दोनों बैल चुपचाप बकरे की बातें सुनते रहे। जब वे शाम को खेतों से काम करके वापस आए तो उन्होंने देखा कि किसान की पत्नी किसी कसाई से धन लेकर उसे वह बकरा बेच रही थी।
दोनों बैलों- की आंखों में आंसू भर आए। बेचारे कर भी क्या सकते थे।
उनमें से एक धीमे स्वर में बोला- ‘आह! तुम्हारे भाग्य में यही लिखा था।’
शिक्षा/Moral:- जिसके भाग्य में जैसा लिखा होता है, वैसा ही होता है।                                                                                                                                                      7. खेत की खुदाई - ।                                                                                                                                       एक गाँव में एक बूढ़ा आदमी अपने बेटे के साथ रहता था. एक दिन पुलिस उसके घर आई और उसके बेटे पर हथियार चुराने का आरोप लगाकर पकड़ कर ले गई. उसे जेल में बंद कर दिया गया.
बूढ़ा आदमी हर साल अपने खेत में आलू उगाया करता था. आलू की अच्छी पैदावार उसे अच्छी आमदनी दिला जाती थी और साल भर का उसका खर्चा निकल जाता था.
उस साल भी आलू लगाने का समय आया. लेकिन खेत की खुदाई का काम बूढ़े के अकेले के बस का नहीं था. वह अपने बेटे को याद करने लगा, जो अभी भी जेल में था. बूढ़ा बहुत कोशिशों के बाद भी उसे छुड़ा नहीं पाया था.
एक दिन उसने अपने बेटे को पत्र लिखा-
बेटा,
मैं बहुत दु;खी हूँ कि इस साल मैं खेत में आलू नहीं लगा पाऊँगा. मैं अकेला खेत की खुदाई करने में सक्षम नहीं हूँ. काश, तुम यहाँ पर मेरे साथ होते. मैं जानता हूँ कि तुम पूरा खेत खोद देते और मेरी सारी परेशानी खत्म हो जाती.
तुम्हारा पिता
कुछ दिनों के बाद बूढ़े आदमी को एक टेलीग्राम मिला, जो उसके बेटे ने भेजा था.
उस पत्र में लिखा था कि-
पिताजी! खेत की खुदाई मत करना. मैंने सारे हथियार वहाँ छुपाकर रखे है.
अगले ही दिन पुलिस की एक टुकड़ी बूढ़े के घर आ गई और हथियार की तलाश में पूरा खेत खोद डाला. लेकिन उन्हें कोई हथियार न मिल सका.
बूढ़े आदमी को कुछ समझ नहीं आया कि हुआ क्या?
उसने पुलिस के घर आने की घटना का वर्णन करते हुए फिर से....
अपने बेटे को बूढ़े आदमी ने एक और पत्र लिखा-
कुछ दिनों बाद बेटे का उत्तर आया- पिताजी, अब आप आलू लगा सकते हैं क्योंकि मेरे इस बहाने से खेत की खुदाई तो हो चुकी है. (बहाने ऐसे हो जिसमे किसी की मदद हो रही हो ना की नुकसान)
शिक्षा/Moral:-यदि आपने किसी कार्य को करने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, तो कोई न कोई मार्ग अवश्य निकल आयेगा.                                                                                                                                                            8.राजा के सौ चेहरे -। (Kisan ki kahaniyan)                                                                                                                                     एक राजा, चला था लेने जायजा। अपनी प्रजा के बारे में हमेशा वह सोचता था, उन्हें कोई दुख न हो यह देखता था। रास्ते में वह मिला एक किसान से, जो चल रहा था धीरे-धीरे मारे थकान के। 
राजा ने उससे पूछा- 'तुम कितना कमाते हो, रोज कितना बचा पाते हो?'
किसान ने दिया उत्तर- 'हुजूर रोज चार आने भर!'
'इन सिक्कों में चल जाता है खर्च?' राजा हैरान थे इतनी कम कमाई पर।
'एक मेरे लिए, एक आभार के लिए, एक मैं लौटाता हूं और एक उधार पर लगाता हूं।'
राजा चकराया-  पूरी बात ठीक तरह समझाने को सुझाया।
'एक भाग मैं अपने ऊपर लगाता हूं, एक भाग आभार के लिए यानी पत्नी को देता हूं यानी घर का सारा काम उसी के दम पर ही तो चलता है। एक मैं लौटाता हूं, इसका मतलब अपने बुजुर्ग माता-पिता के पैरों में चढ़ाता हूं जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया, रोजी-रोटी कमाना सिखाया। एक उधार पर लगाता हूं यानी अपने बच्चों पर खर्च कर डालता हूं, जिनमें मुझे मेरा भविष्य नजर आता है।'
'तुमने कितनी अच्छी पहेली बुझाई, मान गए भाई! पर इस उत्तर को रखना राज, जब तक कि मेरा चेहरा देख न लो सौ बार!'
किसान बोला- 'हां, मैं बिल्कुल इसे राज रखूंगा, आपका कहा करूंगा।'
उसी दिन शाम को राजा ने पहेली दरबारियों के सामने रखी, सुनकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हुई। राजा ने कहा यह एक किसान का जवाब है, तुम तो दरबारी हो तुम सबकी तो बुद्धि नायाब है। कोई जवाब नहीं दे सका,
पर एक दरबारी ने हिम्मत जुटाकर कहा-'महाराज अगर मुझे समय मिले 24 घंटे का, तो मैं जवाब ढूंढकर ला दूंगा आपकी पहेली का।'
दरबारी किसान को ढूंढ़ने निकल पड़ा, आखिर किसान उसे मिल ही गया खेत में खड़ा। पहले तो किसान ने किया इंकार, फिर मान गया देखकर थैली भर सिक्कों की चमकार। दरबारी लौट आया और दे दिया राजा को सही जवाब, राजा समझ गए कि तोड़ा है किसान ने उसका विश्वास।
राजा ने किसान को बुलवाया- और किसान से भरोसा तोड़ने का कारण उगलवाया।
राजा ने कहा- 'याद करो मैंने क्या कहा था? मेरा चेहरा सौ बार देखे बिना नहीं देना जवाब, क्या तुम भूल गए जनाब?'
किसान बोला- 'नहीं-नहीं महाराज मैंने अपना वादा पूरी तरह से निभाया है, सौ सिक्कों पर आपका अंकित चेहरा देखकर ही जवाब बताया है।'
राजा को उसकी बात एक बार फिर से भाई, थैली भर मुहरें किसान ने फिर से पाई।                                                                                                                                       9.परमात्मा और किसान -।   (Kisan ki kahaniyan)                                                                                                                            एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जा रही थी|
एक  दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा- देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती-बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा!
किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी हो गई और किसान की ख़ुशी भी क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी!  किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, की फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे|
फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था ,सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, 
बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा- प्रभु ये क्या हुआ?
तब परमात्मा बोले-
ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया. ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया|
इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है|
सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है और उसे अनमोल बनाती है!
उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे शक्त और प्रखर बनाती हैं|
अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है ,प्रतिभाशाली बनना है ,तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा!                                                                                                               10.मोतियो के खेत -। (Kisan ki kahaniyan)                                                   
Kisan ki kahaniyan
                                                                                  एक दिन बादशाह अकबर की रानी समय बिताने के लिए अपने कक्ष में चहलकदमी कर रही थीं। अचानक उनका हाथ एक फूलदान में लगा और वह गिरकर टूट गया। “ओह, यह तो बादशाह का प्रिय फूलदान था।
मैं उन्हें यह नहीं बता सकती कि फूलदान टूट गया है वरना वह बहुत क्रोधित होंगे।” वह चिल्लाई। कुछ समय बाद बादशाह ने कक्ष में प्रवेश किया। उनको अपने कक्ष में कुछ कमी महसूस हुई, पर वह समझ नहीं पाए कि कक्ष में कमी किस चीज की है। याद करने पर पाया कि उनका प्रिय फूलदान कक्ष में नहीं है।
उन्होंने रानी से पूछा- “बेगम, वह फूलदान कहाँ है, जो मुझे एक चीनी यात्री ने तोहफे में दिया था?” “ओह! महाराज, नौकर उसकी धूल साफ करने के लिए ले गया है।” रानी ने झूठ बोलकर अपने आपको बादशाह के क्रोध से बचा लिया। अगली सुबह जब बादशाह सोकर उठे, तो उन्हें तरोताजा देखकर रानी ने अपना दोष स्वीकार करते हुए कहा “महाराज मैंने आपसे फूलदान के विषय में झूठ बोला था।
गलती से मेरा हाथ लग जाने के कारण वह गिरकर टूट गया।” ‘पर तुमने तो कहा था कि नौकर उसे साफ करने के लिए ले गया है। बादशाह अकबर की रानी होते हुए भी तुमने मेरे सामने झूठ बोलने की हिम्मत की। मैं तुम्हें फूलदान तोड़ने के लिए क्षमा करता हूँ, परंतु झूठ बोलने के लिए मैं तुम्हें क्षमा नहीं करूंगा।
अकबर ने क्रोधित होकर कहा- इसके दंड स्वरूप मैं तुम्हें आदेश देता हूँकि तुम तुरंत राजमहल को छोड़कर चली जाओ।” अनेक प्रकार से माफी माँगने के बाद भी बादशाह को रानी पर दया नहीं आई। वह राजमहल को छोड़कर आगरा से बाहर चली गई। शीघ्र ही यह खबर चारों तरफ फैल गई कि रानी ने राजमहल छोड़ दिया है।
अगली सुबह बादशाह ने दरबार में पूछा “क्या कभी किसी ने झूठ बोला है?” सभी दरबारियों ने अपने जीवन के भय के कारण यह जवाब दिया कि उन्होंने हमेशा सच बोला है। उसी समय दरबार में बीरबल ने प्रवेश किया। वह आगरा से बाहर गया हुआ था और सुबह ही वापस आया था। उसके सामने भी वही प्रश्न रखा गया।
बीरबल ने उत्तर दिया- “मैंने हमेशा ईमानदारी से काम करने की कोशिश की है, परंतु कभी-कभी ऐसा समय भी आता है कि व्यक्ति को झूठ का सहारा भी लेना पड़ता है।”
“अकबर ने कहा- “यानि तुम यह कहना चाहते हो कि तुम बेईमान हो। परंतु बाकी सभी उपस्थित दरबारियों ने तो अपने जीवन में कभी भी झूठ नहीं बोला।
 बीरबल जानता था कि सभी झूठ बोल रहे हैं। अकबर बीरबल से क्रोधित हो गए .....
अकबर बोले- “बीरबल, मैं नहीं चाहता कि मेरे दरबार में कोई झूठा मंत्री रहे। मैं तुम्हें आदेश देता हूँकि तुम तुरंत आगरा छोड़ दो।” रानी को राजमहल छोड़ देने का आदेश पहले ही मिल चुका था। इस समय वह आगरा की सीमा पर बने एक महल में रह रही थीं।
जब रानी को पता चला कि बादशाह सलामत ने बीरबल को भी आगरा छोड़ने का आदेश दे दिया है, तो उसने अपनी विश्वासपात्र नौकरानी से बीरबल को बुलाने के लिए कहा, क्योंकि रानी को पूरा विश्वास था कि बादशाह के आदेश का समाधान सिर्फ बीरबल को पास ही हो सकता है। जब बीरबल और रानी मिले, तो रानी ने पूरी घटना उसे सुनाई। बीरबल ने रानी की मदद करने का आश्वासन दिया।
रानी से विदा लेकर बीरबल शहर के सबसे अच्छे जौहरी के पास गया।
उसने जौहरी को गेहूँ का एक दाना दिखाया और कहा-“मैं चाहता हूँ कि तुम इसी प्रकार के सोने के दाने बनाओ जो बिल्कुल असली लगते हों।” कुछ ही दिनों में गेहूँ के सोने के दाने तैयार हो गए। बीरबल उन्हें लेकर बादशाह अकबर के दरबार में पहुँचा। दरबार में उपस्थित होने की इजाजत लेने के बाद वह बादशाह अकबर के सामने खड़ा हो गया|
बीरबल बोला- “महाराज! आपके आदेश के मुताबिक मुझे आगरा की सीमा में पैर नहीं रखने चाहिए थे, परंतु एक आश्चर्यजनक घटना ने मुझे आपके आदेश का उल्लंघन करने पर विवश कर दिया। मैं शहर के बाहर आवश्यक कार्य से कहीं जा रहा था, तो मार्ग में मुझे एक यात्री मिला, जिसने मुझे गेहूँ के यह अतिविशिष्ट दाने दिए। यदि इन्हें बो दिया जाए, तो हमारे पास सोने की अच्छी पैदावार हो सकती है?”
अकबर गेहूँ के दानों को देखकर आश्चर्यचकित हो गया और बोला “क्या यह सचमुच संभव है?” “महाराज, यह मैं निश्चित रूप से तो नहीं कह सकता, पर हम कोशिश करके तो देख ही सकते हैं। जिसने मुझे यह बीज दिये हैं, उसने मुझे इन्हें उपजाने की सारी प्रक्रिया समझा दी है। मेरे पास थोड़ी-सी उपजाऊ भूमि है।
यदि आप इच्छुक हों, तो अगले सप्ताह पूर्णमासी की रात को हम इन दानों को बो दें।” बीरबल ने कहा। बादशाह बड़ी प्रसन्नता के साथ सहमत हो गया। शीघ्र ही यह खबर चारों ओर फैल गई और सभी लोग निर्धारित दिन, निर्धारित स्थान पर एकत्रित हो गए।
बादशाह ने कहा- “बीरबल अब सोने के दानों को बोना शुरू करो।”
 ‘अरे नहीं, महाराज! मैं इन्हें नहीं बो सकता, क्योंकि मैंने अपने जीवन में छोटे-बड़े बहुत झूठ बोले हैं। इन दानों को केवल वही व्यक्ति बो सकता है जिसने कभी पाप न किया हो, जो पूरी तरह पवित्र हो, और जिसने कभी, छोटी-बड़ा किसी प्रकार का झूठ न बोला हो। लेकिन महाराज, आप चिंतित न हों, केवल मैं ही तो इन्हें नहीं बो सकता, परंतु आप विश्वास कीजिए आपके अन्य सभी दरबारी इन्हें बो सकते हैं।
बीरबल ने कहा- आप जिससे चाहें उससे इसकी बुआई करवा सकते हैं।”
 पर यह क्या। बीरबल की बात सुनते ही सभी दरबारी सिर झुकाकर पीछे हट गए। वे जानते थे कि वे झूठे हैं और उनके बोए हुए दानों से अंकुर नहीं निकलेगा उन्हें शर्मिदा महसूस होते देखकर.....
बीरबल-अकबर से बोला- “महाराज, अकेले आप ही आप ही इन दानों को बो सकते हैं।” “बीरबल, इन दानों को मैं भी नहीं बो सकता, क्योंकि बचपन में मैंने भी कई बार झूठ बोला है।
मुझे डर है कि शायद हमें कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिल पाएगा, जिसने अपने जीवन में झूठ न बोला हो।” तब बादशाह अकबर ने अपनी कही बात के महत्व को स्वयं महसूस किया। उन्होंने बीरबल और रानी को माफ कर दिया और दोनों को अपने साथ वापस आगरा चलने का आदेश दिया।                                                                                                                                                                         अगर आपको और मजेदार कहानियां पढ़नी है तो यहां क्लिक करें -।                                                                                      <प्रेरणादायक कहानियां।                                                <शेखचिल्ली की कहानियां

Post a Comment

0 Comments